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बदलते परिवेश में भी भारत और रूस की मित्रता रहेगी कायम
भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक ध्रुव या गुट तक सीमित नहीं रखा है।
महेन्द्र तिवारी
वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह बयान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक ध्रुव या गुट तक सीमित नहीं रखा है।
आज के समय में जब पश्चिमी देश लगातार विकासशील देशों पर अपने एजेंडे थोपने का प्रयास कर रहे हैं, तब पुतिन का यह कहना कि भारत पर रूस के साथ सहयोग कम करने के लिए डाला जा रहा पश्चिमी दबाव पूरी तरह से व्यर्थ है, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी वैश्विक स्वीकार्यता है। यह बयान केवल दो नेताओं या दो देशों की सरकारों के बीच का कूटनीतिक संवाद नहीं है, बल्कि यह एक बदलते हुए विश्व के शक्ति संतुलन का बहुत ही सजीव चित्रण है।
रूस और भारत के कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद कई दशकों के विश्वास और आपसी सहयोग पर टिकी है। वर्ष 1971 की शांति और मैत्री संधि से लेकर आज 2026 तक के सफर में दोनों देशों ने कई वैश्विक उतार चढ़ाव देखे हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को समर्थन की आवश्यकता पड़ी है, रूस ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर भारत का साथ दिया है। कश्मीर का मुद्दा हो या फिर आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई, रूस हमेशा एक सच्चे मित्र की भांति भारत के साथ खड़ा रहा है।
यही कारण है कि आज की सदी में भी यह रिश्ता मात्र कूटनीतिक समझौतों का मोहताज नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों की जनता के बीच पनपे एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है। पुतिन की बातों में इसी ऐतिहासिक विश्वास की झलक मिलती है। उन्हें इस बात का भलीभांति भान है कि भारत किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर अपने पुराने और सच्चे मित्र के साथ संबंधों में कोई भी कटौती नहीं करेगा। भारत की जनता और भारत के नीति निर्माता दोनों ही इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि संकट के समय में किसने उनका साथ दिया था।
फरवरी 2022 में शुरू हुए यूक्रेन संकट के बाद से ही पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए हैं। इन पश्चिमी देशों ने भारत पर भी यह भारी दबाव बनाया कि वह रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंध सीमित करे और वहां से कच्चे तेल की खरीद को रोक दे। लेकिन भारत ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि उसकी नीतियां उसके अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय होती हैं, न कि पश्चिमी देशों के फरमानों से। भारत ने न केवल रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उसे कई गुना बढ़ा भी दिया।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने 60 अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर लिया है, जो कि दोनों देशों द्वारा तय किए गए 2025 के लक्ष्य से बहुत पहले ही हासिल कर लिया गया। आज रूस, भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात कर रहा है। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि पश्चिमी देशों की धमकियां भारत के इरादों को डिगा नहीं पाईं और भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा।
आर्थिक मोर्चे पर पुतिन द्वारा भारत के तीव्र विकास की जो विशेष रूप से प्रशंसा की गई है, वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, जिसकी विकास दर लगातार 7 प्रतिशत के आस पास बनी हुई है। देश में हो रहे भारी बुनियादी ढांचे के निर्माण और तकनीकी विकास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
रूस यह भलीभांति समझता है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका एक प्रमुख विकास इंजन की तरह होने वाली है। ऐसे में रूस के लिए भारत सिर्फ एक पारंपरिक हथियार खरीदार नहीं रह गया है, बल्कि ऊर्जा, कृषि, अंतरिक्ष और विनिर्माण क्षेत्र में एक विशाल बाजार और सहयोगी बन गया है। दोनों देश अपनी मुद्राओं यानी रुपये और रूबल में व्यापार करने की दिशा में भी लगातार काम कर रहे हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पश्चिमी मुद्राओं के एकाधिकार को चुनौती दी जा सके और दोनों देशों के व्यापारियों को विदेशी मुद्रा के उतार चढ़ाव से बचाया जा सके।
रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत और रूस का सहयोग केवल आयात और निर्यात के पुराने मॉडल तक सीमित नहीं है। आज यह दोनों देश ब्रह्मोस मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों का संयुक्त रूप से निर्माण कर रहे हैं जो कि पूरी दुनिया में अपनी तरह की सबसे बेहतरीन मिसाइल मानी जाती है। इसके अलावा एस 400 वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति भी दोनों देशों के बीच हुए एक ऐतिहासिक सौदे का हिस्सा है,
जिसे पूरा करने के लिए भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित खतरे की भी बिल्कुल परवाह नहीं की। भारत में मेक इन इंडिया पहल के तहत कलाश्निकोव राइफल से लेकर अन्य कई रूसी रक्षा उपकरणों के निर्माण को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे भारत की अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है। पुतिन का यह अटूट भरोसा इन्हीं ठोस धरातल पर टिके वास्तविक प्रोजेक्ट्स के कारण और भी मजबूत होता है।
जहां तक अमेरिका और भारत के बढ़ते संबंधों का प्रश्न है, पुतिन की बेबाक टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में रूस की परिपक्वता को दर्शाती है। आज भारत क्वाड जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों का सक्रिय सदस्य है जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। पश्चिमी कूटनीतिक विश्लेषकों का अक्सर यह मानना रहा है कि भारत की अमेरिका से यह बढ़ती नजदीकी रूस को खटकती है और इससे दोनों के रिश्ते खराब हो सकते हैं। परंतु रूसी राष्ट्रपति ने अपने इस स्पष्ट बयान से इस सारे भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है।
रूस यह गहराई से जानता है कि भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों की रक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत रूस के खिलाफ किसी भी पश्चिमी एजेंडे का हिस्सा बन जाएगा। इसके विपरीत भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंचों पर भी रूस के साथ मजबूती से कदमताल कर रहा है। वर्ष 2024 में ब्रिक्स का जो ऐतिहासिक विस्तार हुआ उसके बाद आज 2026 में यह संगठन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा और मजबूत पैरोकार बन चुका है, जिसमें भारत और रूस की धुरी सबसे अहम भूमिका निभा रही है।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुतिन का भारत को लेकर यह बयान महज एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं है, बल्कि यह एक तेजी से उभरती हुई विश्व शक्ति के रूप में भारत के प्रति गहरे सम्मान का सीधा प्रकटीकरण है। पश्चिमी देशों को यह बहुत ही स्पष्ट संदेश है कि दुनिया अब उनके इशारों या उनकी नीतियों पर नहीं चलती। भारत अपने सभी निर्णयों में पूर्णतः स्वतंत्र है और वह अपने रणनीतिक मित्रों का चुनाव केवल अपनी शर्तों और अपने लाभ के आधार पर करता है।
रूस और भारत की यह प्रगाढ़ साझेदारी आने वाले समय में न केवल एशिया बल्कि संपूर्ण वैश्विक शक्ति संतुलन को बनाए रखने में एक मील का पत्थर साबित होगी। यह दोनों देश मिलकर जिस न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं, उसमें आपसी सम्मान, संप्रभुता का आदर और एक दूसरे के विकास में बिना शर्त योगदान ही सबसे प्रमुख स्तंभ होंगे। व्लादिमीर पुतिन के शब्दों ने दोनों देशों के बीच की इसी अत्यंत मजबूत नींव को एक बार फिर से दुनिया के सामने पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ रख दिया है, जिससे भविष्य में दोनों देशों के संबंध और भी अधिक ऊंचाइयों को छुएंगे।


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