बेटियों का कागज़ी कवच और सामाजिक बेड़ियां
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बेटियाँ घर की रौनक होती है, समाज की शक्ति होती है और राष्ट्र की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। फिर भी डिजिटल युग में भी देश की बेटियां समान अवसर, सुरक्षा एवं लैंगिक समानता की उपेक्षा का बोझ ढ़ो रही हैं। सरकार ने बेटियों के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियाँ और कानून बनाए हैं, जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, सुकन्या समृद्धि योजना, महिला आरक्षण विधेयक, पास्को एक्ट, घरेलू हिंसा से सुरक्षा कानून और अन्य कल्याणकारी योजनाएँ, जिनके माध्यम से बेटियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और कानूनी अधिकार प्रदान करने के प्रयास किए गए हैं। इन योजनाओं से कुछ सकारात्मक बदलाव भी दिखे हैं, जैसे जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार और लड़कियों की साक्षरता दर में वृद्धि।
फिर भी, जमीनी हकीकत आज भी कड़वी बनी हुई है। सामाजिक सुरक्षा के अभाव में लड़कियों की उन्नति दिखावा मात्र है। जिस समाज मे हर रोज कोई लड़की या महिला के साथ बलात्कार का शिकार होती हो, उस समाज को प्रगतिशील कहना, दोगलापन है। राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, देश मे प्रतिदिन 81 रेप के पुलिस केस दर्ज होते है। ये तो बस आंकड़े है, अधिकतर घटनाएं तो लोक-लाज के डर से परिवार और समाज द्वारा छिपा लिए जाते है। जहां एक तरफ लड़कियों के लिए समान अवसरों की बातें तो बोली जाती हैं, वही दूसरी तरफ घरेलू जिम्मेदारियाँ लड़कियों पर ही लाद दी जाती हैं। आज भी लड़कियों को खुद के सपने चुनने का अधिकार नहीं और ना ही स्वतंत्रता से कहीं आने-जाने की छूट भी नहीं मिलती है। साथ ही, रसोई और घरेलू कामों का बोझ शुरू से ही उनके कंधों पर डाल दिया जाता है।
वास्तविकता में, लड़कियों को स्वतंत्रता और समान अवसर की सुविधाएँ केवल मौखिक एवं कागजी स्तर पर ही सीमित रही है। वैश्विक लैंगिक रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत 148 देशों में 131वें स्थान पर है। आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की अपेक्षा अधिक कम है। घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ इतना भारी है कि शिक्षा में आगे होने के बावजूद कई लड़कियाँ नौकरी या आगे की पढ़ाई छोड़ देती हैं। पितृसत्तात्मक मानसिकता, लैंगिक भेदभाव, असुरक्षा की भावना और कार्यस्थल पर भेदभाव जैसी चुनौतियाँ हर कदम पर उन्हें कमजोर करती हैं। आज भी लाखों लड़कियाँ शिक्षा और नौकरी के अवसरों से वंचित रह जाती हैं, और उनका जीवन संघर्षपूर्ण बना हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण है, सामाजिक एवं पारिवारिक सहयोग का प्राप्त ना होना।
डिजिटल युग में भी साइबर हिंसा और ऑनलाइन उत्पीड़न ने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। खुले आम महिलाओं को टारगेट किया जा रहा है, उनके चरित्र पर उंगलियाँ उठाई और गालियाँ दी जा रही हैं। यह हिंसा न केवल व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को चोट पहुँचाती है, बल्कि उन्हें ऑनलाइन स्पेस से दूर रहने, अपनी राय व्यक्त न करने या डिजिटल दुनिया से कट जाने पर मजबूर करने की साजिश है। डिजिटल युग की यह क्रूर सच्चाई है कि जहाँ इंटरनेट ने महिलाओं को आवाज दी, शिक्षा दी और अवसर दिए, वहीं वही प्लेटफॉर्म उनके लिए खतरा बन गए हैं।
हमारे देश में परिवार और समाज में लैंगिक भेदभाव सबसे बड़ी विडंबना है। लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए बचपन से ही शिक्षा और घर-समुदाय स्तर पर हस्तक्षेप बहुत जरूरी है। सही मायने में, देश की बेटियां की वास्तविक प्रगति तब होगी, जब कानून और योजनाएँ सिर्फ घोषणाएँ न रहें, बल्कि समाज की सोच बदलने, जमीनी सुरक्षा सुनिश्चित करने, घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ बाँटने और हर बेटी को बराबरी का हक दिलाने में सक्षम बनें। हमारे देश को “बेटी पढ़ाओ और, बेटी बचाओ" नारे की अपेक्षा "समाज और परिवार में बेटियों के प्रति भेदभाव मिटाओ" नारे की ज्यादा ही जरूरत हैं।
अम्बिका कुशवाहा अम्बी
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