अमेरिकी कोयला खदान से निकली गरुड़ आकृति वाली घंटी

यह घटना एक छोटी सी पीतल की घंटी से संबंधित है

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महेन्द्र तिवारी

अमेरिका के पश्चिम वर्जीनिया प्रांत की एक साधारण कोयला खदान से जुड़ी एक असाधारण घटना पिछले कई दशकों से लोगों की कल्पना, आस्था और विवेक को एक साथ झकझोरती रही है। यह घटना एक छोटी सी पीतल की घंटी से संबंधित है, जिस पर उकेरी गई गरुड़ की आकृति ने केवल भारतीय सांस्कृतिक चेतना को स्पर्श किया, बल्कि मानव इतिहास की स्वीकृत समयरेखा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। यह घंटी उन्नीस सौ चवालीस में एक बालक द्वारा कोयले के एक टुकड़े को तोड़ते समय प्राप्त हुई थी। दावा यह किया गया कि यह घंटी कोयले के भीतर पूरी तरह जड़ी हुई थी और जिस कोयले से यह निकली, उसकी आयु करोड़ों वर्ष मानी जाती है। यहीं से इस रहस्य ने जन्म लिया और धीरे धीरे यह एक वैश्विक बहस का विषय बन गया।

जिस स्थान पर यह घटना घटी, वह क्षेत्र भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत प्राचीन माना जाता है। वहाँ की चट्टानों और कोयले का निर्माण उस काल में हुआ था जब पृथ्वी पर घने वन फैले हुए थे और जीवन की संरचना आज की तुलना में अत्यंत सरल थी। उस समय मानव था, पक्षी और ही किसी प्रकार की विकसित सभ्यता। ऐसे में यदि किसी धातु से बनी कलात्मक घंटी उस कोयले के भीतर से प्राप्त होती है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या मानव इतिहास हमारी समझ से कहीं अधिक पुराना है, या फिर हम किसी भ्रम का शिकार हो रहे हैं।

इस घंटी का आकार साधारण होते हुए भी उसका स्वरूप अत्यंत अर्थपूर्ण है। ऊपर की ओर फैले हुए पंखों वाला गरुड़, तीखे नख और सशक्त आकृति, ठीक वैसी ही जैसी भारतीय मंदिरों में भगवान विष्णु के वाहन के रूप में पूजी जाती है। भारतीय धार्मिक परंपरा में गरुड़ केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि धर्म, वेग, साहस और चेतना का प्रतीक है। मंदिरों में बजने वाली घंटियों को चेतना के जागरण और नकारात्मकता के नाश से जोड़ा जाता है। जब इस घंटी पर वही प्रतीक दिखाई देता है, तो यह केवल एक सजावटी संयोग नहीं लगता, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति को छू लेने वाला दृश्य बन जाता है।

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कुछ लोगों ने इसे इस बात का प्रमाण माना कि प्राचीन काल में ऐसी उन्नत सभ्यताएँ थीं जो आज के भूगोल से कहीं आगे तक फैली हुई थीं। उनका तर्क है कि संभव है किसी महाविनाश, जलप्रलय या भूखंडों के डूबने से वे सभ्यताएँ नष्ट हो गई हों और उनके अवशेष आज हमें असंभव प्रतीत होने वाले स्थानों पर मिल रहे हों। इस दृष्टि से यह घंटी उस भूली बिसरी सभ्यता की एक कड़ी मानी गई, जो भारत जैसी सांस्कृतिक भूमि से निकलकर दूर देशों तक पहुँची थी।

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दूसरी ओर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस पूरे प्रकरण को अत्यंत साधारण ढंग से देखता है। भूविज्ञान के अनुसार कोयला वनस्पतियों के दबाव और ताप से लाखों वर्षों में बनता है। खनन के दौरान कोयले के साथ अनेक प्रकार की बाहरी वस्तुएँ दबाव में आकर उसमें फँस सकती हैं। उद्योगों, परिवहन और मानवीय गतिविधियों के कारण धातु की छोटी वस्तुएँ कोयले के ढेरों में मिल जाना असामान्य नहीं है। समय और दबाव के कारण वे इस प्रकार जड़ी हुई प्रतीत हो सकती हैं मानो वे प्रारंभ से ही वहाँ रही हों।

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घंटी की धातु संरचना भी इसी ओर संकेत करती है। उसमें तांबा और जस्ता का अनुपात वही है जो आधुनिक काल में प्रचलित धातु मिश्रणों में पाया जाता है। कुछ सूक्ष्म तत्वों की उपस्थिति को प्राचीनता का प्रमाण बताया गया, परंतु भूवैज्ञानिक संदूषण और औद्योगिक प्रक्रियाओं से ऐसे तत्वों का मिलना स्वाभाविक माना जाता है। अब तक ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका जो यह सिद्ध कर सके कि यह धातु मानव सभ्यता से पहले अस्तित्व में थी।

फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि गरुड़ जैसी विशिष्ट आकृति वहाँ कैसे पहुँची। इसका उत्तर सांस्कृतिक इतिहास में छिपा हो सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी में पूर्वी देशों की कला और प्रतीकों का पश्चिमी समाज में आकर्षण बढ़ा। व्यापार, यात्रा और उपनिवेशवाद के कारण भारतीय कलात्मक रूपांकन अनेक सजावटी वस्तुओं में अपनाए गए। संभव है कि किसी कारीगर ने भारतीय प्रेरणा से ऐसी घंटी बनाई हो, जो किसी तरह खनन क्षेत्र में पहुँच गई हो।

इस पूरी कथा में मानव मनोविज्ञान की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य स्वभाव से रहस्य प्रेमी है। वह साधारण व्याख्या की अपेक्षा असाधारण कल्पना की ओर अधिक आकर्षित होता है। जब कोई वस्तु हमारी ज्ञात सीमाओं को चुनौती देती प्रतीत होती है, तो हम उसमें छिपे रहस्य को बढ़ा चढ़ाकर देखने लगते हैं। यह प्रवृत्ति केवल अज्ञान से नहीं, बल्कि जिज्ञासा और आश्चर्य से जन्म लेती है।

भारतीय दर्शन में जिसे माया कहा गया है, वह केवल भ्रम नहीं, बल्कि उस परदे का नाम है जिसके पीछे सत्य छिपा रहता है। गरुड़ घंटी की कथा भी कुछ ऐसी ही है। यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि सत्य तक पहुँचने के लिए केवल आस्था या केवल तर्क पर्याप्त नहीं, दोनों का संतुलन आवश्यक है। यदि हम केवल चमत्कार देखें, तो विज्ञान से दूर हो जाएँगे और यदि केवल गणना देखें, तो सांस्कृतिक संवेदना खो देंगे।

अंततः यह घंटी चाहे प्राचीन सभ्यता का प्रमाण भी हो, फिर भी उसका महत्व कम नहीं होता। वह हमें यह सिखाती है कि इतिहास केवल तिथियों और प्रमाणों का संग्रह नहीं, बल्कि प्रश्नों और संवादों की निरंतर प्रक्रिया है। हर ऐसी वस्तु जो हमें सोचने पर मजबूर करे, वह अपने आप में मूल्यवान है। गरुड़ घंटी उसी जिज्ञासा की प्रतीक बन चुकी है, जो मनुष्य को अतीत की गहराइयों में झाँकने और भविष्य के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है।

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