हवा-पानी-मिट्टी ही नहीं, अब रिश्ते भी प्रदूषित हो रहे हैं

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आज ‘प्रदूषण’ की चर्चा केवल वायु, जल या मृदा तक सीमित नहीं रही। यह धीरे-धीरे मानवीय संबंधों की उस पवित्र भूमि तक पहुँच चुका है, जहाँ कभी विश्वास, प्रेम, समर्पण और सहअस्तित्व के बीज बोए जाते थे। विडंबना यह है कि आज शायद ही कोई ऐसा रिश्ता बचा हो, जिसकी निष्कलुषता पर स्वार्थ, संदेह या अहंकार की परछाईं न पड़ी हो। परिवार, जो कभी सुरक्षा और संस्कार का सबसे सुदृढ़ केंद्र हुआ करते थे, आज स्वयं असंतोष, अविश्वास और विघटन की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं।
 
पारिवारिक जीवन से प्रेम, सहयोग, सामंजस्य और सहनशीलता जैसे मूल तत्व तेज़ी से लुप्त हो रहे हैं। इनके स्थान पर छल, कपट, धोखाधड़ी और वैमनस्य ने जगह बना ली है। आधुनिक मनुष्य इतना आत्मकेंद्रित और लोभग्रस्त होता जा रहा है कि वह रिश्तों को तोड़ते समय न तो संकोच करता है और न ही किसी प्रकार का पश्चाताप अनुभव करता है। परिणामस्वरूप भारतीय समाज में पारिवारिक विघटन, तलाक़ और विवाह-पूर्व ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ की घटनाएँ निरंतर बढ़ रही हैं। संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों में सिमटना केवल संरचनात्मक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक-मनोवैज्ञानिक असंतुलन का संकेत भी है, जिसका सीधा प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। अपराध, नशावृत्ति और अवसाद की ओर युवाओं का झुकाव इसी टूटते पारिवारिक ताने-बाने की एक गंभीर परिणति है।
 
मेरे दृष्टिकोण से रिश्तों का यह क्षरण पर्यावरणीय प्रदूषण से भी अधिक घातक है, क्योंकि यह समाज की आत्मा को भीतर से खोखला कर देता है। इस तथ्य की पुष्टि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया’ (सितंबर 2025) से भी होती है। वर्ष 2023 में महिलाओं के विरुद्ध 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए, जिनमें लगभग 31.4 प्रतिशत मामले पति या उसके परिजनों द्वारा की गई क्रूरता से संबंधित थे। इसी प्रकार बच्चों के विरुद्ध दर्ज 1.77 लाख अपराधों में पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत आने वाले 96 प्रतिशत से अधिक मामलों में आरोपी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि पीड़ित का परिचित या संबंधी ही था। हत्या जैसे जघन्य अपराधों में भी ‘पारिवारिक कलह’ एक प्रमुख कारण के रूप में उभरकर सामने आई है। ये आँकड़े केवल अपराध की नहीं, बल्कि रिश्तों के गहरे नैतिक पतन की कहानी कहते हैं।
 
सनातन संस्कृति में परिवार को सदैव ‘संस्कारों की प्रयोगशाला’ माना गया है। भारतीय परिवार व्यवस्था कभी ऐसी नैतिक शक्ति का स्रोत थी, जिसकी ओर पाश्चात्य समाज भी आकृष्ट होता था। किंतु आज वही परिवार अपनी परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक अनुशासन से दूर होता जा रहा है। युवा पीढ़ी का बढ़ता स्वकेंद्रित दृष्टिकोण इस संकट को और गहरा कर रहा है। कैरियर, भौतिक सुख-सुविधाएँ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसकी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर हैं, जबकि परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व हाशिये पर खिसकते जा रहे हैं। संभवतः यही कारण है कि पवित्र वैवाहिक बंधन के स्थान पर अस्थायी संबंधों को अधिक स्वीकार्यता मिल रही है।
 
इस सामाजिक परिवर्तन का एक और चिंताजनक संकेत गिरती प्रजनन दर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार शहरी भारत में कुल प्रजनन दर 1.6 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से काफी नीचे है। यह आँकड़ा भविष्य में एक ऐसे समाज की ओर संकेत करता है, जहाँ बुज़ुर्ग अकेलेपन से जूझेंगे और पारिवारिक सहारा एक दुर्लभ मूल्य बन जाएगा। लोकसभा की 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 60 प्रतिशत भारतीय युवा ‘एकाकीपन’ का अनुभव कर रहे हैं, जो आगे चलकर अवसाद और नशे जैसी प्रवृत्तियों को जन्म दे सकते हैं। यूनिसेफ की विभिन्न रिपोर्टें भी यह स्पष्ट करती हैं कि किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के पीछे पारिवारिक कलह एक बड़ा कारण है।
 
आज परिवारों में संवादहीनता और सहनशीलता की कमी ने उस संस्कार-कवच को नष्ट कर दिया है, जो कभी संयुक्त परिवारों के रूप में समाज को संबल देता था। कोरोना काल और उससे जुड़े अनेक अध्ययनों ने यह सिद्ध किया कि संयुक्त परिवारों में रहने वाले लोगों ने भावनात्मक सहयोग के कारण कठिन परिस्थितियों का अधिक सशक्त ढंग से सामना किया। इसके विपरीत, एकल परिवारों में अकेलापन और असुरक्षा की भावना अधिक गहराई से उभरी।
 
यह समझना आवश्यक है कि आजीविका के कारण भौगोलिक दूरी विवशता हो सकती है, किंतु मन की दूरी केवल हमारे अहंकार और विकृत प्राथमिकताओं का परिणाम है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ‘परिवार प्रबोधन’ जैसे अभियानों के माध्यम से सामाजिक चेतना जागृत करने का प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि अन्य सामाजिक संगठनों के लिए अनुकरणीय भी है। 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में परिवार को पुनः विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता का केंद्र बनाना केवल संस्थाओं का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामूहिक दायित्व है।
 
ऋग्वेद की शाश्वत प्रार्थना  “संगच्छध्वं संवदध्वं” हमें साथ चलने और संवाद बनाए रखने का संदेश देती है। यदि समय रहते सांस्कृतिक और पारिवारिक चेतना को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो हमारी गौरवशाली परंपरा केवल आँकड़ों और इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। समय की माँग है कि विकास की दौड़ में हम अपनों का हाथ न छोड़ें, क्योंकि सशक्त समाज की नींव सुदृढ़ रिश्तों पर ही टिकी होती है।

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