गैर-जमानती वारंट पर IO को सस्पेंड करना भारी पड़ा: हाईकोर्ट ने बस्ती एसपी  को दी अवमानना की चेतावनी

2 अप्रैल को दाखिल हलफनामा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा

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ब्यूरो प्रयागराज- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया। बता देंयह मामला उस समय सामने आयाजब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर विचार कर वारंट जारी किया था।

मामला रत्नेश कुमार उर्फ राजू शुक्ला की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जैसे ही जांच अधिकारी ने आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट के लिए आवेदन कियाउसे तुरंत निलंबित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने पहले ही एसपी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा था कि किन परिस्थितियों में यह कार्रवाई की गई और अब जांच कौन कर रहा है। हालांकि 2 अप्रैल को दाखिल हलफनामा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।

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याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल अतिरिक्त हलफनामे में कहा गया कि जांच अधिकारी को इस आधार पर निलंबित किया गया कि उसने पर्याप्त साक्ष्य जुटाए बिना गैर-जमानती वारंट हासिल किया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि गैर-जमानती वारंट जारी करना अदालत का विशेषाधिकार हैन कि पुलिस अधीक्षक की राय का विषय।

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अदालत ने कहा, “वारंट जारी करना अदालत का विवेकाधिकार हैन कि पुलिस अधीक्षक की राय पर निर्भर प्रक्रिया।” कोर्ट ने एसपी को एक सप्ताह के भीतर नया व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए पूछा कि जब वारंट अदालत ने अपने विवेक से जारी किया तो जांच अधिकारी पर बिना साक्ष्य वारंट लेने का आरोप कैसे लगाया गया।

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हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो एसपी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को निर्धारित की गई।

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