लखनऊ पॉक्सो केस में बड़ा फैसला तीन दोषियों को सजा, न्यायालय की सख्त टिप्पणी

 तीन दोषियों को सुनाई गई 20- 20 साल की सजा, एक आरोपी बरी

लखनऊ पॉक्सो केस में बड़ा फैसला तीन दोषियों को सजा, न्यायालय की सख्त टिप्पणी

लखनऊ-सचिन बाजपेयी 

थाना नाका, जनपद लखनऊ के बहुचर्चित पॉक्सो एवं सामूहिक दुष्कर्म मामले में विशेष न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आरोपियों को दोषी करार दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश / विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट), लखनऊ  मोहम्मद कमरुज्जमा खान की अदालत ने मोहम्मद अफजल खान, मोहम्मद अशरफ और मुफ्ती अहमद को भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 5/6 के अंतर्गत दोषसिद्ध मानते हुए न्यूनतम 20-20 वर्ष के कठोर कारावास और प्रत्येक पर 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है।

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। साथ ही जेल में पूर्व में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा। अर्थदंड की पूरी धनराशि पीड़िता को नियमानुसार प्रदान किए जाने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि उसके पुनर्वास में सहायता मिल सके। अर्थदंड अदा न करने की स्थिति में दोषियों को अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

वर्ष 2019 की है घटना

यह मामला वर्ष 2019 का है। अभियोजन के अनुसार पीड़िता को बहला-फुसलाकर, डराकर तथा नशीला पदार्थ खिलाकर आरोपियों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। घटना के संबंध में थाना नाका में मुकदमा संख्या 146/2019 पंजीकृत किया गया था। विवेचना के उपरांत पुलिस द्वारा आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।

सुनवाई के दौरान पेश हुए साक्ष्य

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता, उसके पिता, चिकित्सक, एफआईआर लेखक तथा विवेचक सहित कई महत्वपूर्ण गवाहों को अदालत में प्रस्तुत किया गया। दस्तावेजी साक्ष्यों, चिकित्सकीय परीक्षण रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने यह माना कि तीनों आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोप संदेह से परे सिद्ध हुए हैं।

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एक आरोपी को मिला संदेह का लाभ

न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी इमरान अहमद को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि उसके विरुद्ध लगाए गए आरोप ठोस साक्ष्यों के अभाव में प्रमाणित नहीं हो सके।

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अधिवक्ताओं की भूमिका

अभियोजन पक्ष की ओर से  अभिषेक उपाध्याय, एडवोकेट तथा अरुण कुमार, एडवोकेट ने प्रभावी पैरवी की। वहीं, बचाव पक्ष की ओर से  एस.बी. सिंह, एडवोकेट ने आरोपियों का पक्ष रखा।

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पीड़िता की पहचान गोपनीय

विशेष न्यायालय ने पीड़िता की पहचान को पूर्णतः गोपनीय रखने के निर्देश देते हुए कहा कि निर्णय में या किसी भी सार्वजनिक मंच पर पीड़िता का नाम उजागर न किया जाए। साथ ही निर्णय की एक प्रति पीड़िता को निःशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश भी दिया गया है।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि नाबालिगों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराध अत्यंत गंभीर हैं और समाज पर गहरा दुष्प्रभाव डालते हैं। ऐसे मामलों में कठोर दंड दिया जाना न्यायहित में आवश्यक है, ताकि समाज में स्पष्ट संदेश जा सके। यह निर्णय 19 जनवरी  को खुले न्यायालय में सुनाया गया।

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