बौद्धिक,आर्थिक प्रगति को छिन्न-भिन्न करती रूढ़िवादिता और अंधविश्वास

बिल्ली रास्ता काट दे तो यह समझना कि राह में दुर्घटना होने की संभावना हो सकती है।

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धार्मिक रूढ़िवादिता,कट्टरपंथी धर्मांधता हमारी प्रगति के बड़े बाधको में से एक है। यह हमारी राहों के कंटक और रोड़े साबित हुए हैं।  उनसे हमें हर हाल में छुटकारा पाना होगा। बुनियादी शिक्षा के प्रचार प्रसार से इसके अवरोधों को जनमानस के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए ।जो विषय वस्तु आजाद विचारों मान्यताओं को बर्दाश्त नहीं करती उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए, ऐसी अन्य और मानवीय कमजोरियां हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। इस कार्य के लिए सभी समुदायों के क्रांतिकारी उत्साही नौजवानों की आवश्यकता है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह ने अपने संगठन नौजवान भारत सभा के लाहौर में प्रकाशित घोषणा पत्र में लिखी थी।

शहीद भगत सिंह ने अपने जीवन का बलिदान कर भारत को आजादी दिलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, पर आजादी के बाद भी भारत का जनमानस उन्हीं अंधविश्वास धर्मांधता तथा रूढ़िवाद पर फंसा हुआ है।और अभी भी इस युग में अंधविश्वास का बोलबाला दिखाई देता है। बिल्ली रास्ता काट दे तो यह समझना कि राह में दुर्घटना होने की संभावना हो सकती है।

घर से निकलते समय कोई छींक दे तो यह समझना कि होने वाला काम बिगड़ जाएगा,और घर में कौवे के बोलने से यह अर्थ निकाला जाए कि घर में मेहमान आने वाले हैं। छोटी चिड़िया यदि मिट्टी की धूल से खेल रही हो तो यह समझा जाए की घनघोर बारिश होने वाली है, आदि इत्यादि ऐसी कई धारणाएं हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक तथा सामाजिक प्रमाण, तर्क या आधार मौजूद नहीं है। फिर भी बड़ी संख्या में लोग इन बातों पर विश्वास करके अपनी नियति तय करने में जुट जाते हैं, अपने विवेक का प्रयोग किए बिना ही इन बातों पर विश्वास कर लेना ही अंधविश्वास माना जाता है।

कुछ लोग तेरा के अंक को अशुभ मानते हैं, तो कई देश किस अंग को शुभ भी मानते हैं। मृत्यु के बाद भी अनेक तरह के अंधविश्वास जी एवं आडंबर संयुक्त कर्मकांड किए जाते हैं। एवं इन कर्मकांड को नहीं किए जाने पर मनुष्य की आत्मा भूत बनकर इर्द गिर्द मंडराती है। और इस तरह के भूत मनुष्य जाति को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, ऐसी मान्यताएं अंधविश्वास के साक्षात प्रमाण हैं। अधिकतर भारतीय ग्रामीण अभी भी यह मानते हैं कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है और भूकंप आने पर वह इस बात का दावा करते हैं कि शेषनाग नाराजगी कारण पृथ्वी हिलने लगी है,और भी पूजा पाठ करने में लग जाते हैं।

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चंद्र ग्रहण तथा सूर्य ग्रहण के समय भी ग्रामीण क्षेत्र में लोगों द्वारा ऐसे ही कयास लगाए जाते हैं, और फिर ग्रहों की पूजा की जाती है। पूजा करना बहुत अच्छी बात है,ईश्वर में आस्था होनी चाहिए यह एक तरह की एकाग्रता तथा अदृश्य शक्ति के प्रति आप का समर्पण भाव दिखाती है। ईश्वर से लगाओ तथा ईश्वरीय शक्ति के आगे समर्पण एक स्तुत्य के कार्य है। पर इसके पीछे अंधविश्वास को पुष्पित पल्लवित करना खतरनाक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त ग्रह के चक्कर को दूर करने के लिए किसी विशेष जाति अथवा पत्थर की अंगूठी पहनना विशेष मंत्र वाला ताबीज पहनना जादू टोना तथा टोटका करवाना आदि अंधविश्वास के बड़े उदाहरण हैं ।

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और इन सब अंधविश्वास के चक्कर में अनेक लोग धोखाधड़ी तथा शोषण के शिकार होते देखे गए हैं। अंधविश्वास धर्मांधता एक सामाजिक बुराई की तरह दिखाई देती है, जो निश्चित तौर पर देश के विकास के लिए बड़ी बाधा बन जाती है। संत कबीर दास ने बड़ी बेबाकी से इस अंधविश्वास पर अपनी कविता के माध्यम से गहरा कटाक्ष किया है, अरिहरन की चोरी करै, करे सुई का दान, ऊंचा चढ़ी के देखता,केतिक दूर विमान।

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दोहे का अर्थ है, मानव कुमार्ग के पथ पर चलकर कमाए गए अनैतिक धन का बहुत छोटा सा भाग दान कर आकाश की ओर देखता है कि उसको स्वर्ग ले जाने वाला विमान कितनी दूर है। अज्ञानी मानव का यह सोचना एक बड़े अंधविश्वास को दर्शाता है। किसी भी गरीब स्त्री की जमीन जायजाद को हड़पने के लिए जमीदारों या मुखिया द्वारा गांव में उसे डायन घोषित कर देना या ईश्वर को खुश करने के लिए मनुष्य की नरबलि दे देना या पशुओं की बलि देना एक बड़ा अंधविश्वास माना जाता है। इन सब अंधविश्वास से समाज में विसंगति फैलती है एवं जो साक्षरता तथा मानवता के लिए बड़े खतरे और विकास के लिए अवरोध पैदा करने के तथ्य हैं।

इनके विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर इनको सजा देकर समाज में अंधविश्वास के खिलाफ सरकार को एक स्वस्थ संदेश देने की आवश्यकता है। समाचार पत्र, टीवी चैनल, इंटरनेट इन सब में राशिफल, वास्तु शास्त्र हाथ में पहनने वाले पत्थरो के बारे में जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जाता है, जबकि इन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इनके चलते बड़े-बड़े जालसाज तथा ठग लोगों से पैसा तथा सोने चांदी की ठगी करने से नहीं चूकते। यह अंधविश्वास यद्यपि सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया कनाडा अमेरिका तथा साउथ अफ्रीका में भी इसी बड़े पैमाने पर व्याप्त है।

यदि अशिक्षित मनुष्य अंधविश्वासों को मानता है तो यह बात समझ में आती है कि वह वास्तविकता से अशिक्षा के कारण अनभिज्ञ है, एवं इनके परिणामों के बारे में नहीं जानता है। किंतु यह विडंबना तथा अफसोस की बात है कि इस वैज्ञानिक युग में उच्च शिक्षित लोग अनेक प्रकार के अंधविश्वासों से घिरे हुए हैं। शिक्षा अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर विवेकपूर्ण सोचने की शक्ति प्रदान करती है, इसके बाद ही मनुष्य विज्ञान तथा तर्क के आधार पर इसको परख कर किसी बात को मान्यता देता है। अतः अंधविश्वास धर्मांधता के खिलाफ शिक्षा जगत तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में इस विषय को शामिल कर अशिक्षित तथा शिक्षित दोनों को अंधविश्वास के प्रति सचेत कर इसके दुष्परिणामों के बारे में अच्छे से समझा देना चाहिए तभी अंधविश्वास समाज से दूर हो पाएगा।

संजीव ठाकुर

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