त्रिबेनीगंज  में सरकारी नियमों को ठेंगा दिखा रहे निजी स्कूल संचालक

बिभागीय 'मान्यता' के नाम पर चल रहा है बड़ा फर्जीवाड़ा

BIHAR SWATANTRA PRABHAT Picture
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सुपौल, सीमावर्ती जिले सुपौल के त्रिवेणीगंज अनुमंडल  में निजी स्कूलों का संचालन सरकारी नियम कानून से नही बल्कि मनमर्जी से चल रहा है।जिसके आगे प्रसासन खुद को मानो मजबूर पा रहा हो।यह  अब शिक्षा दान का मंदिर नही बल्कि  एक अनियंत्रित बेलगाम  व्यवसाय का रूप ले चुका है। बिहार सरकार के सख्त नियमों के बावजूद, क्षेत्र में अधिकांश निजी स्कूल बिना वैध प्रस्वीकृति  के धड़ल्ले से चल रहे हैं। ये स्कूल न केवल शिक्षा विभाग की आंखों में धूल झोंक रहे हैं, बल्कि बिहार सरकार के निजी विद्यालय विनियमन अधिनियम की शर्तों को भी खुलेआम  ठेंगा दिखा रहे हैं।

इन सरकारी नियमों की हो रही है अनदेखी

किसी भी निजी स्कूल के संचालन के लिए सरकार ने  मानक तय किए हैं, लेकिन इसका अभाव  त्रिवेणीगंज में दिख रहा है।सरकारी नियमानुसार, किसी भी स्कूल को खोलने से पहले विभाग से प्रस्वीकृति लेना अनिवार्य है। बिना कोड के स्कूल चलाना अवैध है, लेकिन यहाँ दर्जनों स्कूल सिर्फ आवेदन के भरोसे वर्षों से चल रहे हैं।या अपने मन से चल रहे हैं।

​परिसर एवं बुनियादी ढांचा बिभागीय नियमानुसार स्कूल खोलने के लिए शहरी क्षेत्र में कम से कम 10,000 वर्ग फुट और ग्रामीण क्षेत्र में 20,000 वर्ग फुट अपनी या लंबी लीज की जमीन  होना अनिवार्य है।लेकिन  यहाँ चल रहे कई स्कूल 2-3 कमरों के मकानों मेंटीन शेड में चल रहे हैं।शिक्षक-छात्र अनुपात (PTR): RTE के तहत 30 छात्रों पर एक प्रशिक्षित शिक्षक होना चाहिए।

हकीकत यह है कि एक ही कमरे में दो कक्षाओं के बच्चे बैठे हैं और अप्रशिक्षित स्टाफ उन्हें पढ़ा रहा है।साथ ही सरकारी नियम कहते हैं कि शिक्षकों का चयन एक समिति के माध्यम से होना चाहिए  और उन्हें उचित मानदेय मिले, मगर यहाँ 'पॉकेट मनी' पर युवाओं से काम लिया जा रहा है।

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सुरक्षा के नाम पर केवल 'डिस्प्ले बोर्ड

बिहार निजी विद्यालय नियमावली के अनुसार, स्कूलों के पास 'अग्नि सुरक्षा प्रमाण पत्र' और 'भवन फिटनेस प्रमाण पत्र' होना अनिवार्य है।लेकिन दुर्भाग्य है कि  त्रिवेणीगंज के इन स्कूलों में आग बुझाने के यंत्र तो दूर, आपातकालीन निकासी तक की जगह नहीं है। संकरी गलियों में चल रहे इन स्कूलों में अगर कोई अनहोनी होती है, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?बर्षो पहले आगलगी की घटना में एक निजी स्कूल के बच्चे की मौत हो गई थी।बाबजूद शिक्षा विभाग के कान पर कोई असर नहीं हुआ ।

क्या कहता है कानून?

सरकार के नियमों के अनुसार, यदि कोई भी स्कूल बिना मान्यता के संचालित पाया जाता है, तो उस पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना और प्रतिदिन 10,000 रुपये की दर से दंड लगाने का प्रावधान है। इसके बावजूदशिक्षा विभाग और  प्रशासन की चुप्पी संदेहास्पद है।

अभिभावकों की जेब पर डाका, विभाग मौन

इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि ​मान्यता न होने के बावजूद ये स्कूल 'एडमिशन फीस' और 'सालाना चार्ज' के साथ ही किताब ,कॉपी और ड्रेस के  नाम पर मोटी रकम वसूल रहे हैं। विभागीय अधिकारियों द्वारा इन निजी स्कूलों के  निरीक्षण न किए जाने से  इन स्कूलों का मनोबल बढ़ा हुआ है। अभिभावकों  का कहना है कि शिकायत के बाद भी शिक्षा विभाग के अधिकारी जाँच करना मुनासिब नहीं समझते हैं अगर  जांच की बात आती है, कागजी खानापूर्ति कर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।


सुलगते सवाल 

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि  ​बिना 'यू-डाइस' (U-DISE) कोड और मान्यता के  छात्रों का पंजीकरण कैसे कर रहे हैं?
 # ​क्या शिक्षा विभाग को इन अवैध संस्थानों की सूची की जानकारी नहीं है?
 # ​बच्चों की सुरक्षा और शिक्षकों की योग्यता के साथ हो रहे खिलवाड़ पर विभाग 'एक्शन मोड' में कब आएगा?
​यदि जल्द ही इन 'अवैध' संस्थानों पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था को खोखला करेगा, बल्कि हजारों बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल देगा।
  मनोजरोशन

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