हाईकोर्ट ने UP Police को NBW के बार-बार निष्पादन में विफलता पर फटकार लगाई, कहा- हमसे खेल मत खेलिए

इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने 4 फरवरी को गौतम बुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त और हापुड़ के सीनियर पुलिस अधीक्षक (SSP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर और हापुड़ ज़िलों में कार्यरत उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कोर्ट द्वारा जारी किए गए गैर-जमानती वारंट (NBW) के बार-बार निष्पादन न किए जाने पर कड़ी नाराज़गी जताई। जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ 2019 की आपराधिक अपील से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक हत्या के दोषी के विरुद्ध जारी NBW लंबे समय से निष्पादित नहीं किया गया। कोर्ट ने पुलिस के अधीनस्थ अधिकारियों और आरोपी के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई।

 
 खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “पुलिस बल को बता दीजिए कि यह कानून का न्यायालय है। हमें कानून और अदालत की कार्यप्रणाली की पूरी समझ है। हो सकता है कि हमें पुलिस की कार्यशैली का पूरा ज्ञान न हो लेकिन हम इतना समझदार ज़रूर हैं कि यह पहचान सकें कि कब पुलिस अदालत को हल्के में ले रही है हमसे खेल मत खेलिए और जनता का भरोसा मत तोड़िए।” इससे पहले सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट और आरोपी के हलफनामे के बीच गंभीर विरोधाभास नोट किया था। जहां पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि आरोपी का पता सत्यापित नहीं हो सका, वहीं आरोपी ने अपने हलफनामे में दावा किया था कि पुलिस उसके घर आई थी और उसे वारंट की जानकारी दी गई।

 
इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने 4 फरवरी को गौतम बुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त और हापुड़ के सीनियर पुलिस अधीक्षक (SSP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया और NBW निष्पादित न करने वाले अधिकारियों से व्यक्तिगत हलफनामा भी मांगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित पुलिसकर्मियों का आचरण न केवल सेवा में कदाचार दर्शाता है बल्कि अवमानना की कार्रवाई को भी आमंत्रित कर सकता है। ताज़ा सुनवाई में SSP हापुड़ और DCP गौतम बुद्ध नगर व्यक्तिगत रूप से पेश हुए जबकि गौतम बुद्ध नगर के पुलिस आयुक्त वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े। पीठ ने आयुक्त की ओर से प्रतिनिधि भेजे जाने पर आपत्ति जताई और स्पष्ट किया कि कोर्ट किसी प्रतिनिधि को नहीं सुनेगा।

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मामले के गुण-दोष पर पीठ ने NBW के चार महीने तक निष्पादित न होने पर कड़ा एतराज़ जताया और कहा, “यह पुलिस का काम है कि वह आरोपी को तलाश करे। यह वारंट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा नहीं बल्कि इस न्यायालय द्वारा जारी किया गया। यह एक स्थायी वारंट है, जिसे लौटाया नहीं जा सकता था। इसे हर हाल में निष्पादित किया जाना चाहिए अदालत द्वारा वारंट जारी किया जाना अब पुलिस के लिए कमाई का ज़रिया बन गया।” अपर एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि संबंधित कांस्टेबल, उप-निरीक्षक सहित अन्य पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया और पुलिस आयुक्त द्वारा विभागीय जांच शुरू कर दी गई। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि आगे से अदालत द्वारा जारी कोई भी NBW समय पर निष्पादित न होने की स्थिति नहीं होगी।

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हालांकि, पीठ इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हुई और पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा, “हम किस तरह की पुलिस व्यवस्था में जी रहे हैं? पद हमेशा के लिए नहीं रहता। अदालत या पुलिस से वारंट मिलने के बाद लोग डर के साए में जीते हैं। जनता का भरोसा कैसे बहाल किया जाए? हमें मालूम है कि विभागीय जांच किस तरह और किन आधारों पर पूरी की जाती है, वर्दीधारी सेवा अब केवल जनता को परेशान करने का माध्यम बनकर रह गई।” जस्टिस सत्यवीर सिंह ने यह भी पूछा कि इस मामले में न्यायिक जांच क्यों नहीं कराई गई और पुलिस आयुक्त द्वारा जारी परिपत्र में मौजूद खामियों की ओर भी इशारा किया। कोर्ट ने राज्य से यह स्पष्ट आश्वासन मांगा कि उसके द्वारा जारी कोई भी वारंट बिना निष्पादन के नहीं रहेगा। यदि ऐसा होता है तो संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई अनिवार्य रूप से की जाएगी। इस पर अपर एडवोकेट जनरल ने सहमति जताई। मामले में विस्तृत आदेश पारित किया गया और अगली सुनवाई के लिए इसे 23 मार्च को सूचीबद्ध किया गया।

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