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सुबह उठते ही प्रभु दर्शन से पहले मोबाइल दर्शन — स्वास्थ्य के लिए घातक
मोबाइल के बिना रहना उसके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।
आज के दौर में यदि पूछा जाए कि मनुष्य के लिए सबसे कीमती वस्तु कौन सी है, तो अधिकांश लोगों का उत्तर होगा मोबाइल। आधुनिक युग में मोबाइल मानव की सबसे प्रिय वस्तु बन चुका है। इसकी लत ऐसी है कि एक बार लग जाए तो उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन हो जाता है। आज स्थिति यह है कि मनुष्य कुछ समय तक बिना भोजन, बिना आराम और कई बार अपने परिजनों से बातचीत किए बिना भी रह सकता है, लेकिन मोबाइल के बिना रहना उसके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।
मोबाइल आज मनुष्य के हाथों से एक पल के लिए भी नहीं छूटता। यदि किसी मजबूरी में उसे अलग रखना भी पड़े, तो वह उसकी निगाहों की सीमा में ही रहता है। सुबह नींद खुलते ही घर में भगवान के दर्शन से पहले मोबाइल के दर्शन करना नई पीढ़ी की एक आदत ही नहीं, बल्कि एक नई परंपरा बनती जा रही है। मोबाइल देखने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने आसपास की दुनिया का भी ध्यान नहीं रहता।
वर्तमान समय का मानव अपने माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी या यहां तक कि अपने बच्चों से भी उतना लगाव नहीं दिखाता, जितना अपने मोबाइल से दिखाने लगा है। मोबाइल के प्रति यह अंधा मोह इस हद तक बढ़ गया है कि अनेक लोगों ने ईश्वर की अदृश्य शक्ति की अपेक्षा मोबाइल की रंगीन स्क्रीन को ही अपना आधुनिक देवता बना लिया है। तभी तो मोबाइल में डूबे व्यक्ति को न भूख का एहसास होता है,
न प्यास का, न शारीरिक थकान का और न ही किसी सामाजिक उत्तरदायित्व का। मोबाइल आज मनुष्य का महबूब बन चुका है। उसे बड़े नाज़ों से हाथों में रखा जाता है। स्थिति यह है कि जब कोई व्यक्ति मोबाइल में व्यस्त होता है और कोई उसके इस एकांत में व्यवधान डाल दे, तो अपने ही परिवार के सदस्य उसे खलनायक प्रतीत होने लगते हैं। इसके बाद घरों में तकरार और विवाद का एक नया अध्याय शुरू हो जाता है।
यह कटु सत्य है कि मनुष्य ने मोबाइल को अपनी आवश्यकता से बढ़ाकर अपनी मजबूरी बना लिया है। उसका अधिकांश समय मोबाइल की स्क्रीन पर बीत रहा है। परिणामस्वरूप वास्तविक जीवन के रिश्ते कमजोर होते जा रहे हैं और काल्पनिक दुनिया का आकर्षण बढ़ता जा रहा है। मोबाइल के माध्यम से मिलने वाले लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स आज कई लोगों के लिए सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गए हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है।
जब तक व्यक्ति इस भ्रम से बाहर निकलता है, तब तक वह मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद का शिकार हो चुका होता है। मोबाइल की अति ने घर-परिवार और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया है। सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता ने लोगों के मन में संदेह, भ्रम और अविश्वास को जन्म दिया है। जब यही संदेह विकराल रूप धारण कर लेता है, तब प्रेम और विश्वास पर आधारित रिश्ते पल भर में बिखर जाते हैं। उस समय वही मोबाइल, जो कभी सबसे प्रिय था, जीवन की सबसे बड़ी परेशानी का कारण बन जाता है।
मोबाइल की अत्यधिक लत का प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। रातों की नींद छीन रखी है, आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है, तनाव बढ़ रहा है और पारिवारिक संवाद समाप्त होते जा रहे हैं। मनुष्य आभासी दुनिया में जितना अधिक डूब रहा है, उतना ही वास्तविक जीवन से दूर होता जा रहा है। निस्संदेह, मोबाइल आधुनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, लेकिन आवश्यकता और लत के बीच की सीमा को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
तकनीक का उपयोग जीवन को सरल बनाने के लिए होना चाहिए, जीवन पर शासन करने के लिए नहीं। अतः आधुनिक और शिक्षित पीढ़ी से केवल इतना ही निवेदन है कि यदि स्वस्थ मन, स्वस्थ तन और सुखी पारिवारिक जीवन चाहिए, तो दिन की शुरुआत मोबाइल दर्शन से नहीं, प्रभु दर्शन से करें। कुछ समय अपने परिवार, प्रकृति और स्वयं के लिए भी निकालें। तभी तकनीक और जीवन के बीच संतुलन स्थापित हो सकेगा तथा मनुष्य वास्तविक सुख और शांति का अनुभव कर सकेगा।
अरविंद रावल


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