अतिक्रमण और जाम से कराहते शहर: फुटपाथ गायब, सड़कें सिकुड़ीं, वक्त बर्बाद

 बेंगलुरु व कोलकाता की तरह अब उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, आगरा और इलाहाबाद जैसे शहर जाम से जूझ रहे हैं, फुटपाथों पर दुकानदारों व स्ट्रीट वैंडर ने कब्जा कर लिया है

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दिल्लीमुम्बई, बेंगलुरु व कोलकाता की तरह अब उत्तर प्रदेश के लखनऊकानपुरआगरा और इलाहाबाद जैसे शहर जाम से जूझ रहे हैंफुटपाथों पर दुकानदारों व स्ट्रीट वैंडर ने कब्जा कर लिया है आखिर अब पैदल चलने वाले लोग कहां चलें और वाहनों को चलाने वाले कहां वाहन चलायें। नतीजा सड़कों पर जाम आधा घंटे का रास्ता दो घंटे में पूरा हो रहा है और हमारे शहरों के नगर निगम व यातायात विभाग कुछ भी कर पाने में असमर्थ दिखाई दे रहा है। देश के नगर निगमों ने इंदौर नगर निगम से कुछ भी नहीं सीख पाया। सुबह 9 बजे  लखनऊ का आलमबागकानपुर का टाटमील चौराहाआगरा की एमजी रोड और इलाहाबाद का चौक व सिविल लाइंस हर जगह एक ही तस्वीर - सड़कें गाड़ियों से पैकफुटपाथ पर ठेलेदुकानों का सामान बाहरऔर लोग सड़क पर चलने को मजबूर। भारत के शहर तेजी से बढ़ रहे हैंलेकिन सड़कें उतनी ही रहीं। नतीजा: अतिक्रमण और ट्रैफिक जाम ने शहरों की सांस रोक दी है। अतिक्रमण: फुटपाथ पर कब्जासड़क पर हक। व्यावसायिक अतिक्रमण- दुकानदार शटर से 5-10 फीट बाहर सामान रख देते हैं। कपड़ेसब्जीमैकेनिक का सामान सब सड़क पर। आवासीय अतिक्रमण- कॉलोनियों में लोग घर के आगे पार्किंगबाउंड्री वॉलसीढ़ियां निकाल लेते हैं।

अस्थायी कब्जा-  ठेलेरेहड़ीटेंटधार्मिक आयोजन। एक बार लग गया तो हटाना मुश्किल। जगह की कमी- जमीन महंगी हैतो लोग सार्वजनिक जगह को निजी समझ लेते हैं। राजनीतिक संरक्षण- चुनाव के समय हटाने की हिम्मत कोई नहीं करता। वोट बैंक बन जाते हैं। प्रशासन की निष्क्रियता तोड़फोड़ होती हैफिर 15 दिन में वही स्थिति। जुर्माना वसूलने का सिस्टम कमजोर है। जाम: सिर्फ देरी नहींआर्थिक नुकसान- कितना बुरा है हालनीति आयोग के मुताबिक बेंगलुरुमुंबईदिल्ली में लोग औसतन सालाना 100-120 घंटे जाम में फंसते हैं। यानी 15 दिन सिर्फ गाड़ी में बैठे-बैठे। आर्थिक: ईंधन बर्बादीडिलीवरी में देरीप्रोडक्टिविटी गिरना। दिल्ली में हर साल 60,000 करोड़ रु का नुकसान सिर्फ ट्रैफिक जाम से होता है। स्वास्थ्य-  गाड़ी में बैठे-बैठे PM 2.5 और CO सांस में जाता है। एम्स की स्टडी कहती है कि ट्रैफिक पुलिस और ऑटो ड्राइवरों में फेफड़े की बीमारी 40% ज्यादा है। मानसिक तनाव- रोज 1 घंटा जाम में फंसने वाले लोगों में एंग्जाइटी और रोड रेज के केस 3 गुना ज्यादा हैं। अतिक्रमण और जाम एक-दूसरे को फीड करते हैं। सड़क 60 फीट की हैलेकिन 20 फीट पर दुकानों का सामान, 10 फीट पर पार्किंग। बच गई 30 फीट। 30 फीट पर 3 लेन की जगह 2 लेन बनती है। एक गाड़ी खराब हुई नहीं कि पूरी सड़क ब्लॉक। लोग फुटपाथ पर नहीं चल सकतेतो सड़क पर चलते हैं। इससे ट्रैफिक स्लो होता है।

यानी 10% सड़क पर कब्जा होने से ट्रैफिक की स्पीड 40% तक गिर जाती है। कुछ शहरों ने क्या कियाइंदौर का सिस्टम - बात जब स्मार्ट सिटी की होती है तो सबसे पहले इंदौर का नाम आता है क्योंकि इंदौर नगर निगम ने कई ऐसे प्रावधान किए हैं जिनसे अन्य नगर निगमों को सीख लेनी चाहिए। इंदौर नगर निगम ने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत 80% फुटपाथ खाली कराएस्ट्रीट वेंडर को वेंडिंग जोन में शिफ्ट किया। अब शहर स्वच्छता में नंबर 1 है और ट्रैफिक फ्लो बेहतर है। भुवनेश्वर ITMS यानी इंटेलिजेंट ट्रैफिक सिस्टम लगाया। कैमरे और AI से जाम का रियल टाइम एनालिस होता है। सिग्नल खुद एडजस्ट होते हैं। अहमदाबाद BRTS और फुटपाथ डेमार्केशन ने पैदल यात्रियों को जगह दी। अतिक्रमण पर जुर्माना सख्त किया। वेंडिंग जोन बनाओ-  हर 500 मीटर पर स्ट्रीट वेंडर के लिए जगह तय करो। दिल्ली में ये कानून 2014 में बनालेकिन लागू नहीं हुआ। रियल टाइम एक्शन-  शिकायत पर 24 घंटे में कार्रवाई। Noida का "हटाओ ऐप" इसका उदाहरण है। पार्किंग पॉलिसी-  रेजिडेंशियल एरिया में ऑन-स्ट्रीट पार्किंग को महंगा करो। ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग को सस्ता करो। मास ट्रांजिट- मेट्रोबससाइकिल लेन बढ़ाओ। जब लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट यूज करेंगे तो गाड़ी कम होगी। मास्टर प्लान में बदलाव-  नई कॉलोनियों में 30% जगह सड़क और फुटपाथ के लिए रिजर्व हो। जवाबदेही तय करो-  अतिक्रमण हटाने का टार्गेट म्यूनिसिपल कमिश्नर के दायरे में हो। हर 3 महीने में ऑडिट हो। नागरिक क्या कर सकते हैंफोटो खींचोरिपोर्ट करो- MCD, BMC, BBMP के पास ऐप हैं। 100 शिकायत पर एक्शन होता है।

स्थानीय दुकानदारों से बात करो- 10 दुकानदार मिलकर तय करें कि सामान अंदर रखेंगे। एकता काम करती है। पैदल चलो-  1-2 km के काम के लिए गाड़ी मत निकालो। साइकिल और मेट्रो यूज करो। शहर सिर्फ सीमेंट और कंक्रीट नहीं होतेवो लोगों के चलने-फिरनेसांस लेने की जगह हैं। जब फुटपाथ गायब हो जाएं और सड़कें पार्किंग बन जाएंतो शहर रहता नहींसिर्फ ट्रांजिट पॉइंट रह जाता है।

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अतिक्रमण हटाना सिर्फ बुलडोजर का काम नहीं है। ये पॉलिसीपॉलिटिक्स और पब्लिक के तीनों के बदलने से होगा। वरना अगले 10 साल में हमारे शहर सिर्फ गूगल मैप पर लाल रंग के दिखेंगे - जाम का रंग।

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