भारत में कभी शाश्वत नहीं रही अस्पृश्यता

इसके उदाहरण हम आज भी अपने घरों में देखते है

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

वर्तमान भारत में अस्पृश्यता को लेकर कई प्रकार के विमर्श चल रहे हैं। एक विमर्श यह है कि भारत में उच्च वर्ग के लोगों ने निम्न वर्ग के साथ भेद - भाव किया। उन्हें पानी पीने, शिक्षा प्राप्त करने एवं समान व्यवहार के लिए वंचित किया गया। यह विमर्श सर्वथा झूठ और मन गठन्त कहानी और कुंठा से भरा हुआ है। सच तो यह है कि इस प्रकार की उच्च जाति व निम्न जाति का विषय भारत के लोगों द्वारा नहीं अपितु भारत में लम्बे समय तक हुए बाह्य आक्रमणों मुगलों व अंग्रेजों की देन है। जो कभी स्थाई नहीं रही। प्राचीन भारत में कभी जाति वैमनस्यता, घृणा, ऊंच नीच का भाव जनमानस में नहीं था। इसके उदाहरण हम आज भी अपने घरों में देखते है।

जैसे जब हमारे घरों में वैदिक परंपरा से विवाह होता है तब उस विवाह को संपन्न कराने के लिए सर्व समाज जाति बिरादरी के लोगों का कार्य होता है उनके भाग के बिना विवाह के सारे कार्यक्रम सम्पन्न होना संभव ही नहीं। इसमें किसी भी प्रकार का कोई भेद भाव नहीं है। वहीं यदि सतयुग की बात करते हैं तो राजा हरिश्चंद्र आते हैं जो डोम के यहां नौकरी करते हैं कोई भेद भाव नहीं है। राजा बलि और भगवान वामन देव का उदाहरण कोई भेद नहीं है। इसी प्रकार त्रेता युग में भगवान श्रीराम के जीवन से स्पष्ट होता है कि समाज कितना एक रस था।

भीलनी के झूठे बेर खाने का प्रसंग, वनवासियों के साथ संगठन कर लंका विजय का प्रसंग, निषादराज को गले लगाना "तुम मोहि प्रिय भरतहीं सम भाई" इत्यादि अनेकों उदाहरण समाज को एक साथ बिना किसी भेद के दर्शाते हैं। द्वापर में जब हम बात करते हैं तब भी समाज में कोई जातीय वैमनस्य अस्पृश्यता नहीं है भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएं सारे भेदों से परे हैं। पांडवों का अज्ञातवास के समय अनेकों ऐसी घटनाएं मिलती है जहां कोई भेद भाव नहीं है। भीम और हिडम्बा का विवाह, राजा शांतनु का विवाह, विदुर के यहां भगवान का भोजन इत्यादि।

महाभारत में बहुत सारे सहज समरसता के विषय मिल जाएंगे जो समाज में एकाकार को दर्शाते हैं अब हम कलियुग की बात करते हैं यहां भी कोई जातीय वैमनस्य नहीं है। मध्यकाल में भारत में हुए आक्रमणों से हिन्दू समाज में कुछ विकृतियां आई लेकिन कभी शाश्वत नहीं रही उन्हें दूर करने के लिए भारत में अनेकों संत, महात्माओं, मनीषियों, महापुरुषों ने समय समय पर समाज को दिशा प्रदान कर अभियान चलाया है। चाहे वह स्वामी दयानंद सरस्वती जी, गोस्वामी तुलसीदास जी, राजा राममोहन राय, सन्त रविदास, गुरुनानक देव जी, मीराबाई, सन्त नामदेव जी, शिवा जी महाराज, महाराणा प्रताप, डॉ केशव बलीराम हेडगेवार, सावित्री बाई फुले, लोकमाता अहिल्याबाई होकलर आदि सैकड़ों नाम है जो भारत में बाहर से आई कुरीतियों को लेकर समाज में लम्बा संघर्ष किया।

महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मंथन और राजनीति का नया दौर Read More महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मंथन और राजनीति का नया दौर

आज डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के विषय को लेकर राजनैतिक लोग समाज में घृणा फैलान का कार्य करते हैं। डॉ अम्बेडकर ने कभी भी समाज को विभाजित करने की बात नहीं की उन्होंने भी संपूर्ण हिन्दू समाज को साथ रहने की वकालत की है। डॉ अम्बेडकर के जीवन में जब कभी ऐसी घटनाएं अस्पृश्यता की आईं भी तो हमारे ही लोगों ने उनका विरोध किया और डॉ अम्बेडकर को आगे बढ़ाया। डॉ अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने वाले ब्राह्मण बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर को 'अंबेडकर' सरनेम उनके ब्राह्मण शिक्षक कृष्णाजी केशव अंबेडकर ने दिया था।

भारत तेजी से तीसरी अर्थव्यवस्था का देश बनने को अग्रसर है तब क्यों नोएडा में मजदूरो ने  न्यूनतम वेतन बढ़ाने के आन्दोलन किया Read More भारत तेजी से तीसरी अर्थव्यवस्था का देश बनने को अग्रसर है तब क्यों नोएडा में मजदूरो ने  न्यूनतम वेतन बढ़ाने के आन्दोलन किया

स्कूल के रिकॉर्ड में उनका मूल उपनाम 'अंबावाडेकर' (गांव के नाम पर) से बदलकर शिक्षक ने अपना उपनाम 'अंबेडकर' रख दिया था। इसलिए भारत में जातीय घृणा का सिद्धांत कभी नहीं रहा है। मेरा सभी से आग्रह है कि भारत को जानो, भारत को मानो और भारत के बनो। किसी भी पूर्वाग्रह से बाहर निकलिए स्वच्छ मन मस्तिष्क से भारत के ग्रंथों का अध्ययन करें। भारतीय वांग्मय में भी कहीं पर घृणा, उन्मूलन का संदर्भ नहीं है बस शास्त्रों का अध्ययन उनकी व्याख्या मनमाने ढंग से करने से बचें परम्परा से प्राप्त ज्ञान के आचार्यों से मिलकर अध्ययन करें सबकुछ समझ में आयेगे। डॉ अम्बेडकर का मत भी है कि सबके साथ समान व्यवहार, समान शिक्षा, समान सम्मान। खूब पढ़ो, परिश्रम करो, सफलता प्रदान करो आरक्षण की वैशाखी से बाहर निकले।

गर्मी की मार, गिरता जनस्वास्थ्य: आखिर कब जागेगी नीति-व्यवस्था? Read More गर्मी की मार, गिरता जनस्वास्थ्य: आखिर कब जागेगी नीति-व्यवस्था?

बाल भास्कर मिश्र

About The Author

Post Comments

Comments