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सत्ता जाते ही ममता के अपने ही बागी हो गए!
पार्टी के भीतर बड़ी बगावत और कानूनी मुकदमों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
मनोज कुमार अग्रवाल
आपने एक पुरानी कहावत तो जरूर सुनी होगी कंगाली में आटा गीला। यह ममता बनर्जी के साथ बिल्कुल खरी साबित हो रही है एक ओर वह सत्ता से बाहर हो गयीं हैं दूसरे ओर उनके अपने ही उनके खिलाफ मुखर हो गएं हैं। आपको बता दें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक और कानूनी परेशानियां मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद से लगातार बढ़ रही हैं। पार्टी के भीतर बड़ी बगावत और कानूनी मुकदमों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
ममता बनर्जी की बढ़ती परेशानियों की वजह ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के 58 विधायकों ने बागी रुख अपनाते हुए निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुन लिया है, जिसे विधानसभा स्पीकर ने मंजूरी भी दे दी है। इसके साथ ही, लगभग 20 से अधिक टीएमसी सांसदों के भी भाजपा के संपर्क में होने की खबरें सामने आ रही हैं।
पार्टी पर पकड़ ढीली होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संकट के बीच ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई हाई-लेवल बैठक में 80 में से केवल 8 विधायक और 41 में से सिर्फ 6 सांसद ही शामिल हुए। ज्यादातर निर्वाचित प्रतिनिधियों ने इस बैठक से दूरी बना ली, जो उनके नेतृत्व को एक सीधा चैलेंज माना जा रहा है।
राजनीतिक मोर्चे के साथ-साथ ममता बनर्जी अब कानूनी पचड़े में भी फंस गई हैं। चुनाव के दौरान दिए गए उनके बयानों और "बांग्लादेश में हुई राजनीतिक हत्या के मामले को केंद्र सरकार से जोड़ने" को लेकर उनके खिलाफ सिलीगुड़ी और कोलकाता में राजद्रोह और हेट स्पीच की शिकायतें व पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई गई हैं। याचिकाकर्ताओं ने इसे देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है।
सत्ता हाथ से जाने के बाद जमीनी स्तर पर भी भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भगदड़ मची हुई है। उनके बेहद करीबी माने जाने वाले कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम और बिधाननगर की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा राज्यभर में 100 से ज्यादा टीएमसी पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है।
ममता बनर्जी को अपने ही गढ़ भवानीपुर सीट से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के हाथों 15,105 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। राज्य में 15 साल पुराने टीएमसी शासन का अंत हो गया है और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नई सरकार का गठन हो चुका है। ममता बनर्जी इन सभी विपरीत हालातों के खिलाफ सड़कों से लेकर हाइकोर्ट तक कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ रही हैं।
आपको पता है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम एक माह पूर्व 4 मई को सामने आए थे। इनमें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को निराशा का मुंह देखना पड़ा था। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में उसे 80 सीटें ही मिली थीं। इस तरह 15 वर्ष तक प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं ममता का शासन खत्म हो गया था। ममता ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी।
लम्बी अवधि तक वह इसके साथ जुड़ी रहीं, परन्तु 28 वर्ष पूर्व 1998 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.) का गठन किया था और कम्युनिस्ट पार्टियों के तीन दशकों से भी अधिक प्रदेश में चले आ रहे लम्बे शासन को खत्म करने के लिए बड़ी दिलेरी और दृढ़ता से उसका मुकाबला किया था। इस समय लोकसभा में इनके 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, परन्तु विगत लम्बी अवधि से इस पार्टी के भीतर ममता की तानाशाही और टकराव वाली नीतियों के कारण असंतोष और असहमति चल रही थी, परन्तु उनकी प्रशासन पर सख्त पकड़ और कठोर फैसलों से यह बग़ावत अंदर-अंदर ही सुलगती रही थी।
ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपने साथ राजनीति में लाकर उसे अधिक शक्तियां दे दी थीं। बनर्जी के काम करने के ढंग-तरीके से भी पार्टी गलियारों में असंतोष था, जिसके संबंध में ममता को लगातार उनकी पार्टी के नेताओं द्वारा अवगत करवाया जाता रहा था परन्तु ममता ने इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया। अपनी ताकत के दम पर उन्होंने बड़ी राष्ट्रीय नेता होने का भ्रम भी पाल लिया था, जिस कारण राष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों ही पार्टियों द्वारा बनाए गए 'इंडिया गठबंधन' की वह सदस्य ज़रूर बनी रही थीं, परन्तु इसमें शामिल अलग-अलग पार्टियों के सभी नेताओं से ऊंचा कद होने का भ्रम उन्होंने पाल रखा था।
इसलिए विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने अपनी किसी भी सहयोगी पार्टी के साथ गठबंधन करने से इन्कार कर दिया था। उनके शासन के समय प्रदेश की आर्थिकता भी बेहद कमज़ोर हो गई थी और यह पूरी तरह कर्ज में डूब चुका था। केन्द्र के साथ लगातार टकराव रहने के कारण और उद्योग को समर्थन न मिलने के कारण प्रदेश की आर्थिकता डावांडोल हो गई थी। इसके साथ ही बेरोज़गारी की दर भी बढ़ चुकी थी, परन्तु पिछला पूरा समय केन्द्र और अन्य पार्टियों के साथ टकराव बने रहने के कारण भी उनकी प्रशासनिक तौर पर पकड़ ढीली पड़ चुकी थी। ऐसी स्थिति लोगों के भीतर निराशा में बदलती गई। लगातार सरकार विरोधी भावनाओं के बढ़ने का अनुमान लगाने में वह असमर्थ रहीं और न ही वह दीवार पर लिखे को पढ़ सकीं, जिस कारण उन्हें चुनाव में निराशा का मुंह देखना पड़ा।
हार के बाद भी उन्होंने खुले मन से आत्म-मंथन करने की बजाए अपनी पार्टी के भीतर असंतोष को अनदेखा किए रखा जो अंत में उनके लिए हानिकारक सिद्ध हुई। आंतरिक यह चिंगारी उस समय लपटें बन गई, जब उन्होंने ज्यादातर पार्टी नेताओं को अनदेखा करके अभिषेक बनर्जी के कहने पर विधानसभा में विपक्ष के नेता के लिए सैमन देव का नाम स्पीकर को भेज दिया, परन्तु ज्यादातर विधायक इस पद के लिए रिताव्रता बनर्जी के पक्ष में थे, परन्तु ममता ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इस पद के लिए स्पीकर को विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र भेज दिया, जिस कारण ज्यादातर नेताओं ने बग़ावत का मार्ग अपना लिया।
इस मामले को लेकर ही बुधवार को पार्टी के 80 विधायकों में से 59 विधायकों ने विधानसभा के स्पीकर से सम्पर्क किया। अपने हस्ताक्षरों वाला पत्र उन्हें सौंपा और अपने गुट को असली तृणमूल कांग्रेस बताया। पार्टी के 28 वर्ष के के इतिहास में ममता पर पहली बार इतना बड़ा हमला हुआ है। इसकी उदाहरण महाराष्ट्र से मिलती है, जब 20 जून, 2022 को वहां शिव सेना के 55 में से 40 विधायकों ने एकनाथ शिंदे का उस समय साथ दिया था, जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे। उसके सप्ताह भर बाद ही शिंदे वहां भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए थे। अब दो तिहाई सदस्यों के एकजुट होने से विधानसभा में ममता के समर्थक सदस्य 2 दर्जन से भी कम रह गए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक हालत और भी दयनीय हो गई प्रतीत होती है।
दूसरी तरफ भाजपा को बड़ी जीत प्राप्त होने के कारण उसके नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के बागियों के साथ कोई भी समझौता करने से इंकार कर दिया है। रिताव्रता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी विद्यार्थी संगठन से की थी। 34 वर्ष की उम्र में वह राज्यसभा के सदस्य बन गए थे और बाद में वह टी.एम.सी. में शामिल हो गए थे। ममता ने ही उन्हें वर्ष 2024 में राज्यसभा में भेजा था। विधानसभा चुनाव में वह उलबेरिया सीट से विधायक चुने गए हैं। चाहे ममता ने इस बड़ी चुनौती के समक्ष भी अपना हौसला कायम रखते हुए इन बागियों और भाजपा को ललकारा है।
इसके साथ ही उन्होंने भाजपा विरोधी पार्टियों से सम्पर्क करने की बात भी की है, परन्तु अब यह देखना शेष होगा, कि वह निकट भविष्य में प्रदेश और देश की राजनीति में किस तरह विचरण करेंगी।स्पष्ट है कि आज की राजनीति में साम दाम दंड भेद सब का चलन बढ़ गया है सत्ता में सबको समेट रखने की ताकत है लेकिन सत्ता से बाहर होते ही अपने सगे साथियों की हकीकत सामने आ जाती है कि उनके दिल में कितना खार छुपाए बैठे थे यह बदलते दौर की राजनीति की नंगी तस्वीर है इस को स्वीकार करना ही होगा।
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