एक ही गुरु की शिक्षा से गढ़ी तीन पीढ़ियों की सफलता की मिसाल

लोहेपनिया गांव बना प्रेरणा केंद्र

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बलरामपुर / तुलसीपुर। कहते हैं कि सच्चा गुरु केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि पीढ़ियों का भविष्य गढ़ता है। इस कहावत को चरितार्थ किया है परिषदीय प्राथमिक विद्यालय लोहेपनिया के सेवानिवृत्त शिक्षक सुरेश चन्द्र तिवारी ने, जिनकी शिक्षा से एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों ने ऊँचाइयों को छुआ है।
 
ग्राम लोहेपनिया निवासी आकांक्षा तिवारी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा परिषदीय प्राथमिक विद्यालय लोहेपनिया से प्राप्त कर आगे चलकर बी.डी.एस. की डिग्री हासिल की। वहीं उनके भाई सौरभ तिवारी ने भी प्रारंभिक शिक्षा अपने मूल गांव से प्रारंभ कर मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक व एम.टेक की पढ़ाई पूरी की और वर्तमान में कनाडा में प्रोजेक्ट्स इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं।
 
परिवार की इस शैक्षिक विरासत की नींव उनके पिता महेंद्र तिवारी एडवोकेट ने रखी, जिन्होंने स्वयं भी परिषदीय प्राथमिक विद्यालय लोहेपनिया से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर लखनऊ विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई पूरी की। इसके पश्चात वे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में अधिवक्ता के रूप में कार्य करने लगे।
 
खास बात यह है कि पिता, पुत्र और पुत्री — तीनों को प्रारंभिक शिक्षा देने वाले एक ही गुरु सुरेश चन्द्र तिवारी रहे हैं, जो अब सेवा निवृत्त हो चुके हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा की ताकत का प्रमाण है।सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र में भी महेंद्र तिवारी की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
 
वे वर्ष 2015 से 2020 तक ग्राम पंचायत लोहेपनिया के प्रधान रहे और उनके नेतृत्व में जनपद में सर्वप्रथम गांव को खुले में शौच मुक्त बनाया गया। अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए जुगनू व मजनू टीम का गठन कर सक्रिय पहल की गई।
 
स्वच्छता अभियान में बढ़-चढ़कर भागीदारी के साथ-साथ कोविड महामारी के दौरान ग्रामीणों को मास्क, सेनेटाइजर व डिटॉल साबुन वितरित कर जागरूक किया गया तथा पुलिस और ग्रामीणों के बीच संवाद स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई गई।
 
उनके सामाजिक योगदान को देखते हुए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक देव रंजन वर्मा द्वारा परिवार परामर्श केंद्र में काउंसलर, वहीं तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी रवीश गुप्ता एवं जिलाधिकारी राकेश मिश्रा द्वारा जिला स्वच्छता समिति का सदस्य मनोनीत किया गया। प्रशासन द्वारा समय-समय पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया गया। लोहेपनिया गांव की यह कहानी न केवल शिक्षा, बल्कि संस्कार, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरी है।

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