​"प्रतियोगी परीक्षाओं का निरस्तीकरण और परीक्षार्थियों की मनोदशा"

इसका सर्वाधिक प्रहार परीक्षार्थियों की मनोदशा पर पड़ता है।

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प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
 
​प्रतियोगी परीक्षाएँ आज केवल आजीविका प्राप्त करने का माध्यम नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मुख्य द्वार भी हैं। इन परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना युवाओं के सपनों, आत्मसम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की दिशा तय करने का आधार बन चुका है। लाखों विद्यार्थी वर्षों तक अपने घर और परिजनों से दूर रहकर कठिन परिश्रम, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच तैयारी करते हैं। ऐसे में जब कोई प्रश्नपत्र लीक होता है या अनियमितताओं के कारण परीक्षा निरस्त की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक निर्णयों तक सीमित नहीं रहता। इसका सर्वाधिक प्रहार परीक्षार्थियों की मनोदशा पर पड़ता है।
 
​विशेषकर वे परीक्षार्थी अधिक आहत होते हैं, जिनके पेपर अच्छे गए थे और जिनके चयन की प्रबल संभावना थी। उनके मन में कई कई  तरह के प्रश्न जन्म लेने लगते हैं: क्या आगामी परीक्षा का स्तर पहले से कठिन होगा? क्या वे पुनः उसी दक्षता के साथ प्रदर्शन कर पाएंगे? वहीं दूसरी ओर, जिनके पेपर अच्छे नहीं हुए थे, उनके लिए यह एक नए अवसर के रूप में आता है। हालांकि, परीक्षा के बाद जो मानसिक विश्राम की स्थिति आती है, उससे निकलकर पुनः उसी लय और एकाग्रता के साथ परीक्षा तैयारी करना एक बड़ी चुनौती होती है।
 
​भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में, जहाँ सीमित अवसरों के बीच आरक्षण नीति और तीव्र प्रतिस्पर्धा मौजूद है, इन परीक्षाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक-एक पद के लिए लाखों अभ्यर्थी संघर्ष करते हैं। कई परिवार कर्ज लेकर बच्चों को बड़े शहरों में कोचिंग कराते हैं। ऐसी स्थिति में परीक्षा का निरस्त होना उनके लिए केवल एक सूचना नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक और आर्थिक आघात होता है।​जब परीक्षा निरस्त होती है, तो परीक्षार्थियों में गहरा मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। वर्षों की तैयारी अचानक निरर्थक लगने लगती है। नई तिथि की अनिश्चितता और फिर से उसी दबाव भरे चक्र में लौटना अत्यंत कष्टकारी होता है।
 
कई परीक्षार्थी अवसाद , निराशा और क्रोध का शिकार हो जाते हैं। विशेष रूप से वे अभ्यर्थी, जो आर्थिक रूप से विपन्न हैं या अपनी आयु-सीमा के अंतिम पड़ाव पर हैं, उनके लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। उन्हें महसूस होता है कि व्यवस्था की लापरवाही ने उनकी मेहनत का मूल्य छीन लिया है।​इसका दूसरा बड़ा प्रभाव व्यवस्था के प्रति अविश्वास के रूप में प्रकट होता है। बार-बार पेपर लीक और भ्रष्टाचार की खबरें युवाओं का भरोसा चयन प्रणाली से उठा देती हैं। जब ईमानदार परिश्रम का परिणाम संदिग्ध हो जाए, तो समाज में एक नैतिक संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
 
​मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह समस्या विकराल होती जा रही है। अनिद्रा, चिंता  और सामाजिक अलगाव के साथ-साथ कई बार सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें तनाव को और बढ़ा देती हैं। अत्यंत संवेदनशील मामलों में यह हताशा आत्मघाती विचारों तक ले जाती है, जो राष्ट्र के लिए चिंताजनक है।​इसके साथ ही, आर्थिक क्षति भी एक बड़ा पक्ष है। विद्यार्थियों को यात्रा, आवास और अध्ययन सामग्री पर बार-बार व्यय करना पड़ता है। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह दोहरा आर्थिक बोझ उनके भविष्य की योजनाओं को डगमगा देता है।
​इस समस्या के समाधान के लिए परीक्षा नियामक निकायों में स्वच्छ छवि वाले और ईमानदार अधिकारियों की नियुक्ति अनिवार्य है। इसके साथ ही आवश्यक हैं ​(अ)नकल माफिया और दोषियों के विरुद्ध त्वरित अदालती कार्यवाही और कठोर सजा प्रावधान(ब) प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए डिजिटल निगरानी और आधुनिक तकनीक का उपयोग।(स)परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों और कोचिंग सेंटरों की निगरानी व जवाबदेही सुनिश्चित करना।(द) परीक्षार्थियों के लिए सरकारी स्तर पर हेल्पलाइन और परामर्श की व्यवस्था।
अतः प्रतियोगी परीक्षाओं को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया न मानकर 'राष्ट्रीय प्रतिभा' के संरक्षण की प्रक्रिया समझा जाना चाहिए। यदि देश का युवा व्यवस्था पर विश्वास करेगा, तभी वह सकारात्मक ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान दे पाएगा। पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षा प्रणाली आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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