जाति जन्म से तय होती है, विवाह या धर्म परिवर्तन से नहीं बदलती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि शिकायत और एफआईआर एक ही दिन की घटना से संबंधित हैं,

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति की एक महिला से जुड़े अत्याचार के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और धर्म परिवर्तन या अंतरजातीय विवाह से उसमें कोई बदलाव नहीं होता।

यह टिप्पणी एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की गई। मामला उस महिला से जुड़ा था, जिसने गैर-अनुसूचित जाति के युवक से विवाह किया था। आरोपियों का तर्क था कि विवाह के बाद महिला अपने पति की जाति में शामिल हो गई है, इसलिए एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई उचित नहीं है।

कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि विवाह के बाद भी महिला की मूल जाति समाप्त नहीं होती और वह जन्म से प्राप्त जाति से ही पहचानी जाएगी।

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मामला क्या है?

पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की, अभद्र भाषा का प्रयोग किया और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया। इस घटना में वह स्वयं और दो अन्य लोग घायल हुए थे।

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विशेष न्यायाधीश, अलीगढ़ द्वारा पारित समन आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। इसमें उन्हें आईपीसी की धाराओं 323, 506, 452, 354 और एससी/एसटी एक्ट के तहत तलब किया गया था।

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कोर्ट का रुख

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता, गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर ही आरोपियों को तलब किया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में क्रॉस-केस होना शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि शिकायत और एफआईआर एक ही दिन की घटना से संबंधित हैं, इसलिए इसे प्रतिशोध की कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

फैसला

10 फरवरी को जस्टिस अनिल कुमार-दशम की पीठ ने दिनेश समेत नौ आरोपियों की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन उसकी जाति जन्म से तय होती है और विवाह से उसमें परिवर्तन नहीं होता।

 

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