रोटी से बड़ी हो गई गैस - शहर छोड़ते मजदूरों की मजबूरी
ऐसे में सवाल यह नहीं रह जाता कि मजदूर क्यों जा रहे हैं, बल्कि यह बन जाता है कि वे रुकें भी तो कैसे
महेन्द्र तिवारी
भारत में प्रवासी मजदूरों का संकट एक बार फिर सामने खड़ा है, और इस बार इसकी जड़ में केवल आर्थिक मंदी या रोजगार की कमी नहीं, बल्कि एक गहरा ऊर्जा संकट है, जिसने शहरों की चमक के पीछे छिपी कमजोरियों को उजागर कर दिया है। हाल के दिनों में देश के कई औद्योगिक शहरों विशेषकर सूरत, दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद में हजारों मजदूर अपने गांवों की ओर लौटते दिखाई दिए। यह वही वर्ग है जिसने वर्षों से भारत के औद्योगिक विकास की रीढ़ बनकर काम किया है, लेकिन संकट आते ही सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होता है।
इस बार संकट की शुरुआत रसोई से हुई है। एलपीजी की भारी कमी और कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि ने मजदूरों के लिए शहरों में रहना लगभग असंभव बना दिया है। कई रिपोर्टों के अनुसार छोटे सिलेंडरों की कीमत ₹500 से बढ़कर ₹1,100–₹2,000 तक पहुंच गई, जबकि सामान्य घरेलू सिलेंडर ₹3,200–₹4,000 तक बिकने लगे। इतना ही नहीं, ब्लैक मार्केट में गैस ₹500 प्रति किलो तक पहुंच गई, जो एक दिहाड़ी मजदूर के लिए असंभव है। ऐसे में सवाल यह नहीं रह जाता कि मजदूर क्यों जा रहे हैं, बल्कि यह बन जाता है कि वे रुकें भी तो कैसे।
Read More पीएनजी संकट की चपेट में उद्योग महंगे ईंधन और अनिश्चित भविष्य के बीच डगमगाता औद्योगिक संतुलनसूरत, जो देश का प्रमुख टेक्सटाइल हब है, इस संकट का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। वहां पिछले एक महीने में 1.5 लाख से अधिक मजदूर शहर छोड़ चुके हैं। यह पलायन इसलिए नहीं हुआ कि काम नहीं था, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि मजदूर अपने दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरत खाना पकाने को पूरा नहीं कर पा रहे थे। यह स्थिति बताती है कि शहरी अर्थव्यवस्था कितनी हद तक अस्थायी और असुरक्षित श्रम पर निर्भर है।
इस संकट की जड़ें वैश्विक घटनाओं से भी जुड़ी हुई हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को बाधित किया है, विशेषकर एलपीजी जैसी ईंधन आपूर्ति को, जिसका बड़ा हिस्सा भारत आयात करता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अत्यधिक रूप से बाहरी स्रोतों पर निर्भर है, और यह निर्भरता अब संकट का कारण बन रही है। जब अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होती है, तो उसका सीधा असर देश के सबसे कमजोर वर्ग पर पड़ता है। यही कारण है कि एलपीजी संकट केवल ऊर्जा संकट नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट में बदल जाता है।
इसका प्रभाव केवल मजदूरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे औद्योगिक ढांचे पर पड़ रहा है। छोटे और मध्यम उद्योग, जिन्हें एम एस एम ई कहा जाता है, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। ये उद्योग उत्पादन के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं, और जैसे ही गैस की कीमत बढ़ी या आपूर्ति बाधित हुई, उत्पादन धीमा पड़ गया। कई जगहों पर फैक्ट्रियों को सप्ताह में दो दिन बंद रखना पड़ा, और काम के घंटे कम करने पड़े। इससे न केवल उत्पादन घटा, बल्कि मजदूरों की आय भी प्रभावित हुई।
देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही खबरें इस संकट की व्यापकता को दर्शाती हैं। तेलंगाना में होटल और रेस्तरां उद्योग को भारी नुकसान हुआ है, जहां 50 प्रतिशत तक गैस की कमी के कारण कई इकाइयों को बंद करना पड़ा और हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए। मध्य प्रदेश में पारंपरिक खाद्य उद्योगों का उत्पादन 50 प्रतिशत तक गिर गया है, जबकि कर्नाटक और अन्य राज्यों में निर्माण कार्य रुकने लगे हैं क्योंकि मजदूरों के पास खाना बनाने की सुविधा नहीं है। यह दिखाता है कि एक ईंधन संकट कैसे पूरे आर्थिक तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मजदूरों के पास औपचारिक एलपीजी कनेक्शन नहीं होते। अधिकांश प्रवासी मजदूर अस्थायी बस्तियों में रहते हैं, जहां उन्हें गैस कनेक्शन लेने के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं मिल पाते। परिणामस्वरूप वे ब्लैक मार्केट पर निर्भर होते हैं, जहां कीमतें कई गुना अधिक होती हैं। यह व्यवस्था उन्हें हर संकट में सबसे कमजोर स्थिति में डाल देती है।
यदि इस स्थिति की तुलना कोविड-19 के समय से की जाए, तो कई समानताएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। उस समय भी अचानक लॉकडाउन और रोजगार की कमी के कारण लाखों मजदूर शहरों से गांवों की ओर लौटे थे। आज भी स्थिति कुछ वैसी ही बनती दिख रही है, फर्क केवल इतना है कि इस बार कारण वायरस नहीं, बल्कि ईंधन और महंगाई है। लेकिन परिणाम वही है—पलायन, असुरक्षा और अनिश्चितता।
एम एस एम ई क्षेत्र, जो भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देता है और निर्यात में 45 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, इस संकट से जूझ रहा है। यह क्षेत्र लगभग 24 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, लेकिन इसके पास संकट से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। जब लागत बढ़ती है और मांग घटती है, तो सबसे पहले यही छोटे उद्योग प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि हजारों इकाइयां पहले ही बंद हो चुकी हैं और लाखों नौकरियां जा चुकी हैं।
ऊर्जा संकट के साथ-साथ सप्लाई चेन में भी भारी बाधा आई है। निर्यात के लिए तैयार माल बंदरगाहों पर अटका हुआ है या समय पर नहीं पहुंच पा रहा। इससे कंपनियों को महंगे विकल्प जैसे एयर फ्रेट का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे लागत और बढ़ जाती है। दूसरी ओर, घरेलू बाजार में भी मांग में गिरावट आई है क्योंकि महंगाई के कारण उपभोक्ता खर्च कम कर रहे हैं।
सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि सरकार ने आश्वासन दिया है कि आपूर्ति सामान्य हो रही है और कुछ कदम उठाए गए हैं, जैसे कि आधार के माध्यम से मजदूरों को गैस उपलब्ध कराने की योजना, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। उद्योग संगठनों का कहना है कि इस तरह के संकट के लिए पहले से तैयारी की जानी चाहिए थी, खासकर तब जब यह स्पष्ट था कि वैश्विक संघर्ष का असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा।
इस पूरे संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह केवल एक अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे ढांचागत संकट का संकेत है। भारत की ऊर्जा पर बढ़ती आयात निर्भरता, कमजोर सामाजिक सुरक्षा तंत्र, और असंगठित श्रम पर अत्यधिक निर्भरता ये सभी कारक मिलकर इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। जब तक इन मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, तब तक ऐसे संकट बार-बार सामने आते रहेंगे।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रवासी मजदूरों का यह पलायन केवल आर्थिक घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। यह हमें यह याद दिलाता है कि विकास केवल बड़े शहरों और उद्योगों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए जो इन शहरों को चलाते हैं। जब एक मजदूर शहर छोड़ने को मजबूर होता है क्योंकि वह खाना नहीं पका सकता, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता का प्रतीक है।


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