भारत की वीरता एवं बलिदान के प्रतीक हैं – शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद
देश की आज़ादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज 27 फरवरी को 95वीं पुण्यतिथि है। आज़ाद एक ऐसे दीवाने का नाम है, जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है, आप कल्पना करें जब एक दस–बारह साल का अबोध बालक देश की आज़ादी के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अभिजात्य झाबुआ–अलीराजपुर जिले के अपने जन्मस्थली भाबरा गाँव की गलियों में बचपन की मौज–मस्ती को छोड़कर भूख–प्यास की परवाह किए बिना अपनी भारत माता की आज़ादी के लिए निकल पड़ा, तो उसकी उम्र वर्तमान संदर्भ में क्या मानी जाएगी ?
देश की आज़ादी का सर पर जुनून लिए निकले बालक आज़ाद ने 1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेज़ों के खिलाफ आजादी के दीवानों के साथ अपना सुर बुलंद करते हुए गिरफ्तार किए गए। जब अंग्रेज़ जज के सामने आज़ाद को पेश किया गया और जब जज ने नाम पूछा तो निडर होकर रौबदार आवाज में अपना नाम “आज़ाद” बताया, पिता का नाम “स्वतंत्र” बताया और अपना घर “जेल” बताया, तो जज साहब झल्ला गए और उन्होंने बालक आजाद के देशभक्ति के अदम्य साहस से घबराकर पंद्रह बेंत मारने की सजा सुनाई। अपनी सजा पर बालक आजाद मुस्कुराए और हर बेंत की मार के साथ “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के जयघोष से पूरे वातावरण में ओज भर दिया।
इस घटना के बाद एक अदम्य साहसी क्रांतिकारी के रूप में आजाद का राष्ट्रीय पटल पर उदय हुआ और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के विश्वस्त साथी बनकर भारत की आज़ादी का अलख जगाने में खुद को झोंक दिया । यहीं पर देश के लिए मर मिटने वाले आजादी के सारे दीवानों का मिलन हुआ । आजाद में स्वाभिमान के गुण बचपन से ही विद्यमान थे। अपने माता–पिता से विरासत में मिले इन्हीं गुणों की वजह से आजाद जो एक बार सोच लेते थे, उसे हर हाल में पूरा करते थे । बिस्मिल द्वारा बनाए गए आजादी के दीवानों के संगठन का नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था, जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से भारत माता को आजादी दिलाना था। आज़ाद स्वयं कहते थे कि दासता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और इसी प्रेरणा से वे जीवन भर इस अभिशाप से लड़ते रहे ।
सन 1920 से 30 का एक पूरा दशक ऐसा था जब देश में अंग्रेजी हुकूमत आजादी के इन जवानों के ख़ौफ़ से डरी–सहमी हुई थी । उस एक दशक में यदि भारत की आज़ादी के लिए सारे नेता एकमत हो जाते तो देश पच्चीस बरस पहले ही आज़ाद हो गया होता । अंग्रेज़ों से उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए हथियारों और गोला–बारूद हेतु धन के लिए रामप्रसाद बिस्मिल की योजना के तहत सरकारी खजाना लूटने के लिए आजादी के दीवानों ने काकोरी कांड को अंजाम दिया। काकोरी कांड में सरकारी खजाना लूटने से अंग्रेज़ी हुकूमत बुरी तरह बौखला गई और देशभर में बिस्मिल और उनके साथियों की धरपकड़ तेज कर दी गई । इसे विडंबना कहें या फिर देश का दुर्भाग्य कि हज़ारों देशभक्त दीवानों को अंग्रेज़ी हुकूमत तो नहीं खोज पाई, लेकिन अपने ही लोगों की दगाबाज़ी के चलते अंग्रेज उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाने में कामयाब हो गए।
रामप्रसाद बिस्मिल की फांसी के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बिखर चुका था, लेकिन आज़ाद ने हिम्मत नहीं हारी और कमान अपने हाथों में ली तथा अपने साथियों को पुनः एकजुट कर देश की आज़ादी की फिर से हुंकार भरी। आजादी के दीवानों ने भारत की जेलों में भी आज़ादी का अलख जगाए रखा। अंग्रेज़ों से छिपते हुए, भेष बदलते आजाद ने भगत सिंह के साथ देशभर में फिर से अंग्रेज़ों के खिलाफ गुस्सा पैदा कर दिया था । अंग्रेज़ी हुकूमत हर हाल में आज़ाद और भगत सिंह को गिरफ्तार कर अपने प्रति बढ़ते विद्रोह को दबाना चाहती थी। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद भी आज़ाद अपने साथियों के बूते अंग्रेज़ों के खिलाफ देशभर के लोगों में आक्रोश जगाते रहे।
आज़ाद देश में जहाँ भी जाते, विश्वसनीय साथियों की ऐसी टीम तैयार कर लेते थे जो देश की आज़ादी के लिए मरने–मारने का जज़्बा रखती थी। साधन संसाधन विहीन होकर भी आज़ाद उस अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराए, जिसका कभी सूरज अस्त नहीं होता था। आज़ाद की गतिविधियों से अंग्रेज़ हुकूमत को यह भय हो गया था कि एक अकेला आज़ाद भी उनकी हुकूमत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसलिए देशभर में आज़ाद की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछा दिया गया और लोगों को सूचना देने पर प्रलोभन की घोषणा की गई। आज़ाद की खोज में उनकी जन्मस्थली भाबरा से लेकर आजादी के दीवानों के हर ठिकाने पर दबिश दी गई, लेकिन आज़ाद कहीं नहीं मिले। आज़ाद हमेशा यह पंक्ति गाया करते थे -“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,आजाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।”
आज़ाद ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जेलों में बंद भगत सिंह सहित सभी साथियों को छुड़वाने का बहुत प्रयास किया। आज़ाद चाहते थे कि देश के सारे बड़े नेता एक बार उनका साथ देकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हों, लेकिन आजादी के इन नौजवान दीवानों की भला किसी ने नहीं सुनी। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद, अर्थात वर्तमान प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में भी आज़ाद अपने साथियों की रिहाई की योजना को लेकर आए थे और एक पेड़ के नीचे खड़े होकर अपने कुछ साथियों का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन अपने ही एक साथी की दगाबाज़ी के चलते आज़ाद अंग्रेज़ सिपाहियों से घिर चुके थे। चारों ओर से घिरने के बाद भी आजाद आखिरी गोली शेष बचने तक लड़ते रहे और अंतिम गोली कनपटी में स्वयं मारकर आत्मबलिदान कर लिया।
आज़ादी के इस दीवाने ने अपने रक्त से अपनी मातृभूमि की आज़ादी का अभिषेक कर दिया था। महज़ पच्चीस वर्ष की आयु में चन्द्रशेखर आज़ाद अमर शहीदों की कतार में शामिल हो गए। आजाद की शहादत के बाद देशभर में अंग्रेज़ों के प्रति विद्रोह की भावना पनपने लगी और अंग्रेजी दबदबे को बनाए रखने के लिए आजाद के बलिदान के कुछ ही दिनों बाद चुपचाप भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी दे दी गई। इस प्रकार आजादी के दीवानों ने देश के लिए मुस्कराते हुए मौत को चुन लिया, लेकिन फिरंगियों और उनके लालच को नहीं चुना। देश की आज़ादी के बाद सरकार द्वारा हर बरस शहीदों की चिताओं पर मेले लगाने का दावा किया गया था, लेकिन शनैः शनैः शहीदों के नाम पर लगने वाले मेले राजनीतिक दलों या नेताओं के शक्ति–प्रदर्शन के मंच बन गए। अब शहीदों की चिताओं पर महज रस्म अदायगी भर का आयोजन होता है, शेष सब राजनीति का बखान होता है ।
दुःख इस बात का है कि देश का जनमानस भी आधुनिकता की इस चकाचौंध में आजाद जैसे अमर बलिदानियों को भूलता जा रहा है। अफ़सोस तो यह है कि देश की नई पीढ़ी के लिए आजादी के मायने वर्ष में दो दिन अपने स्टेटस सजाने से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। दुनिया घूमने का दावा करने वाली आधुनिक पीढ़ी ने आजादी के दीवानों की जन्मस्थली को देखने और प्रणाम करने की भी नहीं सोची, तो देशभक्ति उनके जेहन में कैसे जागेगी ?
आज एआई के युग में देश के जनमानस को दुनिया–जहाँ का ज्ञान है, लेकिन उसकी नव पीढ़ी के अधिकांश लोगों को जिस आज़ादी को वे जी रहे हैं, उसके लिए जीवन उत्सर्ग कर देने वाले आधा दर्जन अमर शूरवीरों के नाम तक स्मरण नहीं हैं। देश की आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्यबोध का ज्ञान करवाना है तो आजादी और उसके दीवानों के बलिदान से अवगत करवाना अत्यंत आवश्यक है । सरकार को चाहिए कि देश की आधुनिक पीढ़ी में आजाद, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की तरह राष्ट्र के प्रति जज्बा बनाए रखने हेतु अमर बलिदानियों के जीवन–चरित्र को शिक्षा का मूल भाग बनाया जाए और आजादी के अमर शहीदों की चिताओं पर ईमानदारी से, निस्वार्थ राष्ट्रभावना के साथ हर वर्ष मेले सजाए जाएँ। तभी हम आज़ाद की तरह राम सा शौर्य और शंकर सा लोक कल्याण का भाव देश की नई पीढ़ी में देख सकेंगे।
अरविंद रावल

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