एक युगद्रष्टा व्यक्तित्व: कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

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महेन्द्र तिवारी

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भारतीय सार्वजनिक जीवन के उन विरल व्यक्तित्वों में थे, जिनका योगदान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, तो साथ ही साहित्यकार, शिक्षाविद्, राजनेता, सांस्कृतिक चिंतक और संस्थान निर्माता भी। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान, राष्ट्रीय चेतना के निर्माण और आधुनिक भारत की वैचारिक आधारशिला रखने के प्रयासों से जुड़ा रहा। परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन साधते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि आधुनिक राष्ट्र निर्माण अपनी जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि उनसे शक्ति लेकर ही संभव है।

30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भरूच जिले में जन्मे मुंशी एक सुशिक्षित भागर्व ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता माणिकलाल पटवारी थे, किंतु संस्कृत, इतिहास और भारतीय दर्शन में गहरी रुचि रखते थे। बालक कन्हैयालाल को घर के वातावरण से ही भारतीय ज्ञान परंपरा का संस्कार मिला। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने बड़ोदा कॉलेज से स्नातक और मुंबई विश्वविद्यालय से विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे न केवल मेधावी छात्र थे, बल्कि अध्ययनशील और तार्किक चिंतन के धनी भी थे। वकालत के क्षेत्र में उन्होंने शीघ्र ही प्रतिष्ठा अर्जित कर ली, किंतु उनका मन केवल न्यायालय तक सीमित नहीं रहा। समाज, राजनीति और राष्ट्र की पीड़ा ने उन्हें सक्रिय सार्वजनिक जीवन की ओर आकर्षित किया।

मुंशी पर श्री अरविंद घोष के राष्ट्रवादी और आध्यात्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। साथ ही एनी बेसेंट के नेतृत्व में होम रूल आंदोलन से जुड़कर उन्होंने राजनीतिक सक्रियता की शुरुआत की। पत्रकारिता उनके विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनी। 1912 में उन्होंने भार्गवमासिक की स्थापना की, जिसने गुजराती साहित्य और राष्ट्रीय चेतना को दिशा दी। बाद में यंग इंडियाके सह-संपादक के रूप में वे महात्मा गांधी के निकट आए। गांधीजी के साथ उनके संबंध सम्मान और वैचारिक संवाद पर आधारित थे, यद्यपि आगे चलकर दोनों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी उभरे।

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स्वतंत्रता संग्राम में मुंशी की भूमिका सक्रिय और साहसपूर्ण रही। 1915 में वे होम रूल लीग के सचिव बने और 1917 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के सचिव के रूप में कार्य किया। 1920 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में उनकी उपस्थिति ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया। 1927 में वे बॉम्बे विधानसभा के सदस्य चुने गए, किंतु बारडोली सत्याग्रह के समर्थन में उन्होंने पद से त्यागपत्र देकर नैतिक राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत किया। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कारावास भुगतना पड़ा और 1932 में पुनः दो वर्षों के लिए जेल गए। यह कारावास उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ तथा चिंतनशील बनाता गया।

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1937 में वे पुनः बॉम्बे प्रेसीडेंसी विधानसभा के सदस्य बने और गृह मंत्री के रूप में नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने सांप्रदायिक दंगों को नियंत्रित करने में प्रशासनिक कुशलता, संवेदनशीलता और दृढ़ता का परिचय दिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे। स्वतंत्रता के अंतिम चरण में गांधीजी से कुछ नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दिया, किंतु राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए बाद में पुनः सहयोग का मार्ग अपनाया। हैदराबाद के भारत में विलय और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। सोमनाथ को वे केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक मानते थे।

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स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में भी मुंशी का योगदान महत्वपूर्ण रहा। वे संविधान सभा के सदस्य थे और डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली ड्राफ्टिंग कमेटी के साथ कार्य किया। भारतीय परंपरा, संस्कृति और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के समन्वय का उनका दृष्टिकोण संविधान की भावना में परिलक्षित होता है। 1950 से 1952 तक वे केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे। इसी दौरान उन्होंने वन महोत्सवकी शुरुआत की, जो पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश देता है। यह पहल आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण मानी जाती है।

1952 से 1957 तक वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे। इस संवैधानिक पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा, संस्कृति और साहित्य को विशेष प्रोत्साहन दिया। सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होते हुए वे स्वतंत्र पार्टी से जुड़े और बाद में जनसंघ के साथ भी उनका संबंध रहा, किंतु 1959 में उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर स्वयं को पूर्णतः सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। वे विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक सदस्यों में भी रहे, यद्यपि उनका दृष्टिकोण सांप्रदायिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित था।

मुंशी का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली है। वे गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखते थे। गुजराती साहित्य में उनके ऐतिहासिक उपन्यास पाटणनी प्रभुता’, ‘पृथ्वीवल्लभ’, ‘जय सोमनाथ’, ‘भग्न पादुकाऔर लोपामुद्राविशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव का स्रोत बनकर सामने आता है। कृष्णावतारश्रृंखला के माध्यम से उन्होंने पौराणिक आख्यानों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ा। हिंदी में भी उनके उपन्यास और निबंध लोकप्रिय रहे। प्रेमचंद के साथ हंसपत्रिका का संपादन उनके साहित्यिक कद को और ऊँचा करता है। अंग्रेजी में लिखी गई उनकी पुस्तकें भारतीय संस्कृति और दर्शन को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करती हैं।

शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में मुंशी का योगदान संस्थागत और दूरगामी रहा। 1938 में स्थापित भारतीय विद्या भवन उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण स्वप्न था। इसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच सेतु का निर्माण करना था। आज यह संस्था भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रही है। संस्कृत शिक्षा, हिंदी प्रचार और भारतीय दर्शन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी प्रेरणा देती है। वे मानते थे कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक मूल्यों के बिना सशक्त नहीं हो सकता।

8 फरवरी 1971 को मुंबई में उनका निधन हुआ, किंतु उनकी विरासत आज भी जीवित है। भारतीय विद्या भवन, सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, वन महोत्सव और उनका साहित्य ये सभी उनके जीवन दर्शन के सजीव प्रमाण हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध, नैतिकता और ज्ञान परंपरा के संरक्षण से होता है। आज के समय में भी उनके विचार उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में थे।

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