सनातन सांस्कृतिक मूल्यों में राष्ट्र सर्वोपरि – हिन्दु विचार मंच, पाकुड़िया इकाई

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पाकुड़िया, पाकुड, झारखण्ड:- आर्यावर्त या भारत वर्ष के चक्रवर्ती सम्राटों ने कभी किसी राष्ट्र पर आक्रमण नहीं किया। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के आलोक में राष्ट्रीय भाव को सर्वोपरि मानकर भारतीय राष्ट्र को समृद्धि की शिखर पर पहुंचाया। वहीं सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने पूर्णतः राष्ट्रीय भावना के आलोक में शासन करते हुए भारत की समृद्धि को गति प्रदान की और यूनानी शासक सिकंदर को पराजित कर यह सिद्ध कर दिया कि भारत अकारण किसी राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करने की नीति पर अडिग है, लेकिन किसी ने मातृभूमि भारत वर्ष पर आक्रमण करने का साहस किया तो उसे पराजय होना पड़ेगा।
 
परन्तु देश का दुर्भाग्य रहा कि भारत वर्ष में शक्तिशाली सम्राट नहीं रहने से 7वीं सदी में विदेशी मुस्लिम आक्रांता मीर कासिम, मुहम्मद गोरी, गजनवी, बख्तियार खिलजी जैसे आक्रांताओं ने भारत की भूमि पर अकारण आक्रमण कर अपार धन–संपदा की लूटपाट की। यद्यपि स्वतंत्र भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने इन मुस्लिम आक्रांताओं, विदेशी मुगल कालीन औरंगजेब और अंग्रेज शासकों के अमानवीय कृत्यों का इतिहास में उल्लेख न कर आक्रांताओं का महिमामंडन किया। भारत के वीर सपूतों शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप सहित वीर नायकों की उपेक्षा कर उन्हें नीचा दिखाने की कुचेष्टा करते हुए राष्ट्रीय भाव का शोषण किया गया।
 
अस्तु, 7वीं से 20वीं सदी तक पूरे तेरह सौ वर्षों तक पराधीन रहे भारत वर्ष को अंग्रेजों की कुटिल नीति के तहत मजहब के आधार पर पाकिस्तान का गठन करा कर अस्थिर किया गया और वे पलायन कर गए। वहीं दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा सनातन धर्म और संस्कृति को विकृत करने के उपरांत स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भी सनातन सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा की। फलस्वरूप आर्य–अनार्य, धर्म एवं जातीय विभाजन की नीति ने भारतीय राष्ट्रीय भावना को क्षति पहुंचाई और राष्ट्रीय हित में गंभीर मंथन न करने के कारण भारत की पावन धरा पर साम्प्रदायिक तथा जातीय–क्षेत्रीय भेद बढ़ते रहे जिससे विकसित धारा लंबे समय तक प्रभावित हुई।
 
हालांकि भारतीय प्रजातांत्रिक राष्ट्र में पहली बार सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित पूर्ण बहुमत से भाजपा की केंद्रीय सरकार गठित हुई। लेकिन वर्षों तक सत्ता में रही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी नरेंद्र मोदी की सरकार को सूट–बूट की सरकार, राफेल, चौकीदार चोर तथा हिन्दुओं को हिंसक बताते हुए लोकसभा में देवी–देवताओं पर तथ्यविहीन विषय उठाते रहे। मोदी की आड़ में भारत वर्ष को लांछित करते हुए राष्ट्र विरोधियों को सह देते रहे। यद्यपि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘संविधान बदलने’ जैसे नैरेटिव से भाजपा को कम सीटें मिलीं और एनडीए गठबंधन की सरकार बनी, जबकि कांग्रेस को लाभ हुआ तथा राहुल विपक्ष के नेता बने।
 
परन्तु अब तक विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी बिना प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर लोकसभा की कार्यवाही बाधित करते रहे हैं। पुनः लोकसभा में पूर्व सेना अध्यक्ष नरवणे के नाम पर भारतीय सेना का मनोबल तोड़ने की चर्चा कर राहुल कार्यवाही बाधित करते दिखे, जबकि नरवणे की पुस्तक अभी प्रकाशित भी नहीं हुई है, यह बात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में कह चुके हैं। इससे पहले भी विपक्षी नेता कई अवसरों पर बिना प्रमाणिक विषयों को उठाकर कार्यवाही बाधित करते रहे हैं।
 
इन दिनों पुनः चीन के संदर्भ में सरकार को घेरने का प्रयास हो रहा है, परन्तु क्या देश के लोगों, विशेषकर जेन–जी को यह जानने का अधिकार नहीं है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में चीन ने बड़े पैमाने पर भारतीय भूमि को कैसे हड़प लिया? तिब्बत के विषय पर नेहरू मौन क्यों रहे? वहीं दूसरी ओर भारत के अभिन्न अंग जम्मू–कश्मीर राज्य पर पाकिस्तान ने 1948 में अकारण आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया और नेहरू सरकार कुछ नहीं कर सकी — क्यों? जिसका दंश भारत आज तक झेल रहा है।
 
कांग्रेस नेता बड़े गर्व से कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को दो भागों में बांटकर बांग्लादेश का निर्माण कराया, पर वे यह नहीं बताते कि 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण कराने के बाद बिना शर्त वापस क्यों कर दिया? जबकि पाकिस्तान के कब्जे में 55 भारतीय सैनिकों को क्यों नहीं छुड़ा सकीं ‘लोह–महिला’ श्रीमती गांधी? वहीं सिमला समझौते में भारत को क्या हासिल हुआ — इसका जवाब भी देश राहुल से जानना चाहेगा।
 
इन दिनों पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ होने वाले अमानवीय और घृणित अपराधों पर विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और ओवैसी मौन क्यों हैं? वहीं हामास जैसे आतंकियों के समर्थन में नारे लगाने वालों पर भी वे चुप रहते हैं। भारत वर्ष में केवल राजनीतिक लाभ हेतु हिन्दुओं को विभिन्न जातियों में बांट कर देश की विकसित धारा को बाधित करने वाले विपक्षी दलों को नई पीढ़ी को बताना चाहिए कि क्या यह जातीय विभाजन भारत और संविधान विरोधी मानसिकता नहीं है?
 
यद्यपि हिन्दु विचार मंच किसी राजनीतिक पार्टी का पक्ष या विरोध नहीं करता, पर सनातन सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के विपरीत मानसिकता का प्रखर प्रतिरोध करता रहेगा। सनातन संस्कृति में मातृभूमि को सर्वोपरि मानकर उसकी रक्षा–सुरक्षा करना सम्राटों का परम धर्म माना गया है। इसी हेतु श्रीराम ने मातृभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया है। विश्व में भारत वर्ष ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जो मातृभूमि को माता कहता है। सनातन संस्कृति में भारत की धरा केवल भूखण्ड नहीं है।
 
परन्तु स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस की सरकारों ने सनातन संस्कृति, धर्म व मूल्य की उपेक्षा करते हुए वोट प्राप्ति हेतु ‘धर्म’ यानी कर्तव्य को मजहब/रिलीजन के समकक्ष रख दिया, जिससे ‘राष्ट्रीय धर्म’ की भावना कमजोर होती चली गई। इसके कारण जातीय तथा क्षेत्रीय भाव बढ़े और भारत की सामूहिक प्रगति बाधित हुई।भारत वर्ष की पावन धरा पर विभिन्न मत, पंथ, मजहब और रिलीजन के अनुयायी रहते हैं और सभी को अपना पंथ–मत पालन करते हुए भारतीय राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना रखनी चाहिए — यही है राष्ट्रीय भाव।
 
इन दिनों बाबर, टीपू सुल्तान और ‘वंदे मातरम्’ गीत पर राष्ट्रीय बहस टीवी चैनलों पर चल रही है। क्या स्वतंत्र भारत में आक्रमणकारियों का गुणगान उचित है? वहीं भारत माता के प्रति समर्पण के भाव से पूरित ‘वंदे मातरम्’ गीत क्या देशवासियों में राष्ट्रीय भावना को प्रेरित नहीं करता? यह गीत किसी का विरोधी कैसे हो सकता है? राष्ट्रीय भावना में ही भारत के विकसित होने के बीज निहित हैं। 

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