कश्मीर पर भारत का अडिग संकल्प और चीन पाकिस्तान को करारा संदेश
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा
जम्मू कश्मीर और लद्दाख को लेकर भारत की नीति हमेशा से स्पष्ट, दृढ़ और अटल रही है। भारत ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने यह साफ कर दिया है कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख उसके अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं और रहेंगे। चीन और पाकिस्तान द्वारा जारी संयुक्त बयान के बाद भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से दिया गया कड़ा जवाब केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि यह भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और क्षेत्रीय अखंडता की स्पष्ट घोषणा थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी देश को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब चीन और पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की असफल कोशिश करता रहा है। उसे यह भय सताता है कि यदि दुनिया ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख को पूरी तरह भारत का हिस्सा मान लिया तो उसका दशकों पुराना प्रचार तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। दूसरी ओर चीन भी अपनी सामरिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के कारण पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई देता है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपेक का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। भारत शुरू से इस परियोजना का विरोध करता आया है क्योंकि यह भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है। भारत का स्पष्ट मत है कि जिस क्षेत्र पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है वहां किसी तीसरे देश की परियोजना स्वीकार नहीं की जा सकती।
चीन और पाकिस्तान यह भलीभांति जानते हैं कि यदि उन्होंने कश्मीर और लद्दाख का नाम लेना बंद कर दिया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाएगा कि ये क्षेत्र पूरी तरह भारत के ही अंग हैं। यही कारण है कि दोनों देश समय समय पर संयुक्त बयान जारी कर इस मुद्दे को हवा देने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया अब पाकिस्तान के पुराने दुष्प्रचार को गंभीरता से नहीं लेती। अधिकांश देशों ने यह समझ लिया है कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है और इसका समाधान भारत अपने संवैधानिक ढांचे के भीतर ही करेगा।
भारत ने वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू कश्मीर को पूर्ण रूप से भारतीय संविधान के दायरे में लाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। इसके बाद से पाकिस्तान लगातार बौखलाहट में दिखाई देता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि दुनिया भारत के खिलाफ खड़ी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र सहित अधिकांश वैश्विक शक्तियों ने इसे भारत का आंतरिक मामला माना। यही कारण है कि पाकिस्तान बार बार चीन का सहारा लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाने की कोशिश करता है।
चीन का रवैया भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं माना जा सकता। वह एक ओर भारत के साथ आर्थिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान को सामरिक सहयोग देकर दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम करता है। लेकिन भारत अब पहले वाला भारत नहीं है। आज भारत आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से दुनिया की बड़ी शक्तियों में शामिल हो चुका है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।
भारत की बढ़ती ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने में रुचि दिखा रही हैं। चाहे अमेरिका हो, फ्रांस हो, रूस हो या पश्चिम एशिया के देश, सभी भारत को एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। उसकी स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और दूसरे देशों की आर्थिक मदद पर निर्भर है। ऐसे में भारत को चुनौती देना उसके लिए केवल राजनीतिक बयानबाजी भर रह गया है।
भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर भी हमेशा सख्त रुख अपनाया है। हाल ही में खुफिया एजेंसियों द्वारा अल बद्र और हिजबुल मुजाहिदीन के संभावित गठजोड़ को लेकर जारी अलर्ट इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान अभी भी आतंकवाद को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाए हुए है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई लंबे समय से जम्मू कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठनों को समर्थन देती रही है। लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर इन संगठनों की कमर तोड़ दी है।
आज घाटी में विकास की नई तस्वीर दिखाई दे रही है। सड़कें बन रही हैं, पर्यटन बढ़ रहा है, निवेश आ रहा है और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। यही बदलाव पाकिस्तान और उसके समर्थकों को सबसे अधिक परेशान करता है। वे नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर शांति और विकास के रास्ते पर आगे बढ़े, क्योंकि इससे उनका झूठा प्रचार कमजोर पड़ता है। इसलिए समय समय पर आतंकवादी गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय बयानबाजी के जरिए माहौल खराब करने की कोशिश की जाती है।
भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि बातचीत और शांति तभी संभव है जब आतंकवाद पूरी तरह बंद हो। एक तरफ पाकिस्तान शांति की बात करता है और दूसरी तरफ आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देता है। यह दोहरा चरित्र अब दुनिया से छिपा नहीं है। भारत की नीति साफ है कि आतंक और वार्ता साथ साथ नहीं चल सकते।चीन और पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि नया भारत हर चुनौती का जवाब देने में सक्षम है। भारत केवल सैन्य शक्ति के आधार पर ही नहीं बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक कूटनीति के दम पर भी मजबूत हुआ है। भारतीय सेना सीमाओं की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और देश की जनता भी राष्ट्रीय एकता के मुद्दे पर पूरी मजबूती से सरकार के साथ खड़ी है।
जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत की पहचान, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता का हिस्सा हैं। इन्हें भारत से अलग देखने की कल्पना भी असंभव है। चीन और पाकिस्तान चाहे जितने संयुक्त बयान जारी कर लें, चाहे जितने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचा लें, इससे जमीन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सर्वोपरि है और इस पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी या हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि दुनिया आतंकवाद को समर्थन देने वाली ताकतों को पहचानें और दक्षिण एशिया में स्थायी शांति के लिए भारत के प्रयासों का समर्थन करे। भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की कीमत पर नहीं। यही संदेश भारत ने चीन और पाकिस्तान को दिया है और यही संदेश आने वाले समय में भी पूरी दृढ़ता के साथ दोहराया जाता रहेगा।
कांतिलाल मांडोत
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