पीड़ा की धरती पर आशा का वृक्ष: बाबा आमटे
बाबा आमटे: दुख की धरती पर स्वाभिमान का राजपथ, आनंदवन से राष्ट्रनिर्माण तक: बाबा आमटे की विरासत
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के हिंगणघाट, वर्धा में जन्मे मुरलीधर देवीदास आमटे का प्रारंभिक जीवन वैभव और सुविधा से सुसज्जित था। संपन्न परिवार में पले-बढ़े बाबा आमटे ने बचपन से ही ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा और आधुनिक जीवनशैली का अनुभव किया। आकर्षक वस्त्र, तेज रफ्तार वाहन और सामाजिक सम्मान उनके दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। किंतु इस भौतिक चमक-दमक के पीछे उनके मन में एक गहन बेचैनी निरंतर करवट लेती रहती थी। वे जीवन को केवल सुख-साधनों का साधन नहीं मानते थे, बल्कि उसे किसी महान उद्देश्य से जोड़ना चाहते थे। यही आंतरिक मंथन धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व को रूपांतरित करता गया और उन्हें आत्मकेंद्रित सोच से निकालकर सामाजिक दायित्व की ओर अग्रसर करता चला गया।
शिक्षा और बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में बाबा आमटे ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। नागपुर से बी.ए. और एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त कर वे एक सक्षम और प्रतिष्ठित वकील बने। न्यायालयों में कार्य करते हुए उन्होंने देखा कि कानून की पहुंच अक्सर निर्बल और वंचित वर्ग तक नहीं हो पाती। निर्णय तो होते थे, परंतु पीड़ितों की पीड़ा अनसुनी रह जाती थी। इसी काल में एक उपेक्षित कुष्ठ रोगी को असहाय अवस्था में देखकर उनका अंतःकरण विचलित हो उठा। समाज द्वारा ठुकराए गए उस मानव की दुर्दशा ने उनकी आत्मा को भीतर तक झकझोर दिया। उसी क्षण उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपना संपूर्ण जीवन उन लोगों के उत्थान के लिए समर्पित करेंगे, जिन्हें समाज ने उपेक्षा और तिरस्कार के अंधकार में छोड़ दिया है।
जब संकल्प सच्चा हो और उद्देश्य पवित्र, तब वह इतिहास का रूप ले लेता है। बाबा आमटे के इसी दृढ़ निश्चय ने 1949 में आनंदवन को जन्म दिया। चंद्रपुर जिले की वीरान और उपेक्षित भूमि पर स्थापित यह आश्रम केवल उपचार का केंद्र नहीं, बल्कि स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की कार्यशाला बन गया। यहाँ पीड़ितों को सहानुभूति नहीं, सम्मान की अनुभूति कराई जाती थी। बाबा आमटे ने श्रम, शिक्षा और कौशल को जीवन की आधारशिला बनाया। प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया गया, ताकि वह अपने भविष्य का निर्माण स्वयं कर सके। कृषि, हस्तकला, शिक्षण और उद्योग के माध्यम से आनंदवन आत्मगौरव का प्रतीक बन गया। यह स्थान टूटे हुए आत्मबल को फिर से जाग्रत करने का पावन स्थल बन गया।
एक व्यक्ति नहीं, टूटे जीवनों की पुनर्रचना बाबा आमटे की करुणा और संघर्ष की सीमा कभी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रही। उनका हृदय समाज के प्रत्येक उपेक्षित, शोषित और पीड़ित व्यक्ति के लिए धड़कता था। आदिवासी समाज, दिव्यांगजन, निर्धन परिवार और विस्थापित समुदाय सभी उनके संरक्षण और मार्गदर्शन के पात्र बने। वे दृढ़ विश्वास रखते थे कि मनुष्य का मूल्य उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसकी चेतना, साहस और आत्मसम्मान से मापा जाता है। उन्होंने लोगों के मन से हीनता की भावना को मिटाने का प्रयास किया और यह समझाया कि दुर्बलता कोई अभिशाप नहीं, बल्कि संघर्ष और सफलता की पहली सीढ़ी हो सकती है। उनका लक्ष्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं था, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का निर्माता बनाना था।
प्रकृति के प्रति बाबा आमटे की संवेदनशीलता उनकी दूरदर्शिता का प्रतीक थी। वे विकास के नाम पर पर्यावरण के अंधाधुंध विनाश के प्रखर विरोधी थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन में उनकी सक्रिय सहभागिता इसी चेतना का प्रमाण बनी। उनका स्पष्ट मत था कि प्रगति तभी सार्थक है, जब उसमें मानव और प्रकृति दोनों का संरक्षण सुनिश्चित हो। उन्होंने संतुलित विकास की अवधारणा को केवल विचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन में उसे आत्मसात किया। उनके लिए नदियाँ, जंगल और भूमि मात्र संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर थीं। उन्होंने समाज को बार-बार चेताया कि प्रकृति की उपेक्षा करने वाली सभ्यताएँ कभी स्थायी नहीं रह सकतीं।
जब राष्ट्र की आत्मा को जगाने का संकल्प जाग्रत हुआ, तब 1985 में ‘भारत जोड़ो अभियान’ का सूत्रपात हुआ। यह केवल एक पदयात्रा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का महाअभियान था। बाबा आमटे ने पैदल चलकर गांव-गांव और नगर-नगर जाकर भाईचारे, सहयोग और सौहार्द का संदेश जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने लोगों को यह समझाया कि सशक्त राष्ट्र की नींव आपसी विश्वास और समानता पर टिकी होती है। यद्यपि उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया, किंतु वे कभी इन उपलब्धियों के मोह में नहीं बंधे। पदक और उपाधियाँ उनके लिए महत्वहीन थीं। उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उन चेहरों की मुस्कान थी, जिन्हें उन्होंने आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का मार्ग दिखाया। यही संतोष उनके जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी था।
त्याग, तपस्या और अटूट संकल्प से निर्मित एक व्यक्ति, एक विचार, एक युग बाबा आमटे का जीवन मानवता की अमर गाथा है। 9 फरवरी 2008 को भले ही उनका पार्थिव शरीर इस संसार से विदा हो गया हो, परंतु उनकी चेतना आज भी समाज के हर कोने में स्पंदित होती है। वे हमें यह शिक्षा देते हैं कि जीवन की सार्थकता केवल स्वयं के सुख में नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख को दूर करने में निहित है। प्रेम, करुणा और निरंतर परिश्रम से ही सामाजिक उत्थान संभव होता है। उनके आदर्श हमें निरंतर प्रेरित करते हैं कि हम अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े हों और संवेदनशीलता को अपना आभूषण बनाएं। उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची और स्थायी श्रद्धांजलि है।


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