संसदीय विमर्श के नए मानक और राघव चड्ढा की तथ्यपरक राजनीति

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महेन्द्र तिवारी

 

भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद में जन सरोकारों की अभिव्यक्ति जब आंकड़ों की शुचिता और तार्किक प्रखरता के साथ होती है, तो वह केवल राजनीति नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का दस्तावेज बन जाती है। हाल के वर्षों में राज्यसभा के पटल पर एक युवा सांसद के रूप में राघव चड्ढा ने जिस परिपक्वता और आर्थिक समझ का परिचय दिया है, उसने संसदीय विमर्श के स्तर को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। विशेष रूप से वर्ष 2026 के बजटीय सत्र के दौरान उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्य भारत की बदलती कर संरचना और मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति पर गंभीर चिंतन की मांग करते हैं।

एक पेशेवर चार्टर्ड अकाउंटेंट की पृष्ठभूमि होने के कारण चड्ढा का दृष्टिकोण केवल भावनात्मक नहीं बल्कि पूर्णतः गणितीय और वस्तुनिष्ठ होता है। उन्होंने इस तथ्य को मजबूती से रेखांकित किया है कि वर्तमान में देश का मध्यम वर्ग सरकार के लिए एक मूक स्वचालित टेलर मशीन (एटीएम) बनकर रह गया है। उनके द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कर इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब व्यक्तिगत आयकर का संग्रह कॉर्पोरेट कर की तुलना में अधिक हो गया है। फरवरी 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रत्यक्ष कर संग्रह 19.44 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है, जिसमें गैर-कॉर्पोरेट यानी व्यक्तिगत करदाताओं का योगदान 10.03 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि बड़े कॉर्पोरेट घरानों का योगदान 8.90 लाख करोड़ रुपये पर सिमट गया। यह विडंबना ही है कि जो वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जो ईमानदारी से कर का भुगतान करता है, उस पर कर का बोझ 5.91 प्रतिशत की दर से बढ़ा है, जबकि बड़े उद्योगों को मिलने वाली रियायतें उनके कुल योगदान को कम कर रही हैं।

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यह असंतुलन केवल सांख्यिकीय त्रुटि नहीं है, बल्कि एक गहरी नीतिगत खामी की ओर संकेत करता है। चड्ढा ने संसद में इस बात को प्रमाणों के साथ रखा कि मध्यम वर्ग न केवल प्रत्यक्ष कर के बोझ तले दबा है, बल्कि महंगाई की दोहरी मार भी झेल रहा है। वर्ष 2026 की शुरुआत में महंगाई दर 6.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जिसमें शिक्षा पर खर्च में 8 प्रतिशत, स्वास्थ्य सेवाओं में 9 प्रतिशत और आवास के किराए में 7 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। इन परिस्थितियों में वेतनभोगी वर्ग के पास बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता। उन्होंने इस विसंगति को दूर करने के लिए मानक कटौती की सीमा को 75,000 रुपये से बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये करने का जो प्रस्ताव दिया, वह करोड़ों करदाताओं की अंतरात्मा की आवाज बनकर उभरा।

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संसदीय वाद-विवाद में चड्ढा का योगदान केवल करों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उन्होंने लोक स्वास्थ्य के उस भयावह पहलू को भी छुआ है जिसे अक्सर विकास की चकाचौंध में अनदेखा कर दिया जाता है। फरवरी 2026 में उन्होंने खाद्य पदार्थों में मिलावट के संकट को एक राष्ट्रीय आपातकाल की संज्ञा दी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शोधों का हवाला देते हुए बताया कि किस प्रकार भारतीय मसालों और दैनिक उपभोग की वस्तुओं में हानिकारक कीटनाशकों की उपस्थिति पाई गई है, जिन्हें विकसित देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है।

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इन पदार्थों में कैंसरकारी तत्वों की मौजूदगी राष्ट्र के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण को अधिक स्वायत्तता और दंडात्मक शक्तियाँ देने की वकालत की ताकि गुमराह करने वाले विज्ञापनों और स्वास्थ्य के शत्रुओं पर लगाम कसी जा सके। इस मुद्दे की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके तर्कों के बाद सरकार को उच्च स्तरीय जांच के निर्देश देने पड़े।

स्वास्थ्य क्षेत्र की बुनियादी कमियों पर बोलते हुए उन्होंने अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, चिकित्सकों पर कार्य का अत्यधिक दबाव और शल्य चिकित्सा के लिए मिलने वाली लंबी प्रतीक्षा तिथियों को मानवीय गरिमा का उल्लंघन बताया। उन्होंने दिल्ली के स्वास्थ्य मॉडल की सफलता को एक राष्ट्रीय मानक के रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ मोहल्ला क्लिनिक जैसी व्यवस्थाओं ने प्राथमिक चिकित्सा को सुलभ बनाया है। उनके अनुसार, जब तक राष्ट्र के बजट का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचों पर खर्च नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का सपना केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

वित्तीय संघवाद और राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता पर भी चड्ढा के विचार अत्यंत मौलिक और प्रभावशाली रहे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले ऋणों की प्रकृति पर सवाल उठाया। वर्तमान व्यवस्था में केंद्र राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए जो सहायता देता है, वह अक्सर कड़ी शर्तों और ऋण के रूप में होती है। चड्ढा ने मांग की कि राज्यों को ऋण के बजाय सीधे पूंजीगत अनुदान दिए जाने चाहिए। उन्होंने 1.5 लाख करोड़ रुपये के अनुदान का जो खाका प्रस्तुत किया, उसका उद्देश्य राज्यों को सिंचाई, सड़क और शहरी बुनियादी ढांचे में स्वतंत्र रूप से निवेश करने हेतु सक्षम बनाना है। यह दृष्टिकोण सहकारी संघवाद की उस भावना को पुष्ट करता है जहाँ राज्य केवल केंद्र के अभिकर्ता न होकर विकास के बराबर के भागीदार होते हैं।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए 'राइट टू रिकॉल' अर्थात निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार का मुद्दा उठाकर एक नई बहस छेड़ दी है। उनका प्रस्ताव है कि यदि कोई विधायक या सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है, तो 18 महीने के प्रदर्शन काल के बाद मतदाताओं के पास उसे पद से हटाने का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने 50 प्रतिशत मतदान की अनिवार्यता का सुझाव दिया, जो राजनीति में अपराधीकरण और अकर्मण्यता को समाप्त करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

आर्थिक सुधारों की दिशा में चड्ढा ने प्रौद्योगिकी के उपयोग पर विशेष बल दिया है। उनका सुझाव है कि भूमि अभिलेखों को ब्लॉकचेन तकनीक पर स्थानांतरित कर देना चाहिए। भारत में दीवानी मुकदमों का एक बड़ा हिस्सा संपत्ति विवादों से संबंधित होता है, जिससे न केवल न्यायपालिका पर बोझ बढ़ता है बल्कि आर्थिक निवेश भी प्रभावित होता है। ब्लॉकचेन आधारित पारदर्शी व्यवस्था से इन विवादों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। साथ ही, उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर की जटिलताओं को दूर कर इसे अधिक सरल और व्यापक बनाने के लिए इसके दूसरे संस्करण की आवश्यकता पर जोर दिया।

उनका तर्क है कि जब तक घरेलू निवेश को प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा और मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में वृद्धि नहीं होगी, तब तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन होगा। चड्ढा के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समस्या गिनाने के साथ-साथ समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। वे आंकड़ों को इस प्रकार बुनते हैं कि सरकार के लिए उन्हें अनदेखा करना संभव नहीं होता। उनके संसदीय सफर का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे किसी विशेष दल की विचारधारा के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर राष्ट्रहित के मुद्दों पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास करते हैं। उनकी प्रखरता ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि विपक्षी दल तथ्यों के साथ अपनी बात रखें, तो वे सरकार को लोक-लुभावन घोषणाओं के बजाय ठोस नीतिगत बदलावों के लिए विवश कर सकते हैं। अंततः, राघव चड्ढा की राजनीति आंकड़ों की शुचिता, मध्यम वर्ग के अधिकारों की रक्षा और एक पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आने वाले समय में भारतीय संसदीय परंपरा के लिए एक आदर्श मार्गदर्शिका सिद्ध होगी।

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