दहेज दानव का अन्त कैसे हो ?
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विवाह एक सामाजिक प्रक्रिया है। समाज की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए विवाह-संस्कार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। दुनियाँ के सभी समाजों में, चाहे वे आदिवासी हों, चाहे सुसंस्कृतः विवाह की प्रक्रिया किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में है। कहीं युवती और युवक स्वयं एक-दूसरे का चुनाव करते हैं तो कहीं समाज के बड़े-बुजुर्ग कुल और खानदान के आधार पर अपने बच्चों, की जोड़ी मिलाकर विवाह की अनुमति प्रदान करते हैं।
आजकल विवाह-शादी का रूप शनैः शनैः विकृत होता जा रहा है। सामान्य और पिछड़े वर्ग जहाँ अपनी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं, वहाँ उच्च और मध्यम वर्ग परम्परा के पाटों में पिसने लगा है। विवाह विवशता में बदल रहा है। समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा इससे घुटन महसूस कर रहा है। क्यों? धर्म का कार्य समाज और व्यक्ति को सुखी एवं मुक्ति का राही बनाने का है। दुःखी व्यक्ति कभी भी धर्म की बात सच्चे मन से सोच ही नहीं सकता। इसलिए यदि हम सच्चे धार्मिक हैं तो व्यष्टि को ही नहीं समष्टि को भी सुखी बनाने का प्रयत्न करें।
विवाह गृहस्थाश्रम में जाने की प्रथम सीढ़ी है। प्रत्येक व्यक्ति कभी-न-कभी गृहस्थ का अंग होता है। साधु-संन्यासी भी कभी गृहस्थ के रूप में थे। वे उसी से अलग होकर कुछ दूर चले गये। वे अब सम्पूर्ण समाज के हैं। सम्पूर्ण विश्व के हैं। गृहस्थ अपने परिवार के लिए चिन्ता करता है, तो सन्त समग्र समाज की चिन्ता करता है। वह गृहस्थों-श्रावकों को गृहस्थ-जीवन में रहकर भी मुक्ति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। यदि समाज जान-बूझकर दुःखों की चादर ओढ़ना प्रारम्भ कर दे तो फिर वह समाज कलंकित हो जाता है। उस समाज में अशान्ति पैदा हो जाती है। वह समाज घुन लगी लकड़ी की भाँति क्षीण होने लगता है।
जब मानव में भाव-साधना जाग्रत होती है तो द्रव्य-साधना अपने आप छूटने लगती है। मुमुक्ष आत्मा परम तत्त्व को प्राप्त करने के लिये शास्त्र, स्वाध्याय एवं श्रुत में रम जाता है। उससे मन को परम शान्ति का आभास होता है। शान्ति को हम क्रय नहीं कर सकते. शान्ति कहीं बाहर नहीं है। आप जितने बाहर जायेंगे, अशान्ति उतनी ही बढती जायेगी, जितने अपने अन्दर जाओगे, मन के भीतर जाओगे, उतना ही शान्ति का द्वार खुलता जायेगा। अँधेरा सिमटता जायेगा, रोशनी उभरती जायेगी। पर लोग तो अँधेरे के उपासक होने लगे हैं। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बहाने बनाने लगे हैं। अपने मन की शान्ति के लिए दूसरों का चैन समाप्त करने पर तुले हैं। ऐसे लोगों का क्या किया जाये ? भाव-साधना के बजाय द्रव्य साधना ही उनके जीवन का उद्देश्य हो गया है। वे उसी में शान्ति अनुभव करते हैं।
अभिप्राय यह है कि हमारा मन असंयत हो गया है। जहाँ संयम टूटने लगता है, वहीं पतन प्रारम्भ हो जाता है। आज विवाह-जैसे पवित्र और संस्कारित कार्यों मेंदरारें पैदा होने लगी हैं। पचास वर्ष पहले का समाज कहाँ चला गया? आज आये दिन ऐसे-ऐसे समाचार सुनने को मिलते हैं, जिनके कारण समाज को सिर झुकाने के लिये विवश होना पड़ता है। जैन समाज की गिनती धन-सम्पन्न समाज में की जाती है। उसमें गलत परम्पराओं का प्रवेश धर्म की धज्जियाँ उड़ाने वाला है।
शादी से पहले सौदे होने लगे हैं। लड़का, लड़का न होकर क्रय की वस्तु हो गया है। उसकी बोली लगाई जाने लगी है। जो जितना अधिक दहेज देगा, उसी की लड़की के साथ हम अपने लड़के का विवाह करेंगे। आज योग्यता को गौण कर दिया गया है। पर कब तक ? सोचिए, ठंडे मस्तिष्क से सोचिए। दहेज के पीछे छिपी धारणा पर विचार कीजिए कि भारतीय समाज में लड़की को दहेज क्यों दिया जाता था ?
माता-पिता के लिए लड़के और लड़की दोनों के प्रति समान स्नेह होता है। लड़की और लड़के का पिता की सम्पत्ति पर समान अधिकार होता है, चूँकि लड़की विवाह के पश्चात् पिता का घर छोड़कर पति के घर जाती है, अतः पिता अपनी क्षमता के अनुसार अपने उपार्जित धन का कुछ भाग दान-दहेज के रूप में लड़की को देता है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है, जो वस्तुतः प्रीतिदान का ही रूप है।
लेकिन अब तक वर पक्ष कभी भी इसकी माँग नहीं करता था। जो दे दिया वह ले लिया। जब से वर पक्ष ने माँगना प्रारम्भ कर दिया, इस प्रथा का रूप बीभत्स और विकृत हो गया। सगाई-सम्बन्ध से पहले यह चर्चा होती है कि विवाह में कितना धन लगाओगे ? कितना सोना दोगे ? कितना नकद ? सामान क्या-क्या दोगे? हमारी यह शर्त है। यदि लड़की वाला शर्त स्वीकार कर लेता है, तो सम्बन्ध हो जाता है, वरना सुन्दर जोड़ी भी टूट जाती है। माता-पिता के समक्ष लड़के-लड़की चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। दहेज का महाराक्षस दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।
वे दिन अभी अधिक दूर नहीं हुए, जब लड़कों के विवाह हेतु लड़की वालों को रुपया देना होता था। मैं मानता हूँ कि यह भी बुरी बात थी कि कोई पिता रुपये लेकर अपनी लड़की का हाथ लड़के के हाथ में दे। यह तो लड़की को बेचना था। लेकिन आज जो हो रहा है, वह कौन-सा अच्छा है? दहेज देने के लिए लड़की के पिता को विवश किया जा रहा है। लड़की के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है, यहाँ तक कि दहेज के लोभी-पापी भेड़िये लड़की को जलाकर हत्या करने लगे हैं। जहर देकर मारने लगे हैं।
यहाँ में यह कहूँगा कि ऐसा करने वाले अपने जीवन में कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर सकेंगे। दूसरों की लड़की के साथ अन्याय, अत्याचार करने वालों को यह नहीं भूलना है कि उनके भी लड़की है। वह भी वधू बनकर विदा होगी। समाज को ऊँचा उठाना है तो उच्च वर्ग को आगे आना पड़ेगा। उन्हें मध्यम वर्ग की सिसकी सुननी पड़ेगी। क्या हमसब तैयार हैं? दूसरों के कमाये धन से जीवन निकलने वाला नहीं है। व्यक्ति का अपना पुरुषार्थ ही काम आयेगा। दहेज में प्राप्त धन को देखकर कुछ समय भले ही प्रसन्न हो जाओ, मगर वास्तविकता जानने के पश्चात् तो पश्चात्ताप ही करना पड़ेगा।व्यंग से सुशोभित होती परम्पराए।-
दहेज में उनको इतना सामान दिया गया कि वर व उसका पिता उसे देख-देखकर फूल गये। वे सामान तो ले गये लेकिन वधू को स्टेशन पर भूल गये।हो जाती हैं ऐसी घटनाएँ प्रायः विवाह के दिनों में। ऐसी-ऐसी घटनाएँ आये दिन सुनने को मिलती हैं तो आश्चर्य होता है। एक ताजा घटना है दहेज के भूखों ने वधू पक्ष वालों से कहा कि विवाह में आपको वहीं चीजें देनी होंगी, जो हम आपको बतायेंगे। वधू पक्ष वाला भी सम्पन्न था। उसने कहा कि आपको जो चाहिए, उसकी सूची बनाकर दे दें।
बारात पहुँच गई। सारा सामान सूची के अनुसार सजा दिया गया। बाराती नाश्ता और भोजन की प्रतीक्षा करने लगे। मगर वधू पक्ष वाले उनकी बात को अनसुनी करते रहे। लोगों ने सोचा शायद विवाह के पश्चात् भोजन की व्यवस्था होंगी। दुल्हा-दुल्हन फेरों में बैठ गये। विवाह हो गया। बेचारे बारातियों का भूख के मारे हाल बेहाल हो रहा था। उन्होंने कहा- "क्या बात है? भोजन का कुछ पता ही नहीं है।" वर के पिता कन्या के पिता से बोले "समधी जी, बारात को भूख लग रही है। अभी तक आपने यह नहीं बताया है कि भोजन कहाँ करना है?"
कौन-सा भोजन ? विवाह की सूची में तो भोजन की बात ही नहीं थी। यदि सूची में लिखते तो वह भी करते, यह कहकर उसने अपनी जेब से एक लम्बी सूची निकालकर सामने रख दी। बाराती सूची देखकर हैरान रह गये। वे वर के पिता का मुँह ताकने लगे।वर का पिता शर्म से पानी-पानी हो गया, मगर अब क्या हो सकता था ? उसने हाथ जोड़कर कन्या के पिता से कहा- "मुझे क्षमा करें, आप चाहे कुछ भी दहेज में न दे,मगर बाराती भूखे है। उनके भोजन की व्यवस्था भी करावा दे।तब कन्या पक्ष वालो को बारातियों को भोजन कराया।
अपनी नाक रखने के लिए समाज में होने वाली बेइज्जती से बचने के लिए दहेज के भूखे दहेज लाने के बजाय रुपया देकर अपने लड़के की शादी करने पर विवश हो रहे हैं। कभी-कभी दहेज के कारण पत्नी के समक्ष पति की स्थिति बड़ी दयनीय होती देखी गई है। एक घटना के अनुसार लड़की वालों ने लड़के की इच्छा के अनुसार दहेज दिया। उसमें कार, फ्रीज, सोना, नकद धन और घरेलू आवश्यकता की अन्च वस्तुएँ जो भी माँगी गईं, वे सब दी गईं। विवाह शान्ति से हो गया। लड़की ससुराल चली गई।
उसका स्वभाव कुछ तेज था। सास ने उसे कुछ समय बाद घर का काम करने को कहा तो बोली-"मैं क्या तुम्हारी दासी हूँ जो काम करूँगी? मेरे पिता ने पचास लाख रुपये खर्च इसलिए किये हैं कि मैं ससुराल में आराम से रह सकूँ। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो, इसलिए आप मुझसे किसी काम की अपेक्षा न करें। एक बात आप और सुन लें, मेरे पिता ने रुपया खर्च करके तुम्हारे बेटे को खरीदकर मुझे दे दिया है। ज्यादा चूँ-चपड़ करोगी तो उसे लेकर चली जाऊँगी।"
बहू के मुख से ये बातें सुनकर बेचारी सास की हालत पतली हो गई। पति को तो उसने पहले ही अपना गुलाम बना लिया था। जो पत्नी कहती, पति वही करता। एक दिन उसके माता-पिता बोले- "बेटा ! यह तो पराये घर की है, मगर तू इतना बदल जायेगा ऐसा हमें विश्वास नहीं था। इस पर लड़के ने कहा- "पिता जी, दहेज माँगकर आपने मुझे बोलने योग्य कहाँ रखा है? सचमुच आपने इसके पिता से दहेज की माँग करके मुझे अपने से दूर कर दिया है।"
दहेज माँगने वालों को यह नहीं भूल जाना चाहिए कि वह भी किसी बहिन का भाई है। कल वह भी किसी बेटी का पिता बनेगा। जो बर्ताव वह लड़की वालों के साथ कर रहा है, आने वाले समय, में उसके साथ भी वही बर्ताव हो सकता है। विवाह-जैसे पवित्र बन्धन को दहेज की कुरीति से कलंकित बनाना पवित्र परम्पराओं का अपमान करना है। आज इस कुरीति से समाज टूट रहा है। माता-पिता अपना समाज छोड़कर दूसरे समाज में अपनी बेटी को देने के लिए मजबूर हो रहे हैं। बहुत-सी पढ़ी-लिखी लड़कियाँ उम्र के एक मोड़ पर आकर विवाह से मुख मोड़ने लगी हैं। वे नौकरी करके अपने पाँवों पर खड़ी होना अधिक उपयुक्त समझने लगी हैं।
कांतिलाल मांडोत
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