खामेनेई के बाद की ईरान की रणनीति और भारत पर उसका असर

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महेन्द्र तिवारी

 

अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु और उसके बाद मोजतबा खामेनेई का सत्ता के केंद्र में आना ईरान के इतिहास का वह मोड़ है, जहाँ से वापसी का रास्ता केवल संघर्ष और रणनीतिक आक्रामकता से होकर गुजरता है। ईरान की आगामी रणनीति अब केवल अस्तित्व बचाने की नहीं, बल्कि अपने खोये हुए गौरव और नेतृत्व के अपमान का बदला लेने की है। अहमद वाहिदी जैसे कट्टरपंथी सैन्य रणनीतिकार के हाथों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की कमान होने का सीधा अर्थ है कि ईरान अब "रणनीतिक धैर्य" की नीति को त्यागकर "प्रत्यक्ष प्रतिशोध" के युग में प्रवेश कर चुका है। मोजतबा खामेनेई के लिए चुनौती दोहरी है: उन्हें न केवल अपने पिता की विरासत को सुरक्षित रखना है, बल्कि देश के भीतर पनप रहे असंतोष और बाहर से हो रहे सैन्य प्रहारों के बीच एक संतुलन बनाना है।

ईरान की अगली चालों में सबसे महत्वपूर्ण उसका परमाणु कार्यक्रम होगा। अंतरराष्ट्रीय दबाव और हमलों के बावजूद, ईरान अब परमाणु हथियार की क्षमता को एक "अंतिम सुरक्षा कवच" के रूप में देख रहा है। 2025-26 के इस कालखंड में ईरान का 90 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन करना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक ब्लैकमेल का हथियार है, जो पश्चिम को सीधे टकराव से रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। क्षेत्रीय स्तर पर, ईरान अपने "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" यानी हिजबुल्लाह, हूती और हमास को नई ऊर्जा और आधुनिक हथियारों से लैस करेगा ताकि इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर लगातार दबाव बना रहे। होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी ईरान का वह ब्रह्मास्त्र है, जिसे वह वैश्विक अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

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इस भीषण उथल-पुथल के बीच भारत की स्थिति अत्यंत नाजुक और चुनौतीपूर्ण हो गई है। भारत के लिए ईरान केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुँचने का प्रवेश द्वार है। ईरान में इस तरह का नेतृत्व परिवर्तन और युद्ध की स्थिति भारत की 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी' यानी रणनीतिक स्वायत्तता की कड़ी परीक्षा है। भारत ने हमेशा से एक संतुलनकारी शक्ति की भूमिका निभाई है, जहाँ उसने एक तरफ इजरायल के साथ गहरे रक्षा संबंध बनाए रखे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक निवेशों के जरिए अपनी कनेक्टिविटी को सुरक्षित किया है।

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खामेनेई के बाद यदि ईरान पूरी तरह से चीन और रूस के पाले में चला जाता है, जैसा कि वर्तमान संकेतों से लग रहा है, तो भारत के लिए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना कठिन होगा। अमेरिका और इजरायल के साथ भारत की बढ़ती निकटता के बीच ईरान का नया कट्टरपंथी नेतृत्व नई दिल्ली को संदेह की दृष्टि से देख सकता है। यदि ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगते हैं या वह पूर्ण युद्ध में उलझता है, तो चाबहार बंदरगाह और 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर'  जैसे प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में जा सकते हैं, जो भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने का सबसे छोटा और सस्ता रास्ता हैं। भारत की विदेश नीति के लिए यह वह समय है जब उसे "गुटनिरपेक्षता 2.0" के सिद्धांतों पर चलते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी एक पक्ष का मोहरा न बने।

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ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर, ईरान का संकट भारत के लिए एक आर्थिक सुनामी की तरह हो सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। यद्यपि भारत ने हाल के वर्षों में रूस और खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाकर अपनी निर्भरता को विविधीकृत किया है, लेकिन मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार की सैन्य अस्थिरता सीधे तौर पर वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करती है।

यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करता है, तो कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है, जिससे भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और घरेलू स्तर पर महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी। इसके अलावा, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों से आने वाला तेल भी इसी अशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिससे भारत की आपूर्ति श्रृंखला टूटने का खतरा है। ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी कीमत की स्थिरता पर भी निर्भर करती है। ईरान की अस्थिरता भारत के निवेश और भविष्य की गैस पाइपलाइन परियोजनाओं को भी अनिश्चितता की ओर धकेलती है।

सामाजिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो ईरान और पश्चिम के बीच बढ़ता तनाव भारत के भीतर के जनसांख्यिकीय संतुलन और प्रवासी सुरक्षा को भी प्रभावित करता है। पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और वहां से आने वाला प्रेषण (Remittance) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

यदि युद्ध फैलता है, तो इन भारतीयों की सुरक्षित वापसी एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती होगी। साथ ही, ईरान की कट्टरपंथी रणनीति का प्रभाव क्षेत्र के अन्य कट्टरपंथी समूहों पर भी पड़ सकता है, जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए नए खतरे पैदा हो सकते हैं। भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करना होगा, विशेषकर अरब सागर में जहाँ हूती विद्रोही व्यापारिक जहाजों को निशाना बना रहे हैं। भारतीय नौसेना को अब केवल अपनी सीमाओं की नहीं, बल्कि अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए एक सक्रिय सुरक्षा प्रदाता की भूमिका निभानी होगी।

अंततः, खामेनेई के बाद का ईरान एक ऐसा ज्वालामुखी है जिसके फटने का असर वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक महसूस किया जाएगा। मोजतबा खामेनेई और अहमद वाहिदी की जोड़ी ईरान को एक सैन्यीकृत धार्मिक शासन की ओर ले जा रही है, जो कूटनीति से अधिक शक्ति प्रदर्शन में विश्वास रखता है। भारत के लिए आगामी समय बहुत ही संभलकर चलने का है। उसे अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को ढाल बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी, भले ही इसके लिए उसे कठिन कूटनीतिक फैसले लेने पड़ें।

भारत को चाहिए कि वह ईरान के नए नेतृत्व के साथ अनौपचारिक माध्यमों से संवाद बनाए रखे और साथ ही अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को और अधिक मजबूत करे। ईरान का यह संकट वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्धारण का संकेत है, और भारत को इस बदलती व्यवस्था में एक दर्शक के बजाय एक निर्णायक भूमिका निभानी होगी, ताकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और संप्रभुता पर कोई आंच न आए। ईरान की अगली चालें केवल उसके भविष्य को ही नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी नई दिशा देंगी।

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