बांग्लादेश में बीएनपी सरकार, तारिक रहमान बनेंगे प्रधानमंत्री, मोदी ने बधाई दी

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ब्यूरो प्रयागराज। बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भारी बहुमत हासिल कर लिया है। यह देश के इतिहास में 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन से शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद पहला बड़ा चुनाव है। अनौपचारिक नतीजों के अनुसार, बीएनपी और उसके सहयोगी गठबंधन ने 299 में से अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की है। जमात-ए-इस्लामी दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है। बांग्लादेश चुनाव आयोग ने अभी आधिकारिक तौर पर नतीजा घोषित नहीं किया है। लेकिन पीएम मोदी ने तारिक रहमान और उनकी पार्टी बीएनपी को मुबारकबाद देने में देर नहीं लगाई।

बीएनपी के अध्यक्ष तारिक रहमान, जो दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं, अब देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद हाल ही में बांग्लादेश लौटे थे। उन्होंने बोगुरा-6 और ढाका-17 दोनों सीटों से जीत हासिल की है।

पीएम मोदी ने एक्स के जरिए बीएनपी और तारिक रहमान को बधाई दी। मोदी ने कहा- बांग्लादेश के संसदीय चुनावों में बीएनपी को निर्णायक जीत दिलाने पर मैं तारिक रहमान को हार्दिक बधाई देता हूँ। यह जीत बांग्लादेश की जनता के आपके नेतृत्व पर विश्वास को दर्शाती है। भारत लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के प्रति अपना समर्थन जारी रखेगा। मैं आपके साथ मिलकर हमारे बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और हमारे साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हूँ।

चुनाव नतीजों की घोषणा के साथ ही बीएनपी नेताओं ने इसे "ऐतिहासिक जीत" करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता रुहुल कबीर रिजवी ने "व्यापक जीत" का दावा किया और समर्थकों से सड़कों पर जश्न मनाने के बजाय शुक्रवार की नमाज के बाद दिवंगत खालिदा जिया के लिए दुआएं मांगने की अपील की। तारिक रहमान ने भी अपनी मां की याद में उत्सव स्थगित करने और प्रार्थना करने का आग्रह किया।

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यह चुनाव शेख हसीना के युग के अंत का प्रतीक है। हसीना 2024 में छात्र आंदोलन के बाद भारत में रह रही हैं और उन्होंने इस चुनाव को "फर्जी" करार दिया है। अवामी लीग को इस चुनाव से बाहर रखा गया था, जिससे बीएनपी को मजबूत स्थिति मिली। बीएनपी और उसका गठबंधन अब तक 160 सीटें जीत चुके हैं। जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को करीब 43 सीटें मिली हैं, जबकि अन्य स्वतंत्र और छोटे दलों को बाकी सीटें प्राप्त हुईं।

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पंचायत चुनाव टलने के आसारजातिवार आरक्षण के साथ आयोग गठन है वजह

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शासन ने हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामा में भले ही समय से पंचायत चुनाव कराने का दावा किया है, लेकिन तमाम जटिल प्रक्रियाओं के चलते ऐसा होना संभव होता नहीं दिख रहा है। समय से चुनाव कराने में सबसे अधिक बाधा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न होना है। गठन के बाद भी आयोग को सीटों की आरक्षण प्रक्रिया तय करने में एक से डेढ़ महीने तक का समय चाहिए। इसके अलावा कई और भी औपचारिकताएं पूरी करनी बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में समय से चुनाव कराने को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति है।प्रदेश में इसी साल अप्रैल-मई में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराए जाने का समय नियत है। लेकिन अभी तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन नहीं हो पाया है। इस वजह से आगे की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।

दरअसल समय से पंचायत चुनाव कराने में सबसे बड़ी बाधा जातिवार सीटों का आरक्षण तय करना। जनगणना 2011 के अनुसार, राज्य में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिशत क्रमशः 20.6982 और 0.5677 प्रतिशत है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इन वर्गों के लिए इतनी ही प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी होंगी। इसमें ओबीसी जातियों का प्रतिशत जनगणना में शामिल नहीं था। जबकि रैपिड सर्वे 2015 के अनुसार, राज्य की ग्रामीण आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 53.33 प्रतिशत थी।

2021 के चुनाव में इसी सर्वे के आधार पर ओबीसी के लिए आरक्षण तय किया गया था। ऐसे में इस बार पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रतिशत 27 प्रतिशत रखना अनिवार्य है। इसलिए अबकी बार संख्या में हुए बदलाव को ध्यान में रखते हुए आरक्षण तय करने में समय लग सकता है।

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