मोबाइल गेम्स का शिकार बनीं तीन मासूम जिंदगियां

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- महेन्द्र तिवारी

गाजियाबाद जिले की एक बहुमंजिला आवासीय सोसायटी में घटित घटना ने पूरे समाज को भीतर तक हिला दिया। तीन नाबालिग बहनों का एक साथ जीवन समाप्त कर लेना केवल एक परिवार का निजी दुख नहीं है, बल्कि यह उस दौर की भयावह तस्वीर है जिसमें तकनीक, अकेलापन और भावनात्मक दूरी बच्चों की दुनिया पर हावी होती जा रही है। यह घटना उस चुप्पी की गवाही है, जो मोबाइल की चमक में दबती चली गई और अंततः तीन मासूम जिंदगियों को निगल गई।

लोनी क्षेत्र की जिस सोसायटी में यह हादसा हुआ, वहां सब कुछ सामान्य प्रतीत होता था। एक साधारण परिवार, माता-पिता अपने काम में व्यस्त, बच्चे पढ़ाई में लगे हुए। लेकिन भीतर ही भीतर एक ऐसी दुनिया पनप रही थी, जिसके बारे में किसी को ठीक से अंदाजा नहीं था। तीनों बहनें उम्र के उस पड़ाव पर थीं, जहां भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं और समझ अभी अधूरी। बड़ी बहन किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी थी, छोटी दोनों बहनें भी उसी रास्ते पर थीं। इसी उम्र में सहारा, संवाद और समझ की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

रात के सन्नाटे में जब तीनों ने एक साथ ऊंचाई से छलांग लगाई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि सुबह ऐसा दृश्य देखने को मिलेगा। पुलिस और अस्पताल की औपचारिकताओं के बीच जब उनके कमरे की तलाशी ली गई, तब कुछ पन्नों में दर्ज शब्दों ने सबको स्तब्ध कर दिया। एक छोटा सा पत्र और एक विस्तृत डायरी, जिसमें डर, अकेलापन, अपराधबोध और भावनात्मक टूटन साफ दिखाई देती है। माता-पिता से क्षमा मांगते हुए लिखा गया वह संदेश किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए पर्याप्त है।

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डायरी के पन्नों में बार-बार एक ही भाव उभर कर आता है कि वे खुद को बेहद अकेला महसूस कर रही थीं। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि उनसे उनकी दुनिया छीन ली गई है। वह दुनिया जो धीरे-धीरे उनके लिए वास्तविक जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो गई थी। महामारी के दौरान जब स्कूल बंद हुए, खेल के मैदान सूने पड़े और मित्रों से मिलना बंद हो गया, तब मोबाइल और परदे ने उनकी दुनिया पर कब्जा कर लिया। शुरुआत में यह केवल समय बिताने का साधन था, लेकिन धीरे-धीरे वही उनका भावनात्मक सहारा बन गया।

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डायरी में विदेशी धारावाहिकों, संगीत और कल्पनात्मक खेलों का उल्लेख मिलता है। इन माध्यमों में उन्होंने एक ऐसा संसार देखा, जहां रिश्ते सरल थे, भावनाएं साफ थीं और हर दुख का समाधान किसी न किसी रूप में मौजूद था। धीरे-धीरे वे उसी दुनिया से जुड़ती चली गईं और वास्तविक जीवन उन्हें कठोर, बेरंग और अकेला लगने लगा। माता-पिता की डांट, पढ़ाई का दबाव और सीमाएं उन्हें उस काल्पनिक संसार से दूर ले जाने वाली बाधाएं प्रतीत होने लगीं।

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जब परिवार ने यह महसूस किया कि बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल में जा रहा है और पढ़ाई व स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, तब स्वाभाविक रूप से उन्होंने रोक लगाने की कोशिश की। लेकिन यह रोक संवाद से नहीं, बल्कि अचानक नियंत्रण के रूप में आई। बच्चों के लिए यह केवल एक उपकरण छीने जाने की बात नहीं थी, बल्कि उनके लिए वह सहारा, वह दुनिया और वह भावनात्मक जुड़ाव छिन जाने जैसा था, जिसे वे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रही थीं।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि मोबाइल या विदेशी संस्कृति अच्छी है या बुरी। सवाल यह है कि जब कोई बच्चा किसी चीज से इतना गहराई से जुड़ जाए कि उसके बिना जीवन अर्थहीन लगने लगे, तब क्या हम उसे समय रहते समझ पाते हैं। माता-पिता अपने अनुभव से बच्चों को मजबूत समझ लेते हैं, लेकिन बदलते समय में बच्चों की मानसिक दुनिया कहीं अधिक जटिल हो चुकी है।

महामारी ने बच्चों से केवल स्कूल और खेल ही नहीं छीने, बल्कि उनसे सामाजिक संवाद भी छीन लिया। लंबे समय तक घरों में बंद रहना, डर का माहौल और अनिश्चित भविष्य ने कई बच्चों के भीतर चिंता और अवसाद को जन्म दिया। मोबाइल और परदा उनके लिए एकमात्र खिड़की बन गया, जिससे वे बाहर की दुनिया देख सकते थे। लेकिन वही खिड़की धीरे-धीरे दीवार बन गई।

इस घटना के बाद आसपास के लोगों ने बताया कि तीनों बहनें बहुत शांत स्वभाव की थीं। वे ज्यादा बाहर नहीं निकलती थीं और अक्सर कमरे में ही रहती थीं। यह चुप्पी ही सबसे बड़ा संकेत थी, जिसे समाज और परिवार दोनों ने सामान्य मान लिया। हम अक्सर बच्चों की चुप्पी को अनुशासन समझ लेते हैं, जबकि कई बार वह भीतर के तूफान की निशानी होती है।

माता-पिता का दुख शब्दों से परे है। मां का यह कहना कि बच्चियां उनकी सहेलियां थीं, बहनें नहीं, इस बात को दर्शाता है कि रिश्ता प्रेम से भरा था, लेकिन शायद संवाद की एक कड़ी कहीं कमजोर रह गई। पिता का यह स्वीकार करना कि उन्होंने बच्चों के भले के लिए सख्ती की, लेकिन उनकी मानसिक स्थिति नहीं समझ पाए, आज के हर अभिभावक के लिए आत्ममंथन का विषय है।

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा समाज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को उतनी गंभीरता से लेता है, जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को। हम बुखार, चोट और बीमारी पर तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन अकेलापन, भय और अवसाद को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। बच्चों की दुनिया बदल चुकी है, लेकिन हमारी समझ अभी भी पुरानी है।

समाधान केवल प्रतिबंध लगाने में नहीं है। समाधान संवाद में है, समय देने में है और बच्चों की दुनिया को समझने की कोशिश में है। अगर बच्चा किसी कल्पनात्मक संसार से जुड़ा है, तो उसे तुरंत तोड़ने के बजाय यह समझना जरूरी है कि वह वहां क्यों सुकून महसूस कर रहा है। खेल, किताबें, कला, परिवार के साथ समय और खुले मन से बातचीत बच्चों को वास्तविक दुनिया से जोड़ने के मजबूत साधन हो सकते हैं।

यह भी आवश्यक है कि विद्यालयों और समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात हो। बच्चों को यह सिखाया जाए कि दुख, निराशा और अकेलापन असामान्य नहीं हैं और इनके लिए सहायता लेना कमजोरी नहीं है। माता-पिता को भी यह समझना होगा कि हर पीढ़ी की चुनौतियां अलग होती हैं और आज के बच्चे जिस दबाव में जी रहे हैं, उसे पुराने अनुभवों से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

गाजियाबाद की यह घटना एक चेतावनी है। यह हमें बता रही है कि अगर हम समय रहते नहीं जागे, तो तकनीक और भावनात्मक दूरी मिलकर और भी कई बचपन निगल सकती हैं। तीन बहनों का चला जाना एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे कोई भर नहीं सकता। लेकिन अगर इस दुख से हम कुछ सीख सकें और आने वाले बच्चों को बेहतर समझ, बेहतर संवाद और बेहतर सहारा दे सकें, तो शायद किसी और घर में ऐसी सुबह न आए।

यह केवल शोक का समय नहीं है, यह आत्ममंथन का समय है। बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की है। अगर हम उन्हें सुनेंगे, समझेंगे और उनके साथ खड़े होंगे, तभी यह भरोसा जिंदा रह पाएगा कि भविष्य सुरक्षित है।

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