महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मंथन और राजनीति का नया दौर

इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं

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लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश होने के साथ ही देश की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन में लंबा समय तय किया गया है और इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन चुका है। चर्चा के लिए पहले मतदान हुआ जिसमें बहुमत ने इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।
 
यह पूरा घटनाक्रम उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जब वर्ष 2023 में महिला आरक्षण कानून को संसद से मंजूरी मिली थी। उस समय इसे नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था लेकिन इसके लागू होने की समयसीमा जनगणना और परिसीमन से जुड़ी शर्तों के कारण आगे खिसकती नजर आ रही थी। अब सरकार ने संशोधन के जरिए इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और लागू करने की समयसीमा को आगे लाने की कोशिश की है ताकि वर्ष 2029 के आम चुनावों तक इसका प्रभाव दिखाई दे सके।
 
नए प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने की योजना है। वर्तमान में यह संख्या 543 है। इस विस्तार के साथ ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है जिससे लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व के स्वरूप का भी संकेत देता है क्योंकि इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा उछाल आ सकता है।
 
सरकार का तर्क है कि यह संशोधन सामाजिक न्याय और समान भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उनका कहना है कि संविधान में संशोधन करने का अधिकार संसद को है और समय समय पर देश की जरूरतों के अनुसार ऐसे बदलाव जरूरी होते हैं। इस दृष्टिकोण के साथ सरकार यह भी स्पष्ट कर रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया को नई जनगणना के बजाय 2011 के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा जिससे देरी कम हो और कानून जल्दी लागू हो सके।
 
वहीं विपक्ष ने इस पूरे प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महिला आरक्षण का वे समर्थन करते हैं लेकिन परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने के तरीके पर आपत्ति है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए राज्यों के बीच संतुलन बिगाड़ने की कोशिश हो रही है और यह संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है। कुछ नेताओं ने इसे समाज को वर्गों में बांटने की साजिश भी बताया है।
 
राजनीतिक बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने की मांग को लेकर सामने आया है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर महिलाओं को आरक्षण दिया जा रहा है तो उसमें सभी वर्गों की महिलाओं को समान रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसके जवाब में सरकार की ओर से यह कहा गया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है और यह संभव नहीं है। इस पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली।
 
इस पूरे विवाद में परिसीमन सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है। परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण ताकि जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। अभी तक सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया जा रहा था लेकिन अब इसमें बदलाव का प्रस्ताव है। नए प्रस्ताव के तहत संसद को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह तय करे कि किस जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए।
 
इस बदलाव का असर राज्यों पर अलग अलग तरीके से पड़ सकता है। अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में सीटों का अनुपात घट सकता है। यही कारण है कि तमिलनाडु और अन्य राज्यों के नेताओं ने इसका विरोध किया है और इसे क्षेत्रीय असंतुलन की ओर कदम बताया है।
 
महिला आरक्षण के प्रभाव को समझने के लिए वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। अभी लोकसभा में महिलाओं की संख्या बहुत कम है और कुल सदस्यों का लगभग चौदह प्रतिशत ही महिलाएं हैं। राज्यसभा में भी यह प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं है। वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत इस मामले में काफी पीछे है और कई छोटे देश भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व में आगे हैं। ऐसे में यह कानून भारत को इस दिशा में आगे ले जाने की क्षमता रखता है।
 
हालांकि इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। आरक्षित सीटों का रोटेशन हर चुनाव में होगा जिससे नेताओं को अपने क्षेत्र बदलने पड़ सकते हैं। इसके अलावा राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा और अधिक संख्या में महिला उम्मीदवारों को तैयार करना होगा। यह बदलाव केवल कानून से नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन से ही सफल हो सकता है।
 
संविधान संशोधन होने के कारण इस विधेयक को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि केवल साधारण बहुमत से काम नहीं चलेगा बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई समर्थन जरूरी होगा। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सरकार के पास बहुमत है लेकिन दो तिहाई समर्थन के लिए उसे अन्य दलों से भी सहयोग लेना पड़ सकता है। यही कारण है कि बैक चैनल बातचीत और राजनीतिक सहमति इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगी।
 
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है बल्कि यह पिछले तीन दशकों से चर्चा में रहा है। कई बार इसे संसद में पेश किया गया लेकिन विभिन्न कारणों से यह पारित नहीं हो सका। वर्ष 2010 में इसे राज्यसभा से मंजूरी मिली थी लेकिन लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका। अंततः वर्ष 2023 में इसे कानून का रूप मिला और अब संशोधन के जरिए इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।
 
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। इसके जरिए महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर मिलेंगे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। हालांकि इसके साथ जुड़े विवाद और चुनौतियां भी कम नहीं हैं और आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद इस पर किस तरह सहमति बनाती है।
 
अंत में यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यह तय करेगा कि देश सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को किस हद तक लागू करने के लिए तैयार है। अगर यह सफल होता है तो यह आने वाले वर्षों में राजनीति के स्वरूप को बदल सकता है और महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकता है।
 
कांतिलाल मांडोत

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