धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत झूठे मामलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? 

उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई

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ब्यूरो प्रयागराज- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई। [मोहम्मद फैजान और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य]।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह बात एक ऐसे मामले में कही, जिसमें तीन मुस्लिम आदमियों पर 2021 के एंटी-कन्वर्जन कानून के तहत केस दर्ज किया गया था।

कथित पीड़िता ने एक बयान में इन दावों से इनकार किया कि उसे आरोपियों में से एक आदमी "लुभा" रहा था। इसके बजाय, उसने दावा किया कि वह उससे प्यार करती थी, और उसे अपने रिश्तेदारों और थर्ड-पार्टी से हैरेसमेंट का डर था। कोर्ट ने कहा, "FIR में लगाए गए आरोपों के मुकाबले पीड़िता का बयान एक परेशान करने वाले ट्रेंड को जन्म देता है, जिसे कोर्ट बार-बार उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के प्रोविजन्स के तहत थर्ड-पार्टी द्वारा दर्ज की जा रही FIRs के संबंध में देख रही है।"

कोर्ट ने अब राज्य सरकार को एक एफिडेविट फाइल करके इस ट्रेंड से निपटने के लिए की जा रही कार्रवाई के बारे में बताने का निर्देश दिया है।कोर्ट ने आदेश दिया, “UP सरकार के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) भी अपना पर्सनल एफिडेविट फाइल करेंगे, जिसमें बताया जाएगा कि ऐसे मामलों में क्या एक्शन लिया जा रहा है, जहां एक्ट 2021 के प्रोविजन के तहत FIR इधर-उधर दर्ज की जा रही हैं और उसके बाद FIR साफ तौर पर गलत निकलीं, जिससे अधिकारियों का कीमती समय ऐसी FIR को पकड़ने में बर्बाद हो रहा है, जिनका कोई आधार भी नहीं है।”

कोर्ट ने कहा कि अगर एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) 19 मई से पहले एफिडेविट फाइल नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें कोर्ट की मदद के लिए रिकॉर्ड के साथ खुद पेश होना होगा। यह एक पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था जिसमें बहराइच जिले के पुलिस स्टेशन थाना कोतवली नगर द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के अलग-अलग प्रोविजन के तहत रजिस्टर्ड FIR को रद्द करने की मांग की गई थी।

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यह केस एक आदमी की कंप्लेंट पर रजिस्टर किया गया था, जिसने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी को एक मुस्लिम आदमी ने दो और लोगों की मदद से बहला-फुसलाकर भगा लिया था। कंप्लेंट करने वाले ने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि आरोपी उसकी बेटी का धर्म बदलने और उसे एक मुस्लिम आदमी से शादी करने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि कथित विक्टिम ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में कहा है कि वह बालिग है और पिछले तीन साल से उस आदमी से प्यार करती है।

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कोर्ट ने ऑर्डर में लिखा, “उसने आगे कहा है कि उसका धर्म नहीं बदला गया है, न ही पिटीशनर ने उससे शादी की है और न ही उसके साथ फिजिकल रिलेशन बनाए हैं, न ही पिटीशनर नंबर 3 या उसके रिश्तेदारों ने विक्टिम को धर्म बदलने के लिए मजबूर किया है। उसने आगे कहा है कि वह पिटीशनर नंबर 3 के साथ रहना चाहती है और उसका धर्म नहीं बदला गया है। उसने अपने बयान में यह भी रिक्वेस्ट की है कि हिंदू ऑर्गनाइजेशन के मेंबर उसे या उसके रिश्तेदारों को परेशान न करें।”

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कोर्ट ने कहा कि, पहली नज़र में, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर दबाव में काम कर रहा था या कुछ दूसरी वजहों से 'मना' गया था।कोर्ट ने थर्ड पार्टी द्वारा ऐसे केस रजिस्टर करने के ट्रेंड पर ध्यान दिया। बेंच ने कहा, “यह एक परेशान करने वाला ट्रेंड है जो अब समाज में फैल गया है और जिसका इशारा माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र बिहारी लाल बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. एंड ऑर्स. : 2025 SCC OnLine SC 2265 के केस में भी किया है।”

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