हॉर्मुज की आँच में जल सकती है भारत की पूरी विकास यात्रा
भारत की रसोई से लेकर बाजार तक, हॉर्मुज हर जगह क्यों है, हॉर्मुज: वह वह नीला किवाड़, जिसमें भारत का पूरा वर्तमान उलझा है
दुनिया की अर्थव्यवस्था आज एक पतली समुद्री रेखा पर टिकी है—हॉर्मुज। केवल चालीस किलोमीटर चौड़ा यह जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया का हर पाँचवाँ तेल टैंकर गुजरता है, अब युद्ध का सबसे खतरनाक मोर्चा बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे की चेतावनी दी है—हॉर्मुज खोलो, समझौता करो, वरना “नरक टूट पड़ेगा।” तेहरान ने जवाब दिया—“फॉरएवर वॉर”। यह केवल दो देशों की बयानबाजी नहीं, बल्कि उस वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जिसके सहारे भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएँ चलती हैं। भारत के लिए यह संकट कोई दूर की घटना नहीं, बल्कि पेट्रोल पंप, रसोई गैस, खेत, फैक्टरी और बाजार तक पहुँचने वाला आर्थिक भूचाल है। ट्रंप की धमकी और ईरान की चुनौती ने साफ कर दिया है कि हॉर्मुज अब केवल जलडमरूमध्य नहीं, भारत की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे कमजोर नस बन चुका है।
48 घंटे की चेतावनी के पीछे कई हफ्तों से सुलगता तनाव था। अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा था। अमेरिकी लड़ाकू विमान, ड्रोन हमले, परमाणु कार्यक्रम और खाड़ी में बढ़ती सैन्य हलचल ने माहौल को विस्फोटक बना दिया। ट्रंप ने साफ कहा कि अगर 48 घंटे में हॉर्मुज नहीं खुला, तो ईरान के ऊर्जा ढाँचे पर हमला होगा। लेकिन ईरान जानता है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत हथियार नहीं, हॉर्मुज की वही संकरी समुद्री पट्टी है, जहाँ से दुनिया की ऊर्जा गुजरती है। तेहरान के पास मिसाइलें, समुद्री सुरंगें और ऐसे प्रॉक्सी नेटवर्क हैं, जो कुछ ही घंटों में जहाजरानी रोक सकते हैं। 1980 के दशक का “टैंकर वॉर” फिर लौटता दिख रहा है। फर्क बस इतना है कि तब दांव पर तेल था, आज पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था है। इसलिए ईरान का “फॉरएवर वॉर” केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि तेल के सहारे दुनिया को झुकाने की रणनीति है।
हॉर्मुज में उठी एक रुकावट भारत की अर्थव्यवस्था को भीतर तक हिला सकती है। भारत इस युद्ध में नहीं है, फिर भी सबसे बड़ी मार उसी पर पड़ सकती है। देश अपनी तेल जरूरत का 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है और उसका करीब 40 प्रतिशत हॉर्मुज के रास्ते आता है। यदि यह मार्ग कुछ हफ्तों के लिए भी बंद हुआ, तो भारत सीधे ऊर्जा संकट में फँस जाएगा। तेल की कीमतें सबसे पहले बढ़ेंगी। भारतीय क्रूड बास्केट पहले ही 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है; हॉर्मुज बंदी लंबी खिंची तो यह 130-150 डॉलर तक जा सकती है। फिर पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन, उर्वरक और परिवहन सब महँगे हो जाएंगे। महँगाई 7 से 9 प्रतिशत तक पहुँच सकती है, रुपया और कमजोर होगा, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा और करंट अकाउंट डेफिसिट फैल जाएगा। सबसे बड़ा असर किसान, ट्रक ऑपरेटर, छोटे उद्योग और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा, क्योंकि ईंधन महँगा होते ही अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
हॉर्मुज का संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम और 25 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है। भारत के लिए इसका मतलब है कि रसोई गैस और औद्योगिक गैस, दोनों पर दबाव बढ़ेगा। यदि एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति रुकी, तो गैस सिलेंडर महँगे होंगे, बिजली उत्पादन की लागत बढ़ेगी और गैस आधारित उद्योगों की रफ्तार टूट जाएगी। भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है, लेकिन वह केवल 5-10 दिन की राहत देता है। कुल मिलाकर (रिफाइनरी स्टॉक सहित) यह 60-74 दिन का बफर उपलब्ध है, जबकि विकसित देशों के पास 180 दिन तक का सुरक्षा कवच है। यही अंतर बताता है कि भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को अब तक आर्थिक मुद्दा माना, राष्ट्रीय सुरक्षा का नहीं। 1973 का तेल संकट चेतावनी था, लेकिन आज भारत पहले से अधिक ऊर्जा पर निर्भर है। इसलिए यदि हॉर्मुज लंबे समय तक बंद रहा, तो असर सिर्फ तेल बिल पर नहीं, बल्कि विकास दर, रोजगार और सामाजिक स्थिरता पर भी पड़ेगा।
भारत के पास रास्ते हैं, लेकिन कोई भी आसान नहीं। रूस से तेल आयात पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है और अब कुल आयात का बड़ा हिस्सा वहीं से आता है। इससे कुछ राहत मिलती है, क्योंकि रूसी तेल हॉर्मुज से नहीं गुजरता। लेकिन इसकी अपनी मुश्किलें हैं—लंबी दूरी, महँगा बीमा, कठिन परिवहन और कीमतों में उतार-चढ़ाव। अफ्रीका, अमेरिका और लैटिन अमेरिका से तेल लाया जा सकता है, लेकिन ये रास्ते अधिक महँगे और धीमे हैं। समुद्री भाड़ा 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। उधर, ईरान से जुड़ा चाबहार बंदरगाह भी संकट की चपेट में आ सकता है। भारत जिस अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे और पश्चिम एशिया कॉरिडोर पर भरोसा कर रहा है, वे अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं। इसलिए सच यही है कि भारत के पास विकल्प तो हैं, लेकिन वे तुरंत राहत देने की स्थिति में नहीं।
इस संकट का समाधान केवल तात्कालिक फैसलों में नहीं, दूरगामी तैयारी में छिपा है। भारत को अपनी ऊर्जा नीति की दिशा बदलनी होगी। सबसे पहले रणनीतिक भंडार को तेजी से भरकर और कुल भंडारण क्षमता को बढ़ाकर 180 दिन तक ले जाना होगा। फिर तेल आयात के स्रोत इतने फैलाने होंगे कि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता न रहे। साथ ही, अंडमान, पूर्वी तट और राजस्थान के नए ब्लॉकों में तेल और गैस खोज को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। लेकिन असली बदलाव जीवाश्म ईंधन से बाहर निकलने में है। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन और छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर अब केवल पर्यावरण की जरूरत नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की ढाल हैं। जिस दिन भारत की बसें, ट्रैक्टर, उद्योग और बिजली विदेशी तेल पर कम, घरेलू स्वच्छ ऊर्जा पर अधिक चलेंगे, उसी दिन हॉर्मुज का खतरा भी छोटा पड़ जाएगा।
यह संकट भारत के सामने एक सीधा सवाल खड़ा करता है—क्या हम अब भी बीसवीं सदी की ऊर्जा सोच में अटके हैं, जबकि दुनिया इक्कीसवीं सदी का युद्ध लड़ रही है? ट्रंप की 48 घंटे की चेतावनी और ईरान के “फॉरएवर वॉर” ने साफ कर दिया है कि आने वाली लड़ाइयाँ सीमाओं पर नहीं, सप्लाई चेन, समुद्री रास्तों और ऊर्जा स्रोतों पर लड़ी जाएँगी। यदि भारत आयातित तेल के सहारे विकास का सपना देखता रहा, तो हर नया हॉर्मुज संकट उसे और कमजोर करेगा। इसलिए यह समय केवल चिंता का नहीं, फैसले का है। सरकार, उद्योग और समाज को मिलकर नई ऊर्जा क्रांति शुरू करनी होगी, जहाँ सूरज, हवा, परमाणु और जैव ईंधन भारत की नई ताकत बनें। तभी भारत किसी भी “फॉरएवर वॉर” के बीच अडिग, सुरक्षित और आत्मनिर्भर रह सकेगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


Comments