गर्मी में प्यास, बारिश में सैलाब: विकास के मॉडल पर बड़ा सवाल

21वीं सदी की क्रूर विडंबना: गर्मी में जल-मृत्यु, बारिश में जल-तांडव, जल संकट और जल प्रलय का दोहरा चक्र — अब कब तक चलेगी यह विडंबना?

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

 21वीं सदी का भारत एक कड़वी विडंबना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर देश अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयां छू रहा हैतो दूसरी ओर करोड़ों लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए जूझ रहे हैं। वर्ष 2026 की भीषण गर्मी ने विकास की चमक के पीछे छिपी हकीकत उजागर कर दी है। कई क्षेत्रों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। बाड़मेर जैसे इलाकों में गांव एक हैंडपंप के सहारे हैंमहिलाएं मीलों दूर से पानी ला रही हैं और शहरों में दूषित जलापूर्ति को लेकर आक्रोश है। लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद मानसून आते ही यही देश जल संकट से निकलकर जल प्रलय में घिर जाता है। सड़कें नदियां बन जाती हैं और जनजीवन थम जाता है। आखिर यह कैसा विकास हैजहां गर्मी में प्यास और बारिश में सैलाब नियति बन चुके हैं?

यह संकट प्रकृति नहींबल्कि विकास और जल प्रबंधन की उपेक्षा का परिणाम है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार अप्रैल 2026 में देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण क्षमता का लगभग 39 प्रतिशत ही बचा थाजो मई में और घट गया। कई बड़े जलाशय आधी क्षमता से नीचे पहुंच गए। पिछले वर्षों में वर्षा के असमान वितरणबढ़ती गर्मी और कमजोर जल प्रबंधन ने संकट को गहरा किया है। वहीं 2026 में एल-नीनो के प्रभाव से सामान्य से कम मानसून की आशंका है। दूसरी ओर भूजल का बेलगाम दोहन हालात और बिगाड़ रहा है। दिल्लीबेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहर जल संकट के साथ भूमि धंसाव जैसे खतरों का भी सामना कर रहे हैं। स्पष्ट हैयह केवल आज की नहींभविष्य की भी गंभीर चुनौती है।

इस संकट की जड़ अंधाधुंध शहरीकरण हैजिसने प्रकृति और पानी का संतुलन तोड़ दिया है। कभी तालाबझीलें और आर्द्रभूमियां वर्षा जल संजोती थींलेकिन आज उनकी जगह कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। नतीजा यह है कि बारिश का पानी जमीन में उतरने के बजाय सड़कों और नालों में बह जाता हैजबकि गर्मियों में भूजल खाली पड़ जाता है। मानो हम बरसात में पानी को ठुकराते हैं और फिर गर्मी में उसकी तलाश में भटकते हैं। दुर्भाग्य से विकास की परिभाषा ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों तक सिमट गई हैजबकि जल संरक्षण हाशिये पर है। यही सोच आज जल संकट और जलभराव—दोनों की सबसे बड़ी वजह है।

देश की राजनीति का मानक हैं योगी आदित्यनाथ  Read More देश की राजनीति का मानक हैं योगी आदित्यनाथ 

भारत में जल संकट का कारण केवल पानी की कमी नहींबल्कि उसके उपयोग और प्रबंधन की खामियां भी हैं। कृषि और शहर मिलकर देश के 80 प्रतिशत से अधिक भूजल का दोहन कर रहे हैंफिर भी जल व्यवस्था चरमराई हुई है। शहरों में लाखों लीटर पानी पाइपलाइन लीकेज में बह जाता हैजबकि कई बस्तियां बूंद-बूंद को तरसती हैं। दूसरी ओर सीमित जल वाले क्षेत्रों में भी अत्यधिक पानी मांगने वाली फसलें उगाई जा रही हैं। नतीजा यह है कि गर्मियों में जलाशय सूख जाते हैं और बरसात में वही पानी अनियंत्रित होकर तबाही मचाता है। स्पष्ट हैयह संकट संसाधनों के अभाव से अधिक गलत प्रबंधन और विकृत प्राथमिकताओं का परिणाम है।

रील की लत से बीमार होता युवा Read More रील की लत से बीमार होता युवा

गर्मी की प्यास और बारिश की तबाही का सबसे भारी बोझ समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। गांवों में पेयजल संकट स्वास्थ्यखेती और पशुधन—तीनों पर चोट कर रहा है। सूखती फसलें किसानों की आय घटा रही हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर बना रही हैं। वहीं शहरों में जलभराव और बाढ़ यातायातकारोबार और जनजीवन को ठप कर देते हैंसाथ ही बीमारियों का खतरा बढ़ा देते हैं। गरीब परिवारों के घर डूबते हैंरोज़गार प्रभावित होता है और जीवन स्तर गिरता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जल संकट और जल प्रलय की सबसे बड़ी कीमत वही लोग चुका रहे हैंजिनकी इन समस्याओं को पैदा करने में सबसे कम भूमिका है।

शतरंज के नए विश्व नायक बने भारत के प्रज्ञानंद Read More शतरंज के नए विश्व नायक बने भारत के प्रज्ञानंद

यह संकट अब केवल पर्यावरण या समाज तक सीमित नहीं रहाबल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की चुनौती बन चुका है। पानी सीधे खाद्य सुरक्षाकृषिउद्योगजनस्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन से जुड़ा है। यदि जल स्रोत लगातार कमजोर होते रहेतो भविष्य में जल विवाद बढ़ेंगेकृषि उत्पादन घटेगा और शहरों की जीवन क्षमता पर भी संकट गहराएगा। जो राष्ट्र अपने नागरिकों के लिए पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता सुनिश्चित नहीं कर सकताउसका विकास भी लंबे समय तक टिक नहीं सकता। इसलिए पानी को महज़ एक संसाधन नहींबल्कि राष्ट्र निर्माण और विकास की आधारशिला मानने का समय आ गया है।

राह मुश्किल जरूर हैलेकिन समाधान सामने हैं। जरूरत केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी की है। हर शहर और गांव में वर्षा जल संचयन अनिवार्य बनाना होगाजबकि तालाबोंझीलों और पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। शहरी विकास ऐसा हो कि वर्षा जल जमीन में समा सके और स्मार्ट ड्रेनेज व्यवस्था भूजल का आधार बने। कृषि में ड्रिप सिंचाईसूक्ष्म सिंचाई और क्षेत्रानुकूल फसल चक्र को बढ़ावा देना होगा। साथ ही जल वितरण व्यवस्था दुरुस्त कर पाइपलाइन लीकेज पर अंकुश लगाना होगा और लोगों को जल संरक्षण का भागीदार बनाना होगा। बदलाव घोषणाओं से नहींबल्कि ईमानदार और सख्त क्रियान्वयन से आएगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत कितना विकसित हुआबल्कि यह है कि क्या वह अपने लोगों के लिए पानी सुरक्षित रख पाया। गर्मी में प्यास और बारिश में सैलाब की यह विडंबना हमारी विकास यात्रा पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि जल संरक्षणजल साक्षरता और जल के न्यायपूर्ण वितरण को राष्ट्रीय संकल्प नहीं बनाया गयातो आने वाली पीढ़ियां हमारी दूरदर्शिता नहींहमारी लापरवाही को याद रखेंगी। विकास का वास्तविक पैमाना कंक्रीट के जंगल नहींबल्कि हर नागरिक तक स्वच्छ और पर्याप्त पानी की पहुंच है। भारत को अब जल-केंद्रित विकास की दिशा में बढ़ना होगाक्योंकि भविष्य की समृद्धि का रास्ता पानी से होकर गुजरता है।

About The Author

Post Comments

Comments