सीबीएसई का डिजिटल प्रयोग बना छात्रों की सबसे बड़ी परीक्षा

सीबीएसई मूल्यांकन विवाद: मेहनत छात्रों की, गलती सिस्टम की, धुंधली स्कैनिंग, टूटते सपने: सीबीएसई के मूल्यांकन मॉडल पर बड़ा सवाल  

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

 जब सुधार के नाम पर व्यवस्था ही संकट बन जाएतब शिक्षा तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सीबीएसई ने 2026 में कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएमप्रणाली लागू कीजिसे पारदर्शिता और गति की दिशा में बड़ा कदम माना गया। उद्देश्य था निष्पक्ष और त्रुटिरहित मूल्यांकनलेकिन वास्तविकता ने लाखों छात्रों का भरोसा तोड़ दिया। धुंधली स्कैनिंगगलत उत्तर पुस्तिकाओं का अपलोडकई उत्तरों का बिना जाँच छूटना और पोर्टल की तकनीकी विफलताओं ने वर्षों की मेहनत पर संकट खड़ा कर दिया। नतीजतन पास प्रतिशत गिरकर 85.2% पर आ गयाजो सात वर्षों का सबसे निचला स्तर रहा। कई मेधावी छात्र अचानक कम अंकों से स्तब्ध रह गए। यह केवल तकनीकी गड़बड़ी नहींबल्कि सपनों पर पड़ा गहरा आघात बन गया।

जहाँ शिक्षा सपनों को उड़ान देती हैवहीं डिजिटल अव्यवस्था ने हजारों छात्रों के भविष्य पर विराम लगा दिया। जेईई मेन पास करने वाले कई मेधावी छात्र ओएसएम की खामियों के कारण क्लास 12 में अपेक्षित अंक नहीं ला सके। कई मेधावी छात्र अपेक्षित अंकों (विशेषकर 75% कट-ऑफसे पीछे रह गएजिससे एनआईटी/ आईआईटी आदि में प्रवेश प्रभावित हुआ। फिजिक्सकेमिस्ट्रीमैथ्स और इंग्लिश में अप्रत्याशित कम अंकों ने वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया। कोचिंग का खर्चजागी रातें और सुनहरे सपने एक तकनीकी गड़बड़ी के आगे बिखरते दिखे। यह केवल रिजल्ट की भूल नहींबल्कि युवाओं के करियर और आत्मविश्वास पर गहरा आघात है।

जब एक गलती मार्कशीट से निकलकर मन तक पहुँच जाएतब उसका असर सबसे भयावह हो जाता है। पूरी मेहनत और समर्पण से तैयारी करने वाले हजारों छात्र अचानक चिंतानिराशा और मानसिक दबाव में घिर गए। सोशल मीडिया पर उठते “हमारी मेहनत क्यों बर्बाद?” जैसे सवाल व्यवस्था की संवेदनहीनता उजागर करने लगे। कई विद्यार्थियों की नींद छिन गईपरिवार तनाव में डूब गए और कॉलेज एडमिशन की डेडलाइन ने युवाओं को टूटन के कगार पर पहुँचा दिया। शिक्षा का उद्देश्य आत्मविश्वास जगाना हैन कि युवाओं को असुरक्षा में धकेलना। लेकिन सीबीएसई की लापरवाही ने हजारों घरों की शांति और भरोसा दोनों हिला दिए।  डिजिटल गलती का यह प्रभाव अब केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रहाबल्कि घर-घर की बेचैनी बन गया।

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जब जांच की प्रक्रिया ही भरोसे के संकट में घिर जाएतब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि पूरा परिणाम दोबारा मैनुअल तरीके से क्यों न तैयार कराया जाए। जिन स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं को छात्र स्वयं स्पष्ट रूप से नहीं पढ़ पा रहेउसी डिजिटल प्रारूप में निष्पक्ष री-इवैल्यूएशन कैसे संभव माना जाएयही कारण है कि मैनुअल री-चेकिंग की मांग अब सबसे न्यायपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है। शिक्षक जब वास्तविक कॉपी देखकर जाँच करते हैंतब वे लिखावटउत्तर की संरचना और सोच की क्रमबद्धता को बेहतर समझ पाते हैं। इसके विपरीत ओएसएम में धुंधली इमेजसीमित दृश्यता और स्क्रीन थकान के कारण कई सही उत्तर भी अनदेखे रह गए। यही कारण है कि प्रभावित छात्रों के लिए मैनुअल री-चेकिंग या पूर्ण समीक्षा की मांग अब सबसे न्यायपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है।

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डिजिटल व्यवस्था की चमक उस समय बिखर गईजब पोर्टल की खामियां छात्रों के लिए नई परेशानी बन गईं। उत्तर पुस्तिका प्राप्त करने और री-इवैल्यूएशन के लिए छात्रों को घंटों पोर्टल पर जूझना पड़ालेकिन बार-बार तकनीकी गड़बड़ियों ने पूरी प्रक्रिया को अव्यवस्थित बना दिया। पेमेंट फेल होने के बावजूद राशि कट जानाकैप्चा गायब होना और आवेदन ‘पेंडिंग’ रहना जैसी समस्याओं ने तनाव कई गुना बढ़ा दिया। कई छात्रों को आर्थिक नुकसान झेलने के बाद भी प्रक्रिया अधूरी और अनिश्चित बनी रही। सीबीएसई द्वारा फीस कम करना और डेडलाइन बढ़ाना राहत जरूर हैपर यह केवल अस्थायी उपाय है। असली संकट कमजोर डिजिटल ढांचे का है। तकनीक तभी वरदान बनती हैजब उसकी नींव मजबूतसुरक्षित और भरोसेमंद होअन्यथा वही सुविधा शिक्षा पर अतिरिक्त बोझ बन जाती है।

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एक तकनीकी गलती छात्रों की प्रतिभा तय नहीं कर सकतीलेकिन उसने सीबीएसई की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ओएसएम की खामियों ने साफ कर दिया कि चूक प्रणाली की हैछात्रों की मेहनत की नहीं। जेईई मेन जैसी कठिन परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों की योग्यता किसी पोर्टल त्रुटि से कम नहीं हो जाती। ऐसे समय में छात्रों को अपना आत्मविश्वास और तैयारी बनाए रखनी चाहिए। नए कौशल और वैकल्पिक अवसर आगे की राह मजबूत करेंगे। सफलता केवल अंकों से नहींबल्कि संघर्ष और धैर्य से तय होती है। यह संकट छात्रों का नहींबल्कि सीबीएसई की डिजिटल व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गया है।

अब जिम्मेदारी सीबीएसई और नीति-निर्माताओं की है। शिक्षा व्यवस्था में भरोसा लौटाना हैतो केवल सफाई नहींठोस सुधार जरूरी हैं। आई-आई-टी जैसे संस्थानों की मदद से ओएसएम प्रणाली को मजबूत बनाया जा सकता है। प्रभावित छात्रों के लिए मैनुअल री-चेकिंग तुरंत शुरू होनी चाहिए। जब डिजिटल मूल्यांकन पर इतने सवाल उठ चुके हैंतो पूरा परिणाम दोबारा मैनुअल तरीके से क्यों न तैयार कराया जाए। शिक्षा मंत्री ने रिपोर्ट मांगी हैलेकिन अब जरूरत निर्णायक कार्रवाई की है। छात्रों की आवाज आज शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है।

जब एक तकनीकी व्यवस्था लाखों सपनों को संदेह में डाल देतब यह केवल रिजल्ट की गड़बड़ी नहीं रह जातीबल्कि पूरी डिजिटल शिक्षा प्रणाली पर सवाल बन जाती है। जब लाखों छात्र एक साथ प्रभावित होंतब चुप्पी समाधान नहीं बन सकती। यदि सीबीएसई छात्र हित को केंद्र में रखकर मैनुअल री-चेकिंग और तकनीकी सुधार लागू करेतो खोया भरोसा लौट सकता है। अब बोर्ड को स्वनिर्णय लेते हुए पूरे परिणाम की निष्पक्ष मैनुअल समीक्षा करानी चाहिए। छात्रों को भी अपनी मेहनत और संघर्ष पर विश्वास बनाए रखना होगा। यह कठिन दौर बीत जाएगाप्रणाली सुधरेगीलेकिन युवाओं की लगन ही देश का असली भविष्य तय करेगी।

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