खून से सनी इबादतगाहें और टूटता समाज आतंक की आग में झुलसता पाकिस्तान और इंसानियत पर उठते सवाल

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इस्लामाबाद की शिया मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान हुआ आत्मघाती हमला केवल एक सुरक्षा चूक या एक और आतंकी घटना नहीं है, बल्कि वह आईना है जिसमें पाकिस्तान के भीतर गहराते सामाजिक, वैचारिक और राजनीतिक संकट साफ दिखाई देते हैं। नमाज जैसी पवित्र इबादत के वक्त निर्दोष लोगों की जान जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का क्षण होना चाहिए। यहां सवाल किसी एक मजहब, किसी एक समुदाय या किसी एक देश का नहीं है, सवाल इंसान की जान, उसकी सुरक्षा और उस व्यवस्था का है जो बार-बार उसे बचाने में विफल होती दिख रही है।
 
पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है। शिया समुदाय पर हमले कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन राजधानी इस्लामाबाद जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले शहर में इतना बड़ा धमाका यह बताता है कि उग्रवाद अब देश के हर कोने में अपनी पकड़ बना चुका है। यह भी विडंबना ही है कि जिन लोगों का राजनीति, कश्मीर, भारत-पाक संबंध या किसी भी भू-राजनीतिक खेल से कोई लेना-देना नहीं, वही लोग बार-बार इस हिंसा का सबसे आसान शिकार बनते हैं। मस्जिद में नमाज पढ़ने आए लोग किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं थे, वे सिर्फ अपने ईश्वर के सामने सिर झुकाने आए थे।
 
आतंकवाद की सबसे भयावह सच्चाई यही है कि वह किसी तर्क, किसी सीमा या किसी नैतिकता को नहीं मानता। पाकिस्तान ने दशकों तक जिस कट्टरपंथ को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, वही आज उसके समाज के भीतर जहर की तरह फैल चुका है। कभी यह जहर पड़ोसी देशों की ओर मोड़ा गया, कभी आंतरिक राजनीति के लिए इस्तेमाल हुआ, और आज वही जहर आम पाकिस्तानी नागरिकों की नसों में उतर रहा है। “जो जैसा करेगा, उसे वैसा ही भरना पड़ेगा” जैसी कहावत यहां किसी बदले की भावना से नहीं, बल्कि कर्म और परिणाम की कठोर सच्चाई के रूप में सामने आती है।
 
यह कहना जरूरी है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता, लेकिन आतंकवादियों के निशाने पर अक्सर वही होते हैं जो सबसे कमजोर, सबसे असुरक्षित और सबसे निरीह होते हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय लंबे समय से इसी स्थिति में है। बीते दो दशकों में हजारों शियाओं की हत्या यह बताती है कि यह केवल सुरक्षा की समस्या नहीं, बल्कि समाज में गहरे बैठे नफरत के बीजों का नतीजा है। जब राज्य किसी खास विचारधारा के साथ समझौता करता है, जब हिंसक समूहों को “अच्छे” और “बुरे” आतंकवादी के खांचे में बांटा जाता है, तब अंततः वही हिंसा बेकाबू होकर पूरे समाज को निगलने लगती है।
 
इस हमले का एक और पहलू पाकिस्तान की कमजोर होती अर्थव्यवस्था से भी जुड़ता है। जब देश कर्ज के बोझ तले दबा हो, जब बेरोजगारी बढ़ रही हो, जब युवाओं के पास भविष्य की कोई ठोस उम्मीद न हो, तब कट्टरपंथी विचारधाराएं आसानी से जमीन बना लेती हैं। आर्थिक अस्थिरता और वैचारिक उग्रता एक-दूसरे को पोषित करती हैं। पाकिस्तान में बढ़ता कर्ज-जीडीपी अनुपात, बजट घाटा और आम आदमी पर बढ़ता आर्थिक दबाव केवल आंकड़े नहीं हैं, ये उस असंतोष की कहानी कहते हैं जो अंततः हिंसा का रूप ले लेता है।
 
भारत के संदर्भ में अक्सर पाकिस्तान के भीतर यह नैरेटिव गढ़ा गया कि सारी समस्याओं की जड़ बाहर है। कश्मीर, सीमा विवाद और भारत-विरोधी बयानबाजी ने वर्षों तक आंतरिक सवालों से ध्यान हटाने का काम किया। लेकिन आज जब मस्जिदों, इमामबाड़ों और बाजारों में पाकिस्तान के अपने लोग मारे जा रहे हैं, तब यह बहाना भी कमजोर पड़ता दिख रहा है। कश्मीर में मारे गए निर्दोष लोगों का दर्द किसी भी तरह से कम नहीं था, और आज पाकिस्तान के निर्दोष लोगों का दर्द भी उतना ही वास्तविक और उतना ही पीड़ादायक है। इंसानी जान की कीमत सरहद नहीं देखती।
 
यह भी सच है कि आम पाकिस्तानी नागरिक इन नीतियों का निर्माता नहीं रहा। वह भी उसी तरह इस हिंसा का शिकार है, जैसे कोई और। इसलिए किसी भी तरह की सामूहिक दोषारोपण की मानसिकता से बचना जरूरी है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई सरकारों से ज्यादा समाज की लड़ाई होती है। जब तक नफरत फैलाने वाली सोच को सामाजिक स्तर पर चुनौती नहीं दी जाती, जब तक शिक्षा, संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा नहीं दिया जाता, तब तक बंदूक और बम की आवाजें खामोश नहीं होंगी।
 
इस्लामाबाद हमले ने एक बार फिर यह साबित किया है कि सुरक्षा केवल बंदूकधारी जवानों से नहीं आती, बल्कि न्यायपूर्ण नीतियों, समावेशी राजनीति और ईमानदार आत्मालोचना से आती है। किसी भी देश के लिए यह स्वीकार करना कठिन होता है कि उसकी अपनी गलतियों ने उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है, लेकिन बिना इस स्वीकारोक्ति के बदलाव संभव नहीं। आतंकवाद के खिलाफ आधे-अधूरे कदम, दोहरे मापदंड और तात्कालिक राजनीतिक फायदे अंततः उसी समाज को नुकसान पहुंचाते हैं, जिसे बचाने का दावा किया जाता है।
 
अंत में, इस हमले में मारे गए निर्दोष लोगों के लिए संवेदना केवल औपचारिक शब्दों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह संवेदना तब सार्थक होगी जब पाकिस्तान का समाज और उसकी सत्ता यह तय करे कि अब और नहीं। अब नफरत के सौदागरों को जगह नहीं मिलेगी, अब मजहब के नाम पर खून बहाने वालों के लिए कोई बहाना नहीं होगा। क्योंकि अगर आज भी सबक नहीं लिया गया, तो यह हिंसा किसी एक मस्जिद, किसी एक समुदाय या किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहेगी। आतंक जब बेलगाम होता है, तो अंततः वह हर दरवाजे पर दस्तक देता है।
 
निर्दोष लोगों की मौत किसी भी तर्क, किसी भी राजनीति और किसी भी रणनीति से बड़ी होती है। यही सच्चाई इस्लामाबाद की उस मस्जिद की खामोशी में गूंज रही है, और यही सच्चाई हर उस समाज के लिए चेतावनी है जो नफरत के साथ समझौता करता है।
 
कांतिलाल मांडोत

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