पाखंड की ओट में छुपा दान: क्या यह सच में पुण्य है?

सुनहरे आवरण में लिपटा काला सच: दान या छल?, क्या गलत कमाई का दान कभी पुण्य बन सकता है?

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

 मनुष्य की आत्मा जब अपने कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा करती हैतब सबसे पहले यह प्रश्न उसके अंतर्मन में गूँजता है—क्या धन की पवित्रता से बड़ा कोई नैतिक मूल्य हो सकता हैआज के युग मेंजब अनेक लोग छलकपट और अनैतिक तरीकों से अर्जित धन को धार्मिक कार्यों में लगाकर स्वयं को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करते हैंतब इस प्रवृत्ति की गंभीर समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। यह विषय केवल दान तक सीमित नहीं हैबल्कि यह चरित्रविवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व की कसौटी है। भव्य मंदिरविशाल दानशालाएँ और चमकदार आयोजन हमारी आँखों को चकाचौंध कर सकते हैंकिंतु उनके पीछे छिपा अन्याय प्रायः दृष्टि से ओझल रह जाता है। यही भ्रम धीरे-धीरे हमारी चेतना को शिथिल करता है और हमें नैतिक पतन की खाई की ओर धकेल देता है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी गलत कमाई को अच्छे कार्यों में लगा रहा हैतो कम से कम वह समाज का हित तो कर ही रहा है। परंतु यह सोच न केवल सतही हैबल्कि अत्यंत भ्रामक भी है। जिस धन की नींव शोषणधोखा और भ्रष्टाचार पर रखी गई होवह कभी भी सच्चे कल्याण का माध्यम नहीं बन सकता। ऐसा धन पीड़ितों की आहोंआँसुओं और असहनीय पीड़ा से जुड़ा होता है। जब उसी धन से दान किया जाता हैतब वह सहायता नहींबल्कि अन्याय का एक नया रूप बन जाता है—अन्याय का पुनर्वितरण। समाज को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि सच्ची भलाई का मार्ग केवल शुद्ध और न्यायपूर्ण साधनों से होकर ही गुजरता है।

भारतीय दर्शन सदैव साधन और साध्य—दोनों की शुद्धता पर बल देता आया है। उपनिषदगीता और स्मृतियाँ एक स्वर में यह उद्घोष करती हैं कि अधर्म से अर्जित धन कभी भी पुण्य का स्रोत नहीं बन सकता। श्रीमद्भगवद्गीता में सात्त्विकराजस और तामस दान का विवेचन करते हुए शुद्ध भावना और ईमानदार कमाई को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मनुस्मृति भी यही प्रतिपादित करती है कि अन्यायपूर्ण साधनों से प्राप्त संपत्ति आत्मिक उन्नति में बाधक बनती है। वास्तव में धर्म का उद्देश्य मनुष्य को नैतिक ऊँचाइयों तक पहुँचाना हैन कि उसे अपने पापों पर आडंबर का आवरण चढ़ाने की अनुमति देना।

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इतिहास स्वयं इस निर्विवाद सत्य का साक्षी है कि अपराध और दान का संगम कभी भी महानता की रचना नहीं कर सका। अनेक शासकों और धनाढ्य व्यक्तियों ने अस्पतालविद्यालय और धार्मिक स्थलों का निर्माण करवायापरंतु उनके अत्याचारअन्याय और निर्दयता उन्हें कभी महान नहीं बना सके। जनता के खून-पसीने और पीड़ा से अर्जित धन से खड़े किए गए भवन केवल निर्जीव पत्थर के ढाँचे होते हैंजिनमें नैतिकता और संवेदनशीलता की आत्मा का सर्वथा अभाव होता है। समय ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके आचरण और कर्मों से आँका जाता हैन कि उसके दान की भव्यता और राशि से।

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मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी गलत कमाई से किया गया दान आत्म-शुद्धि का एक झूठा भ्रम उत्पन्न करता है। अनेक लोग इसे अपने अपराध-बोध से मुक्ति पाने का सरल उपाय मान लेते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि कुछ धन दान कर देने मात्र से उनके पाप धुल जाएँगे और उनका अंतर्मन निर्मल हो जाएगा। किंतु यह मानसिकता आत्म-सुधार नहींबल्कि आत्म-छल और आत्म-प्रवंचना का रूप है। सच्चा प्रायश्चित तभी संभव होता हैजब मनुष्य अपने गलत मार्ग को त्यागकर सत्यईमानदारी और नैतिकता के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर हो। बिना आचरण बदले किया गया दान आत्मा को अस्थायी संतोष देने वाला एक छलावा मात्र बनकर रह जाता है।

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समाज पर इस प्रवृत्ति का प्रभाव अत्यंत गहरा और चिंताजनक होता है। जब बेईमान लोग बड़े-बड़े दानों के माध्यम से सम्मानप्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त कर लेते हैंतब ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित और हताश अनुभव करता है। इससे समाज का नैतिक संतुलन डगमगाने लगता है और युवाओं को यह गलत संदेश मिलने लगता है कि सफलता का मार्ग सत्य और परिश्रम से नहींबल्कि चतुराईछल और अनैतिकता से होकर जाता है। धीरे-धीरे यही सोच पूरे सामाजिक ताने-बाने को खोखला कर देती है और परस्पर विश्वास की नींव को गहराई से हिला देती है।

वास्तव में सच्चा दान वही होता हैजो त्यागकरुणा और पवित्र परिश्रम की भूमि पर अंकुरित होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सीमित आय और साधनों के बावजूद दूसरों की पीड़ा को समझकर सहायता के लिए हाथ बढ़ाता हैतब उसका योगदान आकार में छोटा होकर भी मूल्य में महान बन जाता है। उसमें अहंकार का प्रदर्शन नहींबल्कि निःस्वार्थ सेवा की भावना होती है। ऐसा दान समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है और नैतिक मूल्यों की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ करता है। इसके विपरीतगलत कमाई से किया गया दान प्रायः दिखावेप्रतिष्ठा और प्रसिद्धि की अतृप्त लालसा से प्रेरित होता हैजिसमें संवेदना से अधिक स्वार्थ छिपा होता है।

समाधान का मार्ग पूर्णतः स्पष्ट और निर्विवाद है। हमें दान की मात्रा और भव्यता से अधिक उसके स्रोत और भावना की शुद्धता पर ध्यान केंद्रित करना होगा। समाज का दायित्व है कि वह भ्रष्टाचार और अनैतिकता से अर्जित धन को सम्मान देने के बजाय ईमानदारपरिश्रमी और सत्यनिष्ठ जीवन को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित करे। शिक्षण संस्थानोंधार्मिक संगठनों और मीडिया को भी इस विषय पर निरंतर जागरूकता फैलाकर लोगों की सोच को सही दिशा देनी चाहिए। जब हम संपत्ति से ऊपर चरित्र को स्थान देंगेतभी सच्चे अर्थों में एक न्यायपूर्णसंवेदनशील और नैतिक समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि गलत तरीकों से कमाए गए धन से किया गया दान पुण्य नहींबल्कि अन्याय और पाप पर चढ़ाया गया एक चमकदार आवरण मात्र है। यह समाज को भ्रमित करता हैसत्य को ढक देता है और नैतिक मूल्यों को धीरे-धीरे क्षीण कर देता है। सच्ची धार्मिकता मंदिरोंमस्जिदों या दानपेटियों की सीमाओं में नहींबल्कि ईमानदार जीवनअडिग सत्यनिष्ठा और करुणामय आचरण में निवास करती है। हमें इतना साहस अवश्य दिखाना होगा कि हम ऐसे दिखावटी दान की प्रशंसा करने से इंकार करें और स्पष्ट शब्दों में यह घोषित करें—पुण्य का मार्ग केवल शुद्धन्यायपूर्ण और नैतिक साधनों से होकर ही जाता है।

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