राष्ट्रीय बालिका दिवस: सशक्त बेटियाँ, समृद्ध राष्ट्र

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किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी आधी आबादी—स्त्रियों और बालिकाओं—को कितना सम्मान, सुरक्षा और अवसर प्रदान करता है। भारत, जो स्वयं को विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में गिनता है, इस कसौटी पर आज भी पूरी तरह खरा नहीं उतर पाया है।

एक ओर हमारे शास्त्रों में नारी को ‘शक्ति’, ‘जननी’ और ‘सृजन की आधारशिला’ कहा गया है, तो दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ में कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, दहेज प्रथा, शिक्षा से वंचन और असुरक्षा जैसी समस्याएँ आज भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक विवेक को झकझोरने का अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कन्याओं का उत्थान केवल एक वर्ग विशेष का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई, जब यह महसूस किया गया कि बालिकाओं से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित एक विशेष दिन की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट था—बालिकाओं के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना, उनके अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समान अवसर उपलब्ध कराना। यह दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में उस भारत का निर्माण कर पा रहे हैं, जहाँ बेटी का जन्म उत्सव का कारण बने, बोझ का नहीं। दुर्भाग्यवश, आज भी देश के कई हिस्सों में बेटी का जन्म चुप्पी और चिंता के साथ स्वीकार किया जाता है, जबकि बेटे के जन्म पर उत्सव मनाया जाता है। यह मानसिकता ही समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है।

 

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आँकड़े इस सच्चाई को और स्पष्ट करते हैं। हाल के वर्षों में लिंगानुपात में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन यह सुधार असमान और असंतुलित है। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। कन्या भ्रूण हत्या और लिंग चयन जैसी अमानवीय प्रथाएँ कानून के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। प्राथमिक स्तर पर नामांकन बढ़ा है, लेकिन किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते बड़ी संख्या में लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। गरीबी, घरेलू काम का बोझ, असुरक्षित परिवेश, परिवहन की कमी और सामाजिक दबाव इसके प्रमुख कारण हैं। यह स्थिति केवल बालिकाओं की व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि देश की मानव संसाधन क्षमता पर सीधा आघात है।

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स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी बालिकाओं की स्थिति चिंताजनक है। कुपोषण, एनीमिया और कम उम्र में विवाह व मातृत्व उनके शारीरिक और मानसिक विकास को बाधित करते हैं। एक कमजोर और अस्वस्थ बालिका आगे चलकर स्वस्थ समाज की नींव नहीं रख सकती। इसके साथ ही, सुरक्षा का प्रश्न लगातार गंभीर होता जा रहा है। यौन हिंसा, घरेलू उत्पीड़न और अब साइबर अपराधों ने बालिकाओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में नारी को देवी कहा जाता है, उसी समाज में वह सबसे अधिक असुरक्षित भी है।

 

सरकारों ने समय-समय पर बालिकाओं के उत्थान के लिए कई योजनाएँ और कार्यक्रम शुरू किए हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहल ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का काम किया है। शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और कौशल विकास से जुड़ी योजनाओं ने कई बालिकाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव भी लाया है।

 

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, छात्रवृत्तियाँ, मुफ्त साइकिल और पोषण अभियान जैसे प्रयासों ने यह साबित किया है कि यदि नीति और नीयत सही हो, तो बदलाव संभव है। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि योजनाओं की सफलता उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है, और यही वह क्षेत्र है जहाँ अभी भी गंभीर सुधार की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार, जागरूकता की कमी और सामाजिक उदासीनता कई अच्छी योजनाओं को कागज़ों तक सीमित कर देती हैं।

 

हालाँकि यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि बालिकाओं का उत्थान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। समाज और परिवार की भूमिका इसमें कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। जब तक माता-पिता बेटे और बेटी में भेद करना नहीं छोड़ेंगे, जब तक बेटी की शिक्षा को ‘जरूरत’ नहीं बल्कि ‘अनावश्यक खर्च’ समझा जाएगा, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। परिवार ही वह पहली पाठशाला है जहाँ समानता, सम्मान और आत्मविश्वास के बीज बोए जाते हैं। यदि वही पाठशाला भेदभाव सिखाएगी, तो समाज से बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ होगा।

 

शिक्षा बालिकाओं के सशक्तिकरण की सबसे मजबूत आधारशिला है। शिक्षित बालिका न केवल अपने अधिकारों को पहचानती है, बल्कि समाज में अपनी भूमिका को भी आत्मविश्वास के साथ निभाती है। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती है, निर्णय लेने में सक्षम होती है और अगली पीढ़ी को भी बेहतर दिशा देती है। यही कारण है कि बालिकाओं की शिक्षा में निवेश करना दरअसल राष्ट्र के भविष्य में निवेश करना है। आज आवश्यकता है कि शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जीवन कौशल, तकनीकी प्रशिक्षण और आत्मरक्षा जैसे पहलुओं को भी इसमें शामिल किया जाए।

 

राष्ट्रीय बालिका दिवस का महत्व इसी व्यापक दृष्टि में निहित है। यह दिन हमें केवल समस्याएँ गिनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि समाधान की दिशा में सोचने और संकल्प लेने का मंच भी प्रदान करता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि बालिकाओं के अधिकार कोई दया या अनुदान नहीं, बल्कि उनका जन्मसिद्ध अधिकार हैं। एक ऐसा राष्ट्र जो अपनी बालिकाओं को सुरक्षित, शिक्षित और सशक्त नहीं बना सकता, वह दीर्घकालिक प्रगति का सपना भी नहीं देख सकता।

 

आज जब भारत विश्व मंच पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित करने की बात करता है, तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम अपने सामाजिक आधार को भी उतना ही मजबूत करें। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक उपलब्धियाँ तब तक अधूरी हैं, जब तक समाज के सबसे कमजोर वर्ग—बालिकाएँ—सुरक्षित और सम्मानित नहीं हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें इसी अधूरेपन का एहसास कराता है।

 

अंततः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कन्याओं का उत्थान केवल सामाजिक सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व और भविष्य का सवाल है। जब एक बालिका भय के बिना जन्म ले सके, शिक्षा के साथ अपने सपनों को आकार दे सके और सम्मान के साथ समाज में जी सके, तभी यह देश वास्तव में प्रगतिशील कहलाएगा। राष्ट्रीय बालिका दिवस पर हमें केवल भाषण और आयोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाने का ईमानदार प्रयास करना चाहिए। क्योंकि सच यही है कि सशक्त बालिका ही सशक्त भारत की सबसे मजबूत नींव है।

 

महेन्द्र तिवारी

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