अस्तित्व हीनता के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान।
पाकिस्तान में लोकतंत्र लंबे समय से सेना और निर्वाचित सरकारों के बीच शक्ति-संघर्ष का शिकार रहा है।
दक्षिण एशिया का परमाणु शक्ति संपन्न देश पाकिस्तान आज अपने इतिहास के सबसे बुरे दौरों में से गुजर कर अपने अस्तित्व संकट के लिए संघर्षरत है। पाकिस्तान देश का नाम कभी भी वैश्विक नक्शे से विलुप्त होने की कगार पर है। पाकिस्तान की ना कोई निश्चित अंतरिम नीति है ना ही कोई विदेश नीति,केवल विध्वंस और चरमपंथियों के दम पर पाकिस्तान अब तक पूरे विश्व में आतंक फैलाता रहा है अब वह खुद आतंकवाद महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है।
एक ओर लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं, दूसरी ओर बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा, चरमपंथी संगठनों की सक्रियता, महंगाई की मार तथा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबावों ने देश को गंभीर संकट में डाल दिया है। वर्तमान परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि पाकिस्तान केवल आर्थिक संकट ही नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक संकट से भी जूझ रहा है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र लंबे समय से सेना और निर्वाचित सरकारों के बीच शक्ति-संघर्ष का शिकार रहा है। हाल के घटनाक्रमों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के बजाय सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का उल्लेख किए जाने से यह बहस फिर तेज हो गई कि पाकिस्तान में वास्तविक शक्ति किसके हाथ में है। अनेक विश्लेषकों ने इसे पाकिस्तान की कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था और सेना के बढ़ते प्रभाव का संकेत माना।
दूसरी बड़ी चुनौती बलूचिस्तान में बढ़ती अस्थिरता है। 2026 में बलोच लिबरेशन आर्मी द्वारा कई समन्वित हमले किए गए, जिनमें सैन्य प्रतिष्ठानों, बैंकों और पुलिस ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने न केवल पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाया बल्कि चीन और अमेरिका जैसे संभावित निवेशकों की चिंताएँ भी बढ़ा दीं। बलूचिस्तान पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का केंद्र है, किंतु स्थानीय लोगों में लंबे समय से उपेक्षा और शोषण की भावना बनी हुई है।
यही कारण है कि अलगाववादी आंदोलन समय-समय पर उग्र रूप धारण कर लेता है। महंगाई पाकिस्तान की जनता के लिए सबसे बड़ी पीड़ा बन चुकी है। ईरान-अमेरिका तनाव और पश्चिम एशिया में संघर्षों के कारण तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। पाकिस्तान, जो अपनी अधिकांश ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयातित तेल पर निर्भर है, इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुआ। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि ने आम नागरिक के जीवन को कठिन बना दिया है। बढ़ती महंगाई ने मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग दोनों की क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है, जबकि बेरोजगारी और आर्थिक मंदी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
इसी बीच पाकिस्तान एक नई कूटनीतिक दुविधा में भी फँसा हुआ है। अमेरिका चाहता है कि अधिक से अधिक मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करें। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों से इस दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। किंतु पाकिस्तान ने स्पष्ट रूप से इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि फिलिस्तीन समस्या के समाधान के बिना इज़राइल को मान्यता देना उसके लिए स्वीकार्य नहीं है। अब्राहम अकॉर्ड्स का विरोध केवल पाकिस्तान सरकार तक सीमित नहीं है। देश के कई धार्मिक और कट्टरपंथी संगठन इसे इस्लामी हितों के विरुद्ध मानते हैं। चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के एक वरिष्ठ नेता द्वारा सेना प्रमुख असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को सार्वजनिक धमकी दिए जाने की खबरें भी सामने आईं। उसने चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान ने इज़राइल के साथ संबंध स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान के भीतर कट्टरपंथी ताकतें अभी भी कितनी प्रभावशाली है।
दिलचस्प बात यह है कि एक ओर पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उसके अपने घरेलू हालात चिंताजनक बने हुए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दावा किया है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय शांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन आलोचक प्रश्न उठाते हैं कि जो देश अपने ही प्रांत बलूचिस्तान में स्थिरता स्थापित नहीं कर पा रहा, वह क्षेत्रीय शांति का वाहक कैसे बन सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की छवि मिश्रित बनी हुई है। चीन ने उसे अपना "अटूट मित्र" बताया है और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है। वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित कई देशों ने बलूचिस्तान में हुए आतंकी हमलों की निंदा करते हुए पाकिस्तान के साथ एकजुटता व्यक्त की है। पाकिस्तान आज चार मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है,कमजोर लोकतंत्र, बढ़ती महंगाई, बलूचिस्तान में हिंसा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव। यदि राजनीतिक नेतृत्व, सेना और समाज मिलकर इन चुनौतियों का समाधान नहीं खोजते, तो यह संकट और गहरा सकता है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, प्रांतीय असंतोष का समाधान करना, चरमपंथ पर प्रभावी नियंत्रण तथा आर्थिक सुधारों को लागू करना पाकिस्तान की तत्काल आवश्यकता है। अन्यथा यह देश आने वाले वर्षों में और अधिक अस्थिरता तथा वैश्विक अलगाव का सामना कर सकता है।
संजीव ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार,


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