वैश्विक टैरिफ समझौते: भारतीय निर्यातकों एवं उत्पादनकर्ताओं के लिए स्वर्णिम युग

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प्रो (डा) मनमोहन प्रकाश 
 
​भारत के विदेश व्यापार के इतिहास में वर्तमान समय एक ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में उभर रहा है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे दुनिया के सबसे प्रभावशाली आर्थिक केंद्रों के साथ किए गए हालिया टैरिफ समझौतों ने भारतीय उत्पादकों और निर्यातकों के लिए असीमित संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।
 
ये द्विपक्षीय संधियाँ न केवल भारतीय बाजार में विदेशी वस्तुओं की पहुंच सुगम बनाएंगी, बल्कि भारतीय उत्पादों को भी वैश्विक पटल पर अधिक प्रतिस्पर्धी, किफायती और सुलभ बनाएंगी। यह रणनीतिक कदम 'ब्रांड इंडिया' को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला  के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
 
​प्रमुख देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी ​व्यापारिक संबंधों की इस नई इबारत में अमेरिका के साथ हुआ तालमेल अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगने वाले शुल्कों में की गई भारी कटौती ने फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र और आईटी, हार्डवेयर जैसे क्षेत्रों को एक नई ऊर्जा प्रदान की है। इसी प्रकार, यूरोपीय संघ के साथ हुआ दीर्घकालिक समझौता भारतीय वस्तुओं को शून्य-टैरिफ की दिशा में ले जा रहा है, जिससे ऑटोमोबाइल, रसायन और कृषि उत्पादों के लिए यूरोप के विशाल बाजार में पैठ बनाना आसान हो जाएगा।
 
​ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ हुए समझौते भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया के साथ आर्थिक सहयोग ने भारतीय मसालों, अनाज और मशीनरी के लिए बाधाओं को समाप्त कर दिया है। वहीं, ब्रिटेन के साथ हुए द्विपक्षीय करार ने वस्त्र और विनिर्माण क्षेत्र के लिए रियायतों का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है, जो स्थानीय इकाइयों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन सिद्ध हो सकता है।
 
​इन वैश्विक समझोतों को वास्तविक लाभ में बदलने के लिए भारतीय उत्पादकों को अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को सिद्ध करने के लिए अब उच्च गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय मानकों की पैकेजिंग और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण पर ध्यान देना होगा।
 
​भारतीय उद्योगों को अब वैश्विक खरीदारों के बीच दीर्घकालिक विश्वास कायम करने के लिए डिजिटल ट्रेसिबिलिटी और पर्यावरण अनुकूल  उत्पादन तकनीकों को प्राथमिकता देनी होगी। वस्त्र उद्योग द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मानकों को अपनाकर हासिल की गई सफलता अन्य क्षेत्रों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण हो सकती है।
​व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये समझौते केवल व्यापारिक लेनदेन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये देश में बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव के संकेत हैं। निर्यात में होने वाली वृद्धि से न केवल देश का विदेशी मुद्रा भंडार सुदृढ़ होगा, बल्कि श्रम-गहन क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर भी पैदा होंगे। यह उपलब्धि भारत के व्यापार असंतुलन को कम करने में भी सहायक सिद्ध होगा।
 
​अंततः, यह समझना बेहद आवश्यक है कि वैश्विक बाजारों के खुलने के साथ घरेलू बाजार में विदेशी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में भारतीय उद्यमियों की तत्परता और नागरिकों की 'वोकल फॉर लोकल' के प्रति प्रतिबद्धता ही आत्मनिर्भरता की असली कसौटी होगी। इन टैरिफ समझौतों की वास्तविक सफलता इस बात पर टिकी है कि हमारे उत्पादक कितनी कुशलता से वैश्विक मानकों को अपनाते हैं और भारतीय समाज अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को किस प्रकार दिशा देता है।

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