फर्जी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों के विरुद्ध आदिवासियों का पैदल मार्च

लंबे समय से चल रहा जनजातीय अधिकारों का संघर्ष

अजित सिंह / राजेश तिवारी Picture
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स्वतंत्र प्रभात संवाददाता

अनपरा/ सोनभद्र-

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के विभिन्न जनपदों-कुशीनगर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, मऊ, आजमगढ़, सोनभद्र सहित कुल 17 जनपदों में ‘गोंड’ एवं ‘खरवार’ अनुसूचित जनजाति के नाम पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाए जाने के गंभीर मामलों को लेकर जन आंदोलन लगातार चल रहा है। इस अभियान और कार्यक्रम की अगुवाई सामाजिक कार्यकर्ता हरिनाथ खरवार द्वारा की जा रही है, जो बीते लंबे समय से अनुसूचित जनजाति समाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के विरोध तथा वास्तविक आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं।

उनका आरोप है कि बीते लगभग 30–35 वर्षों से अन्य जातियों के लोगों द्वारा अपनी वास्तविक जाति छिपाकर योजनाबद्ध ढंग से ‘गोंड’ एवं ‘खरवार’ (एसटी) के फर्जी प्रमाण पत्र बनवाए जा रहे हैं, जिससे वास्तविक जनजातीय समाज के युवाओं को शिक्षा, उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अधिकारों से वंचित होना पड़ा है। श्री हरिनाथ खरवार के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन से जुड़े जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार से मांग की है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा हेतु इस गंभीर मामले में तत्काल, पारदर्शी और कठोर कार्रवाई की जाए।

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आन्दोलन के मुख्य बिंदु -

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• फर्जी प्रमाण पत्रों के कारण जनजातीय समाज के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन हुआ है।

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• अनुसूचित जनजाति कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अपात्र लोग उठा रहे हैं।

• भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (C&LM प्रभाग) के निर्देशों के बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है।

आन्दोलन में आदिवासिओ की मुख्य मांगें-

• पिछले 35 वर्षों में जारी ‘गोंड’ एवं ‘खरवार’ जाति प्रमाण पत्रों की उच्च स्तरीय या विशेष समिति से जांच कराई जाए।

• दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के प्रमाण पत्र तत्काल निरस्त कर उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के अंतर्गत एफआईआर दर्ज की जाए।

• माननीय उच्चतम न्यायालय के माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त प्रकरण में दिए गए निर्देशों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।

• प्रत्येक संबंधित जनपद में स्वतंत्र विजिलेंस सेल का गठन किया जाए, जिसमें DSP/ASP स्तर के पुलिस अधिकारी, जनजातीय मामलों के जानकार अनुसंधान अधिकारी एवं स्थानीय पुलिस अधिकारी शामिल हों।

• जांच की निष्पक्षता बनाए रखने हेतु किसी भी राजस्व या सेवारत प्रशासनिक अधिकारी को विजिलेंस सेल में शामिल न किया जाए।

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