मजबूरी नही संगठित अपराध  बन चुका है  सूदखोरी 

आर्थिक शोषण का आतंक है सबसे खतरनाक खेल...!, गंदा है… पर धंधा है!

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लखीमपुर  खीरी-  कोई फिल्मी डायलॉग नहीं,यह उस काली सच्चाई का बयान है जो आज देश के कस्बों, गांवों और शहरों में खुलेआम ज़िंदगियाँ निगल रही है।सूदखोरी अब मजबूरी नहीं,संगठित अपराध बन चुकी है। गरीब, किसान और छोटे व्यापारी की मजबूरीइन सूदखोरों के लिए सबसे मुनाफ़े वाला धंधा है। जब बैंक दरवाज़ा बंद कर देते हैं, और सरकारी योजनाएं फाइलों में सड़ती हैं,तब मजबूर इंसानसूदखोर की चौखट पर जाता है और वहीं से उसकी बर्बादी की पटकथा लिख दी जाती है।तीन से पाँच रुपये सैकड़ा महीना यानी सालाना 40–50 प्रतिशत तक का ब्याज।
 
अगर एक महीना चूके तो ब्याज मूलधन बन जाता है। फिर ब्याज पर ब्याज,और अंत में ज़िंदगी गिरवी रख दी जाती है। यह कोई लेन-देन नहीं,यह आर्थिक शोषण का आतंक  का सबसे खतरनाक खेल बन गया है।दूसरे कर्ज का है। पहला सूदखोर दबाव बनाता है,दूसरा मददगार बनकर आता है। इंसान समझता हैकि राहत मिल गई। लेकिन दरअसल वह और गहरे दलदल में धकेल दिया जाता है। फिर शुरू होता है दुकान, खेती और ज़मीन पर कब्ज़ा। किस्त टूटते ही इज़्ज़त टूटने लगती है। और जब हर रास्ता बंद दिखता है,तो कई लोगज़िंदगी से ही हार मान लेते हैं।
 
सब कुछ सबके सामने है नाम, चेहरे, मोहल्ले, वसूली के तरीके। फिर भी सवाल उठता है कार्रवाई क्यों नहीं?पुलिस आती है, कागज़ी कार्रवाई होती है,उकसाने का मामला दर्ज होता हैऔर असली गुनहगारफिर से अगले शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं।यह सिर्फ कानून की नाकामी नहीं,यह प्रशासनिक संवेदनहीनता है। यह स्वीकारोक्ति है कि कमज़ोर की जान की कीमत ताकतवर के पैसे से कम है। सूदखोरी गैरकानूनी है यह बात सब जानते हैं।
 
लेकिन सवाल यह हैकि क्या कानून सिर्फ किताबों के लिए बना है, अगर अब भी सूदखोरों पर सख़्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था इस गंदे धंधे की मूक साझेदार बन चुकी है। क्योंकि जब शोषण चलता है और सत्ता चुप रहती है,तो अपराध सिर्फ सूदखोर का नहीं रहता पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा हो जाता है।

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