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10 साल में ट्रायल कोर्ट ने 1300 लोगों को दी फांसी की सजा
हाईकोर्ट में टिक पाए सिर्फ 70 केस
ब्यूरो प्रयागराज, हैदराबाद स्थित हिमालयन नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्क्वायर सर्किल क्लीनिक की नई रिपोर्ट ने भारत में मृत्युदंड देने की न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. 10 साल के आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि ट्रायल कोर्ट लेवल पर बड़ी संख्या में फांसी की सजा सुनाई गई है, लेकिन ऊपरी अदालत में इन फैसलों का टिकना बहुत कम रहा है. आंकड़ों के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच की ट्रायल कोर्ट्स ने कुल 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई. जब यह मामले हाई कोर्ट पहुंचें तो सिर्फ 70 मामलों में ही फांसी की सजा को बरकरार रखा गया. यह संख्या कुल सजा के मुकाबले बहुत कम मानी गई है, रिपोर्ट में इसे चौंकाने वाली बात बताया गया है.
2025 में ही सेशंस कोर्ट्स ने 94 मामलों में 128 लोगों को मौत की सजा सुनाई. वहीं हाई कोर्ट ने इस साल जिन मामलों का निपटारा किया, उनमें करीब 90 फीसदी मामलों में या तो सजा रद्द कर दी गई या उम्रकैद में बदल दी गई या फिर मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेज दिया गया. इस रिपोर्ट का कहना है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बड़ी संख्या में बरी होने के मामले में संकेत देते हैं कि ट्रायल कोर्ट लेवल पर गलत, त्रुटिपूर्ण या अनुचित दोषसिद्धि हो रही है. इसे महज कुछ मामलों की गलती मान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2025 में ट्रायल कोर्ट्स में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के दिशा निर्देशों का बड़े पैमाने पर पालन नहीं किया. इन निर्देशों के तहत फांसी की सजा देने से पहले आरोपी की मानसिक स्थिति, प्रोबेशन रिपोर्ट और जेल रिकॉर्ड पर विचार करना जरूरी है. इसके बावजूद 83 में से 79 मामलों में इन नियमों का पालन नहीं हुआ है. इसके अलावा रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां ऊपरी अदालतें मृत्यु दंड को लेकर ज्यादा सतर्क होती जा रही है, वहीं संसद और राज्य विधानसभा मौत की सजा के दायरे को बढ़ाने वाले कानून बना रही है. इसके साथ ही उम्रकैद बिना रिहाई की संभावना वाली सजाओं का चलन भी बढ़ रहा है, जिसे रिपोर्ट ने एक नई और चिंताजनक समस्या बताया है.

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