अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद की ओर से बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्र के नाम खुला पत्र
आपका यह बयान अधिवक्ताओं पर आरोप कम और आपकी अपनी विफलताओं का सार्वजनिक इकबाल ज्यादा है।
ब्यूरो प्रयागराज मान्यवर, आपका यह बयान कि “देश में 35 से 40 प्रतिशत वकील फर्जी हैं” केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय के आत्मसम्मान पर हमला है। यह बयान किसी टीवी बहस के प्रवक्ता ने नहीं, बल्कि उस संस्था के अध्यक्ष ने दिया है जिसे देश के अधिवक्ताओं की गरिमा, स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन सच यह है कि आपका यह बयान अधिवक्ताओं पर आरोप कम और आपकी अपनी विफलताओं का सार्वजनिक इकबाल ज्यादा है।
यदि वास्तव में देश में इतनी बड़ी संख्या में फर्जी वकील मौजूद हैं, तो सबसे पहले कठघरे में आप स्वयं खड़े हैं। क्योंकि वर्षों से बार काउंसिल ऑफ इंडिया का नेतृत्व आपके हाथों में रहा है। डिग्री सत्यापन से लेकर नामांकन व्यवस्था तक, लॉ कॉलेजों की मान्यता से लेकर विधि शिक्षा की निगरानी तक — हर महत्वपूर्ण तंत्र आपकी अध्यक्षता और प्रभाव के अधीन संचालित होता रहा है।
फिर यह बताइए कि—
बिना भवनों वाले लॉ कॉलेजों को मान्यता किसने दी?
बिना योग्य शिक्षकों और पुस्तकालयों के संस्थानों को “लीगल एजुकेशन” का लाइसेंस किसने दिया?
विधि शिक्षा को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त निजी दुकानों में बदलने दिया किसने?
निरीक्षणों को औपचारिक भ्रष्टाचार और कागजी खानापूर्ति में बदलने दिया किसने?
आज अदालतों में जो गुणवत्ता-विहीन विधि स्नातकों की भीड़ दिखाई देती है, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है। यह आपकी अध्यक्षता में वर्षों तक चलाए गए उस विनाशकारी मॉडल का परिणाम है जिसमें शिक्षा नहीं, मान्यता का कारोबार फलता-फूलता रहा।
विडंबना यह है कि इस पूरे पतन की जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय आपने पूरे अधिवक्ता समाज को ही “फर्जी” घोषित कर दिया। यह वही मानसिकता है जिसमें नेतृत्व अपनी असफलता छिपाने के लिए जनता को दोषी ठहराने लगता है।
देश का अधिवक्ता समाज यह भी देख रहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया धीरे-धीरे अधिवक्ताओं की स्वतंत्र संस्था कम और सत्ता प्रतिष्ठान के अनौपचारिक सहयोगी मंच में अधिक बदलती गई। अदालतों में संघर्षरत युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं पर आपकी आवाज़ कभी उतनी मुखर नहीं रही, जितनी सत्ता के प्रति आपकी विनम्रता रही है।
आपके सार्वजनिक आचरण से यह धारणा गहरी हुई है कि बार काउंसिल का नेतृत्व अब अधिवक्ताओं की लड़ाई लड़ने के बजाय सत्ता की कृपा प्राप्त करने में अधिक रुचि रखता है। राज्यसभा की राजनीति और सत्ता के गलियारों में स्वीकार्यता की आकांक्षा ने बार काउंसिल की संस्थागत गरिमा को गंभीर क्षति पहुँचाई है।
देश के तीन नए आपराधिक कानूनों—Bharatiya Nyaya Sanhita,Bharatiya Nagarik Suraksha SanhitaऔरBharatiya Sakshya Adhiniyam को लेकर जब देशभर के अधिवक्ताओं में व्यापक असंतोष था, जब जिला बारों से लेकर उच्च न्यायालयों तक गंभीर आपत्तियाँ उठ रही थीं, जब वकील समुदाय लोकतांत्रिक विमर्श और प्रतिरोध चाहता था — तब आपने उस असंतोष को संगठित करने के बजाय उसे ठंडा करने की भूमिका निभाई। आपने अधिवक्ताओं की आवाज़ बनने के बजाय सत्ता को असुविधा से बचाने का काम किया।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक स्वतंत्र, निर्भीक और लोकतांत्रिक संस्था होना चाहिए था, लेकिन आपके कार्यकाल में यह संस्था लगातार केंद्रीकृत, अपारदर्शी और सत्ता-अनुकूल होती गई। अधिवक्ताओं का विश्वास कमजोर हुआ, विधि शिक्षा का स्तर गिरा, युवा वकीलों का भविष्य असुरक्षित हुआ और संस्था की नैतिक विश्वसनीयता लगातार क्षीण होती गई।
आज जब आप पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, तब देश का अधिवक्ता समाज आपसे पूछ रहा है —यदि सब कुछ इतना ही सड़ा हुआ है, तो वर्षों से शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही कहाँ तय होगी?
किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में नैतिकता का न्यूनतम सिद्धांत यह कहता है कि जो व्यक्ति अपने ही कार्यकाल को इतनी भयावह विफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं रह जाता।
अतः अब समय आ गया है कि आप अधिवक्ता समुदाय को अपमानित करने के बजाय अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन पद से तत्काल त्यागपत्र दें।
क्योंकि वकालत अभी भी लोकतंत्र का स्वतंत्र स्तंभ है —और इसे किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, सत्ता-निकटता और प्रशासनिक विफलताओं की ढाल नहीं बनने दिया जा सकता।
— अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद


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