ऑपरेशन सिंदूर में जवानों की सेवा कर 11 वर्षीय श्रवण सिंह बना देशभक्ति, समर्पण और साहस का अद्भुत प्रतीक
जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है।
जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेलों में खोए रहते हैं, उस उम्र में श्रवण सिंह भारतीय सेना के जवानों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर चुका था। उसका हर कदम राष्ट्रभक्ति की उस पवित्र भावना से प्रेरित था, जो किसी साधारण बच्चे में नहीं, बल्कि किसी असाधारण आत्मा में ही दिखाई देती है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सेना सीमा पर पूरी मुस्तैदी से डटी हुई थी, तब श्रवण सिंह बिना किसी भय और संकोच के जवानों के बीच पहुंचता रहा। सुबह होते ही वह चाय लेकर खेतों और कच्चे रास्तों से गुजरता हुआ सेना के कैंप तक पहुंच जाता। दोपहर की भीषण गर्मी में वह जवानों के लिए बर्फ लेकर जाता ताकि देश की रक्षा में लगे सैनिकों को थोड़ी राहत मिल सके। शाम के समय वह दूध और लस्सी लेकर फिर कैंप में पहुंच जाता। उसके मन में न कोई डर था, न कोई स्वार्थ। उसके भीतर केवल एक ही भावना थी—देश के वीर जवानों की सेवा करना। यह भावना किसी किताब से नहीं आती, यह राष्ट्रप्रेम की वह आग होती है जो आत्मा में जन्म लेती है।
श्रवण सिंह जब जवानों के बीच जाता था तो उनके साथ बड़े गर्व से घूमता और उनकी बंदूक हाथ में लेकर कहता, “मैं भी बड़ा होकर सैनिक बनूंगा।” यह केवल एक मासूम इच्छा नहीं थी, बल्कि उस बालक के हृदय में धधकती देशभक्ति की लौ थी। उसकी आंखों में सेना की वर्दी के प्रति जो सम्मान था, वह बताता है कि भारत की नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम की भावना कितनी गहरी है। श्रवण के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जो जज्बा दिखाई देता है, वह वास्तव में करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
भारतीय सेना भी इस नन्हे सिपाही के समर्पण और सेवा भावना से अत्यंत प्रभावित हुई। सेना ने श्रवण को केवल सम्मान ही नहीं दिया, बल्कि उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए “गोद” ले लिया। यह किसी भी बच्चे के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। सेना ने उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाई। जब जवानों को पता चला कि श्रवण डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा है, तब उन्होंने तुरंत उसकी चिकित्सा की व्यवस्था की। उसकी बेहतर पढ़ाई के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया गया और आगे की शिक्षा के लिए कपूरथला भेजने का निर्णय लिया गया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि उस देशभक्त बालक के प्रति सेना का प्रेम और सम्मान है।
श्रवण सिंह की कहानी यह सिद्ध करती है कि देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। केवल 11 वर्ष की उम्र में उसने जो कार्य किया, वह बड़े-बड़े लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गया। वह न किसी पुरस्कार के लिए काम कर रहा था, न किसी प्रसिद्धि के लिए। उसके मन में केवल भारत माता के प्रति प्रेम था। यही कारण है कि उसकी सेवा भावना को पूरे देश ने सलाम किया और उसे प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी श्रवण सिंह की खुलकर प्रशंसा की। बाल पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने उसके जज्बे को याद करते हुए कहा था कि जिन कपड़ों और चप्पलों में यह बच्चा देश सेवा कर रहा था, उन्हें संभालकर रखा जाए क्योंकि वे इतिहास का हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री के ये शब्द केवल तारीफ नहीं थे, बल्कि उस बालक के राष्ट्रप्रेम को दिया गया सर्वोच्च सम्मान थे। देश के प्रधानमंत्री का किसी छोटे बच्चे के समर्पण को इस प्रकार सम्मान देना यह दर्शाता है कि श्रवण का कार्य कितना असाधारण था।
श्रवण सिंह को देशभर की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। कश्मीर से लेकर इंदौर तक उसे बुलाकर सम्मान दिया गया। उसे पहली बार हवाई जहाज में बैठाकर इंदौर ले जाया गया। यह सब उस बच्चे के लिए किसी सपने जैसा था, लेकिन इन सब उपलब्धियों के बाद भी श्रवण के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी उसी सादगी और विनम्रता के साथ अपने गांव में रहता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
आईपीएल में पंजाब किंग्स की मालकिन और प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने भी श्रवण को मोहाली आमंत्रित किया। वहां उसने उनके साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा। लेकिन श्रवण के लिए सबसे बड़ा गौरव क्रिकेट मैच देखना नहीं, बल्कि भारतीय सेना के जवानों के बीच रहना था। उसके लिए सैनिकों की वर्दी किसी हीरो से कम नहीं थी। यही कारण है कि वह हर समय सेना के प्रति सम्मान और प्रेम से भरा दिखाई देता है।
श्रवण के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है। उसके पिता सोना सिंह एक छोटे किसान हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इस परिवार ने अपने बेटे में देशभक्ति और संस्कारों की जो भावना जगाई, वह वास्तव में अनुकरणीय है। श्रवण के माता-पिता को भी यह अंदाजा नहीं था कि उनका छोटा-सा बेटा एक दिन पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है कि महानता कभी साधनों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से जन्म लेती है।
आज जब समाज में स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की भावना बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रवण सिंह जैसे बच्चे आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। वह बताता है कि सच्चा देशप्रेम क्या होता है। देशभक्ति केवल नारों और भाषणों से सिद्ध नहीं होती, बल्कि सेवा, त्याग और समर्पण से प्रकट होती है। श्रवण ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम हो तो छोटी उम्र भी बड़े कार्य करने से नहीं रोक सकती।
श्रवण सिंह वास्तव में भारत माता का वह वीर पुत्र है, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी। उसकी आंखों में सैनिक बनने का सपना केवल उसका व्यक्तिगत सपना नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव का सपना है। वह करोड़ों बच्चों के लिए उदाहरण है कि देश के प्रति प्रेम और सम्मान बचपन से ही जीवन का सबसे बड़ा संस्कार होना चाहिए।
यह नन्हा सिपाही केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे भारत का गौरव बन चुका है। उसकी देशभक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की भावना हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की नई ऊर्जा भरती है। श्रवण सिंह जैसे बच्चे ही भारत के भविष्य की असली ताकत हैं, जिनके कारण यह विश्वास और मजबूत होता है कि भारत की आत्मा आज भी देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओतप्रोत है।
*कांतिलाल मांडोत*
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