भारत का 77 वां गणतंत्र बनाम स्त्री विमर्श

महिलाओं को सहभागिता तथा अस्मिता की तलाश

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भारत के 77वें गणतंत्र में प्रवेश करते हुए जब हम लोकतांत्रिक व्यवस्था की  पड़ताल करते हैं तो यह स्थिति हमारे सामने खड़ी होती है कि क्या स्वतंत्रता की यह यात्रा स्त्रियों को भी उसी गरिमा, समानता और अधिकार तक पहुँचा पाई है जिसका वादा संविधान ने जोर शोर से किया था। वास्तविकता यह है कि आज भी स्त्री भारतीय लोकतंत्र में केवल संख्या नहीं बल्कि स्वीकृति, सहभागिता और निर्णायक उपस्थिति की तलाश में संघर्षरत है।

स्वतंत्रता आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली स्त्री आज भी सत्ता, नीति और सामाजिक निर्णयों के केंद्र से दूर रखी जाती है। संसद से पंचायत तक प्रतिनिधित्व की बात हो या शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम और सुरक्षा के सवाल, हर जगह स्त्री की भागीदारी सीमित और संघर्षपूर्ण दिखाई देती है। लोकतंत्र ने उसे मताधिकार तो दिया पर मानसिक स्वतंत्रता अभी अधूरी है, अभी पुरुषों के निर्देशन में ही में ही कार्य संपादित करना पड़ता है।

कानूनी अधिकार तो प्रदत्त किए हैं पर सामाजिक चेतना का विस्तार नहीं हुआ है, बेटी बचाओ से लेकर बेटी पढ़ाओ तक के नारे गूंजे लेकिन बेटी को निर्णयकर्ता बनाने का साहस समाज अभी तक नहीं जुटा पाया है।, स्त्री आज भी दोहरी जिम्मेदारियों के बोझ निर्वहन कर रही है। जहाँ एक ओर उससे आधुनिक होने की अपेक्षा की जाती है तो दूसरी ओर परंपराओं की जंजीरों में जकड़कर उसकी उड़ान के पंख काट दिए गए  है।

कार्यस्थलों पर समान वेतन की लड़ाई हो या घर के भीतर अदृश्य श्रम की अनदेखी, स्त्री का श्रम आज भी कम आँका जाता है, डिजिटल युग में प्रवेश के बावजूद तकनीक और संसाधनों तक उसकी पहुँच सीमित है जिससे नया लोकतांत्रिक स्पेस भी पुरुष प्रधान होता जा रहा है।

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राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रश्न दशकों से प्रतीक्षा में है जो यह दर्शाता है कि लोकतंत्र स्त्री को भागीदार नहीं बल्कि प्रतीक भर मानता रहा है, हिंसा के आँकड़े बताते हैं कि स्त्री का शरीर आज भी सत्ता, वर्चस्व और असहिष्णुता का मैदान बना हुआ है और न्याय की प्रक्रिया उसके लिए लंबी, जटिल और कई बार अपमानजनक हो जाती है।

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यह विडंबना ही है कि जिस लोकतंत्र की बुनियाद समानता पर टिकी है उसी लोकतंत्र में स्त्री को अपनी अस्मिता सिद्ध करनी पड़ती है, नए संदर्भों में देखें तो स्त्री केवल पीड़िता नहीं बल्कि परिवर्तन की वाहक भी है, स्वयं सहायता समूहों से लेकर स्टार्टअप संस्कृति तक, आंदोलन से लेकर साहित्य और मीडिया तक, स्त्री अपनी नई भाषा गढ़ रही है जो अधिकार के साथ आत्मसम्मान की भी मांग करती है।

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आज की स्त्री दया नहीं अवसर चाहती है, संरक्षण नहीं साझेदारी चाहती है और प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि निर्णय में हिस्सेदारी चाहती है, 77वें गणतंत्र का गर्व तभी सार्थक होगा जब लोकतंत्र केवल पुरुष अनुभव का विस्तार न रहकर स्त्री दृष्टि से भी पुनर्परिभाषित होगा, जब नीति निर्माण में स्त्री का जीवन अनुभव शामिल होगा, जब घर, समाज और सत्ता तीनों स्तरों पर बराबरी की संस्कृति विकसित होगी, क्योंकि स्त्री की स्वतंत्रता किसी एक वर्ग का प्रश्न नहीं बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता की कसौटी है और जब तक स्त्री अपनी उपस्थिति नहीं बल्कि अपना स्थान सुनिश्चित नहीं कर लेती तब तक भारतीय लोकतंत्र अधूरा, असंतुलित और आत्मगौरव से वंचित ही रहेगा।

इसी संघर्षपूर्ण लोकतंत्र में कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी हैं जिन्होंने तमाम बाधाओं, उपेक्षाओं और सामाजिक दीवारों को तोड़कर अपनी पहचान गढ़ी और व्यवस्था को आईना दिखाया, द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक पहुँचना आदिवासी स्त्री की उस यात्रा का प्रतीक है जो सदियों से हाशिये पर रही है। उनके राष्ट्रपति बना आदिवासी गौरव का बड़ा प्रतीक है।

कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में भारत की स्त्री चेतना को नई ऊँचाई दी, मैरी कॉम ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों और सामाजिक बंधनों के बावजूद एक स्त्री विश्व मंच पर भारत का गौरव बन सकती है। इरोम शर्मिला ने अहिंसक संघर्ष के माध्यम से लोकतंत्र को उसकी संवेदनशीलता याद दिलाई, फातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले की विरासत को आगे बढ़ाती आज की शिक्षिकाएँ आज भी शिक्षा को स्त्री मुक्ति का हथियार बना रही हैं।

अरुणिमा सिन्हा ने शारीरिक अक्षमता को पराजित कर यह सिद्ध किया कि स्त्री की शक्ति सहानुभूति की मोहताज नहीं होती। मिताली राज और पीवी सिंधु ने खेल के मैदान में पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी, किरण बेदी ने प्रशासन में स्त्री नेतृत्व की कठोर लेकिन संवेदनशील छवि प्रस्तुत की, अंजू बॉबी जॉर्ज से लेकर बछेंद्री पाल तक पहाड़ और मैदान दोनों जगह स्त्री ने अपने साहस की छाप छोड़ी, ये नाम केवल व्यक्तिगत सफलताएँ नहीं हैं बल्कि उस लोकतंत्र की खामियों के बीच उग आए प्रतिरोध के दीप हैं जो यह बताते हैं कि स्त्री अवसर मिले तो नीति, नेतृत्व और नवाचार में किसी से पीछे नहीं है।

फिर भी यह विडंबना बनी हुई है कि इन उदाहरणों को अपवाद मान लिया जाता है और स्त्री की सामूहिक स्थिति जस की तस बनी रहती है, 77वें गणतंत्र का वास्तविक गर्व तब होगा जब इन संघर्षरत स्त्रियों की कहानियाँ प्रेरणा भर नहीं बल्कि नीति और सामाजिक व्यवहार का आधार बनेंगी, जब लोकतंत्र स्त्री को प्रतीक नहीं बल्कि सहभागी मानेगा, क्योंकि इन स्त्रियों का संघर्ष यह स्पष्ट करता है कि स्त्री की सफलता दया से नहीं बल्कि अधिकार, अवसर और आत्मसम्मान से जन्म लेती है। जब तक यह समझ व्यापक नहीं होती तब तक भारतीय लोकतंत्र में आधी आबादी के  अपने हक तथा सहभागिता की अपेक्षा में इंतजार कर रही होगी।

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