कविता

मंगलू ने पी शराब

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संजीव-नी।

मंगलू ने पी शराब,
तब से हुई किस्मत खराब।

मंगलू कभी
अपने नाम जैसा सीधा
हाथों में मेहनत,
आँखों में भरोसा था,
और घर में
रोटी की खुशबू रहती
फिर एक दिन
नशे की बोतल ने
उसे दोस्त कहा
और आदमी
धीरे-धीरे
घर से बेदखल होने लगा।

पहले दीवारें गईं,
फिर खेतों की मिट्टी,
फिर थालियाँ
जिनमें कभी
बेटी ने
पहली बार
अन्न का दाना खाया था।

पत्नी बीमार पड़ी
तो दवा नहीं आई,
शराब आई
पत्नी चल बसी
क्योंकि नशे को
इलाज की ज़रूरत
नहीं होती।

माँ के जाने के बाद
बेटा
स्कूल की कतार से
बाहर हो गया,
किताबों ने
उसका नाम
धीरे से हटा दिया।

एक दिन
बेटी
घर में सबसे हल्की चीज़ रह गई,
इतनी हल्की
कि उसे
उठाकर
“ठिकाने” पर रख आना
मंगलू को
भारी नहीं लगा।

उस रात
शराब और तेज़ लगी,
लेकिन
कानून की सुबह
बहुत कठोर थी।

अब मंगलू
सलाखों के पीछे बैठा ,
और हर दिन
एक ही सवाल पीता
“मैं आदमी कब था
और कब
बोतल हो गया?”

यह कोई कहानी नहीं,
यह उन घरों का सच है
जहाँ नशा
पहले पिता को मारता ,
फिर माँ,
फिर बच्चे
और अंत में
इंसानियत को
चुपचाप
दफ़ना देता है।
 
संजीव ठाकुर

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