आज सुनाई दे रही हैं पहलगाम की चीख,
हाँ, दिन ऐसा आएगा आतंकी मांगे भीख।
निर्दोषो की बलि चढ़ी हैं बही लहू की धार,
हैवानों ने पर्यटकों की इज़्ज़त की तार-तार।
इन श्वानों ने ली हैं परीक्षा हमारी बार-बार,
कल्पना से ज्यादा सज़ा कर उठे चित्कार।
आज सुनाई दे रही हैं पहलगाम की चीख,
हाँ, दिन ऐसा आएगा आतंकी मांगे भीख।
उजड़े हुए सुहाग की कीमत मांगे हिंदुस्तान,
दाना-पानी को तरसेगा प्रतिदिन पाकिस्तान।
पुलवामा से नहीं शायद ली कोई भी सीख,
दुनियाभर से मांग रहा कटोरा लेकर भीख।
आज सुनाई दे रही हैं पहलगाम की चीख,
हाँ, दिन ऐसा आएगा आतंकी मांगे भीख।
ऐसा सबक सिखाओ मोदी-शाह-राजनाथ,
दरदर भटके न मिले पनाह मलते रहें हाथ।
हाँ, लेना है प्रतिशोध जन-जन हुआ अधीर,
आज तो लहू पुकार रहा नहीं मिलेगी खीर।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
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