ओबरा में सुदृढ़ सड़कों पर फिर बिछी डामर की परत, जनता ने पूछा– यह विकास है या धन का बंदरबांट?

विभाग की खुल रही पोल, लोगों का बढ़ता जा रहा है विभाग के प्रति आक्रोश

राजेश तिवारी Picture
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ब्यूरो रिपोर्ट

ओबरा /सोनभद्र -

लोकतंत्र की मजबूती जागरूक जनता की आवाज में निहित होती है। यदि समाज में भ्रष्टाचार पनप रहा है और नागरिक मौन हैं, तो उस चुप्पी को भ्रष्टाचार के प्रति 'मौन सहमति' समझा जाता है। सोनभद्र के औद्योगिक नगर ओबरा में इन दिनों बुनियादी ढांचे के नाम पर हो रहे धन के दुरुपयोग को लेकर प्रबुद्ध वर्ग और स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। ओबरा की जनता का प्रशासन से सीधा और तीखा सवाल है—जब सड़क पहले से ही अच्छी और चलने लायक थी, तो उसे दोबारा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जहाँ कई गलियां और संपर्क मार्ग जर्जर होकर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं, वहीं पहले से बनी-बनाई चकाचक सड़कों पर दोबारा बजट खपाना सार्वजनिक धन की खुली बर्बादी है। जहाँ ज़रूरत है वहाँ सड़क नहीं बन रही, और जहाँ सड़क अच्छी है वहाँ सरकारी खजाना लुटाया जा रहा है। यह संसाधनों का पूरी तरह से गलत वितरण है।

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चर्चा का एक प्रमुख बिंदु यह भी रहा कि किसी भी दल की सरकार हो, उसकी छवि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की कार्यशैली से तय होती है। अधिकारियों द्वारा अपनी फाइलों को भरने और बजट को ठिकाने लगाने की होड़ में सरकार को जनता के बीच बदनामी झेलनी पड़ती है। राजनीतिक दलों और जन प्रतिनिधियों को अक्सर उन गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ता है जो प्रशासनिक लापरवाही के कारण होती हैं।

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लेख के माध्यम से समाज के हर व्यक्ति से अपील की गई है कि वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी सामर्थ्य अनुसार मोर्चा खोलें। यदि आप घर बैठे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे विरोध को लाइक, कमेंट या शेयर करते हैं, तो आप एक बड़ी जन-जागरूकता का हिस्सा बनते हैं। आपकी एक छोटी सी प्रतिक्रिया भी भ्रष्ट तंत्र की जड़ों को हिलाने और पारदर्शी व्यवस्था बनाने में सहायक हो सकती है। ओबरा के जागरूक नागरिकों ने अब केवल विरोध तक सीमित न रहने का मन बनाया है।

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उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं‌अनावश्यक सड़क निर्माण की जांच हो कि किसके आदेश पर यह बजट स्वीकृत हुआ। व्यर्थ किए गए सरकारी धन की वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन या फंड से की जाए। इस धन का सदुपयोग उन जर्जर सड़कों को बनाने में हो जहाँ से राहगीरों का गुजरना दूभर है। यह केवल एक सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत सड़न की ओर इशारा है। यदि आज ओबरा की जनता जागरूक नहीं हुई, तो भ्रष्टाचार की यह जड़ें और गहरी हो जाएंगी। अब समय आ गया है कि जवाबदेही तय की जाए और सरकारी धन को जनता की गाढ़ी कमाई मानकर उसका सम्मान किया जाए।

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