एमसीएफ के महाप्रबंधक पी, के मिश्रा की पुस्तक ने खोले रेलवे इतिहास के पन्ने
रेलवे को साम्राज्य से राष्ट्र की जीवन रेखा तक ले जाती पुस्तक
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संदीप कुमार-फिजा
लालगंज रायबरेली। भारतीय रेलवे केवल इंजनों की गर्जना, पटरियों की खनक और स्टेशनों की भीड़ का नाम नहीं है। यह उस राष्ट्र की धड़कन है, जिसने गुलामी की बेड़ियों में भी अपने भविष्य की राह इस्पात पर लिखी। इसी ऐतिहासिक सत्य को शब्द, संदर्भ और संवेदना प्रदान करती है पुस्तक ‘हिंदुस्तान का राजमार्ग : ईस्ट इंडियन रेलवे (1841–1871)’, जिसे लिखा है आधुनिक रेल डिब्बा कारखाना (मॉडर्न कोच फैक्ट्री), लालगंज (रायबरेली) के महाप्रबंधक प्रशांत कुमार मिश्रा ने। महाप्रबंधक प्रशांत कुमार मिश्रा का व्यक्तित्व भारतीय रेलवे में केवल एक शीर्ष प्रशासक का नहीं, बल्कि इतिहास बोध से संपन्न एक चिंतक, विरासत के संरक्षक और समय को शब्दों में थाम लेने वाले विद्वान लेखक का है।
उन्होंने इस पुस्तक में पूर्वी भारतीय रेलवे के प्रारंभिक तीन दशकों का ऐसा प्रामाणिक और व्यापक इतिहास रचा है, जो अब तक उपलब्ध किसी भी अध्ययन से कहीं आगे जाता है। यह पुस्तक प्राथमिक और मूल अभिलेखीय स्रोतों पर आधारित है—वे दस्तावेज, वे रिपोर्टें, वे पत्र और वे निर्णय, जिन्होंने रेलवे को साम्राज्य की आवश्यकता से निकालकर राष्ट्र की जीवनरेखा बनाया। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि रेलवे केवल ब्रिटिश सत्ता का औजार नहीं थी, बल्कि वही लौह मार्ग आगे चलकर भारत की आर्थिक चेतना, सामाजिक संरचना और भौगोलिक एकता की रीढ़ बना।
हिंदुस्तान का राजमार्ग’ कोई साधारण पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे की वह स्मृति है, जिसे प्रशांत कुमार मिश्रा ने शब्दों में अमर कर दिया
दक्कन में रेलवे विस्तार, अकाल और औपनिवेशिक नीतियाँ, इंजीनियरिंग के असंभव को संभव करने वाले प्रयास, गुमनाम श्रमिकों का पसीना, और दूरदर्शी सुधारकों की सोच—इन सभी को प्रशांत मिश्रा ने केवल इतिहास की तरह नहीं, बल्कि मानवीय कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक बताती है कि कैसे इस्पात की पटरियों पर सिर्फ रेलगाड़ियाँ नहीं चलीं, बल्कि एक सभ्यता ने अपनी दिशा तय की। महाप्रबंधक के रूप में प्रशांत कुमार मिश्रा ने जहां रेलवे के आधुनिक निर्माण और प्रशासन में अपनी अलग पहचान बनाई है, वहीं एक इतिहासकार के रूप में उन्होंने भारतीय रेलवे की आत्मा को संरक्षित करने का कार्य किया है।
देशभर में पचास से अधिक ऐतिहासिक रेलवे संरचनाओं के जीर्णोद्धार का नेतृत्व कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि विकास और विरासत विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हो सकते हैं।उनका लेखन केवल अकादमिक नहीं, बल्कि जीवंत है—ऐसा लेखन जो पाठक को 19वीं सदी के प्लेटफॉर्म पर खड़ा कर देता है, जहां भाप से चलती ट्रेन के साथ-साथ इतिहास की दिशा भी बदल रही होती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ डोरलिंग किंडरस्ले और पेंगुइन रैंडम हाउस जैसे विश्वविख्यात प्रकाशन समूहों द्वारा प्रकाशित की गई हैं।
‘हिंदुस्तान का राजमार्ग’ कोई साधारण पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे की वह स्मृति है, जिसे प्रशांत कुमार मिश्रा ने शब्दों में अमर कर दिया है। यह पुस्तक इतिहासकारों के लिए संदर्भ, प्रशासकों के लिए दृष्टि, विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा और आम पाठक के लिए गर्व का कारण है।यह कृति बताती है कि जब एक प्रशासक के हाथ में कलम आती है और उसके भीतर इतिहास की चेतना जागती है, तो वह केवल किताब नहीं लिखता—वह आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्र की स्मृति रच देता है।
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