संस्कृत की उत्तराधिकारी: हिंदी का ऐतिहासिक सफर

मध्यकाल: हिंदी का साहित्यिक अंकुरण और विस्तार (1000 ई. – 1800 ई.)

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हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की हजारों वर्षों की सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज है। भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार की 'हिंद-आर्य' शाखा से संबंधित हिंदी, आज विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका वर्तमान स्वरूप एक दिन में निर्मित नहीं हुआ, बल्कि यह संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के क्रमिक विवर्तन (Evolution) और विदेशी भाषाओं के साथ हुए संपर्क का परिणाम है।


इसकी विकास यात्रा को मुख्य रूप से तीन प्रमुख कालखंडों में विभाजित करके समझा जा सकता है:


1. प्राचीन पृष्ठभूमि: संस्कृत से अपभ्रंश तक का सफर (1500 ई.पू. – 1000 ई.)


हिंदी की जड़ें 3500 वर्ष पुरानी संस्कृत भाषा में निहित हैं। भाषाविद् इस काल को तीन चरणों में देखते हैं:
प्राचीन भारतीय आर्य भाषा : यह वैदिक संस्कृत का काल था। वेदों और उपनिषदों की रचना इसी भाषा में हुई। यह भाषा क्लिष्ट और व्याकरण सम्मत थी, जो आम बोलचाल से थोड़ी अलग थी।
मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा : 500 ई.पू. तक आते-आते संस्कृत का स्वरूप बदला और यह जनता की भाषा 'प्राकृत' बन गई। भगवान बुद्ध ने पाली (प्राकृत का एक रूप) और भगवान महावीर ने अर्धमागधी प्राकृत में अपने उपदेश दिए।
अपभ्रंश का उदय: लगभग 500 ई. से 1000 ई. के बीच प्राकृतों का रूप और अधिक सरल (या विकृत) हो गया, जिसे 'अपभ्रंश' कहा गया।
शौरसेनी अपभ्रंश: मथुरा और उसके आसपास (शूरसेन जनपद) बोली जाने वाली इस अपभ्रंश को ही हिंदी की प्रत्यक्ष जननी माना जाता है। इसी से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी और गुजराती का विकास हुआ।

2. मध्यकाल: हिंदी का साहित्यिक अंकुरण और विस्तार (1000 ई. – 1800 ई.)


यह वह दौर था जब 'हिंदी' अपने आधुनिक रूप की ओर बढ़ रही थी, लेकिन इसे अलग-अलग बोलियों के माध्यम से पहचाना जा रहा था।
क. आदिकाल (वीरगाथा काल): डिंगल-पिंगल का युग
10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच, उत्तर भारत में छोटे-छोटे राजपूत राज्यों का उदय हुआ। इस समय की भाषा में अपभ्रंश का प्रभाव शेष था।
डिंगल और पिंगल: राजस्थानी मिश्रित हिंदी (डिंगल) और ब्रज मिश्रित हिंदी (पिंगल) में 'पृथ्वीराज रासो' (चंदबरदाई) जैसे महाकाव्य लिखे गए।
नाथ और सिद्ध साहित्य: बौद्ध सिद्धों और नाथ जोगियों ने जिस 'सधुक्कड़ी' भाषा का प्रयोग किया, उसमें हिंदी के प्रारंभिक क्रिया-रूप (जैसे 'करहि', 'चलहि') दिखाई देते हैं।
ख. भक्ति काल: स्वर्ण युग और बोलियों का वर्चस्व
14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच, भक्ति आंदोलन ने हिंदी को जन-जन की भाषा बना दिया। संतों ने संस्कृत को त्यागकर लोकभाषाओं को अपनाया:
अवधी: पूर्वी हिंदी की इस बोली को तुलसीदास (रामचरितमानस) और जायसी (पद्मावत) ने चरम उत्कर्ष पर पहुँचाया।
ब्रजभाषा: यह मध्यकाल की सबसे प्रमुख साहित्यिक भाषा बनी। सूरदास, रसखान और मीराबाई (मिश्रित) ने कृष्ण भक्ति के पदों के लिए इसका प्रयोग किया।
शोध बिंदु: इस काल तक 'खड़ी बोली' (जो आज की मानक हिंदी है) का प्रयोग साहित्य में नगण्य था, इसे केवल 'कौरवी' या आम बोलचाल की बोली माना जाता था।
ग. मुग़ल प्रभाव और 'रेख़्ता' का विकास
दिल्ली सल्तनत और मुगलों के आगमन के साथ, फारसी राजकाज की भाषा बनी। दिल्ली के बाज़ारों और छावनियों में फारसी-अरबी और स्थानीय खड़ी बोली का मिश्रण हुआ।
इससे 'हिंदुस्तानी' या 'रेख़्ता' का जन्म हुआ। जब इसे फारसी लिपि में लिखा गया तो यह उर्दू बनी, और जब इसमें संस्कृत शब्दों की अधिकता और देवनागरी लिपि का प्रयोग हुआ, तो यह हिंदी की ओर अग्रसर हुई।

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3. आधुनिक काल: खड़ी बोली का पुनर्जागरण और मानकीकरण (1800 ई. – वर्तमान)


19वीं शताब्दी हिंदी के इतिहास में 'यू-टर्न'  की तरह थी। साहित्य की भाषा 'ब्रज' से बदलकर 'खड़ी बोली' हो गई।
प्रथम चरण: फोर्ट विलियम कॉलेज और शुरुआती गद्य
अंग्रेजों ने प्रशासन की सुविधा के लिए 1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। यहाँ लल्लू लाल (प्रेम सागर) और सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) जैसे लेखकों ने खड़ी बोली गद्य  की नींव रखी। उन्होंने जानबूझकर फारसी शब्दों को हटाकर एक 'शुद्ध' हिंदी शैली विकसित करने का प्रयास किया।
द्वितीय चरण: भारतेंदु युग और राष्ट्रवाद
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) को आधुनिक हिंदी का पितामह कहा जाता है। उन्होंने नाटक, निबंध और पत्रकारिता के माध्यम से यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली केवल गद्य की नहीं, बल्कि पद्य (काव्य) की भाषा भी हो सकती है। उनका नारा "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" ने हिंदी को स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बना दिया।
तृतीय चरण: द्विवेदी युग और व्याकरण सुधार
20वीं सदी की शुरुआत में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से हिंदी को अनुशासन सिखाया।
उन्होंने वाक्यों को सुगठित किया।
व्याकरण की अशुद्धियों को दूर किया।
विराम चिह्नों  का मानक प्रयोग शुरू किया।
इस प्रकार, 'कौरवी' बोली पूरी तरह से 'मानक हिंदी' (Standard Hindi) में बदल गई।

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4. स्वतंत्रता के पश्चात और वैश्वीकरण (1947 के बाद)


15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद, भाषा के प्रश्न पर लंबी बहस हुई। अंततः 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को राजभाषा (Official Language) का दर्जा दिया गया।तकनीकी विकास और हिंग्लिश (Code-Switching)
21वीं सदी में वैश्वीकरण और इंटरनेट क्रांति ने हिंदी को एक नया रूप दिया है:शब्दावली का विस्तार: हिंदी ने अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों (जैसे- मोबाइल, इंटरनेट, क्रिकेट, वोट) को अपना लिया है।देवनागरी का डिजिटलीकरण: यूनिकोड (Unicode) के आने से हिंदी इंटरनेट, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स की भाषा बन गई है।बाज़ार की भाषा: आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी हिंदी में विज्ञापन बना रही हैं, जो इसकी आर्थिक ताकत को दर्शाता है।

लेखक
 सविता सिंह
मल्लापुर, बालापुर. हैदराबाद

 

 

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