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लखनऊ की विशेष पॉक्सो अदालत का फैसला: दुष्कर्म व पॉक्सो आरोपों से आरोपी बरी, आपराधिक धमकी में एक वर्ष की सजा
यह मामला थाना कृष्णानगर, लखनऊ में दर्ज एफआईआर संख्या 395/2018 से संबंधित है, जो 25 जुलाई 2018 को दर्ज की गई थी।
लखनऊ,
यह मामला थाना कृष्णानगर, लखनऊ में दर्ज एफआईआर संख्या 395/2018 से संबंधित है, जो 25 जुलाई 2018 को दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने विवाह का आश्वासन देकर लगभग एक वर्ष तक उससे शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इंकार करने पर उसे तथा उसके परिजनों को जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने विवेचना के बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 376 और 506 तथा पॉक्सो अधिनियम की धाराएं 3/4 में आरोप पत्र दाखिल किया था।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता, उसके परिजन और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इसके साथ ही पीड़िता की मेडिकल और रेडियोलॉजिकल जांच रिपोर्ट, विद्यालयीय अभिलेख, आयु से संबंधित दस्तावेज तथा धारा 161 और 164 सीआरपीसी के अंतर्गत दर्ज बयान अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। अभियोजन पक्ष की ओर से सरकारी अधिवक्ता वीरेंद्र चौधरी और सुमन ने दलील दी कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी और आरोपी ने गंभीर अपराध किया है।
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता अभिषेक उपाध्याय और अरुण कुमार ने अभियोजन के साक्ष्यों पर आपत्ति उठाते हुए पीड़िता की आयु से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास की बात रखी। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी या शारीरिक संबंध उसकी इच्छा के विरुद्ध बनाए गए थे।
सभी साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए पीड़िता की आयु का संदेह से परे प्रमाण आवश्यक है, जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं हो सका। इसी आधार पर आरोपी को दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के आरोपों से बरी किया गया। हालांकि, अदालत ने यह पाया कि आरोपी द्वारा पीड़िता और उसके परिजनों को धमकी देने का आरोप सुसंगत गवाहियों से सिद्ध होता है, जिस पर उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत दोषी ठहराया गया।
Read More गंडक पुल : स्थिति बिल्कुल साफ़ और गंभीर है—यह नीति, नियत और प्रतिनिधित्व तीनों पर खड़ा है सवाल अदालत ने यह भी आदेश दिया कि आरोपी को न्यायिक हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ धारा 428 सीआरपीसी के अंतर्गत दिया जाएगा तथा फैसले की प्रमाणित प्रति आरोपी को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए। जेल प्रशासन को सजा से संबंधित सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला स्पष्ट करता है कि पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में पीड़ित की आयु और घटनाक्रम से जुड़े ठोस प्रमाण निर्णायक होते हैं, जबकि आपराधिक धमकी जैसे अपराधों पर अदालतें सख्त रुख अपनाती हैं।

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