.श्रीराम के भक्तों का अपमान भगवान के लिए असहनीय कथावाचक 

खिरका जगतपुर में नैमिष धाम से आए कथाव्यास की चतुर्थ दिवस सायं सत्र की संगीतमय साप्ताहिक भागवत कथा

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

बरेली/फतेहगंज पश्चिमी-बरेली। नैमिषारण्य धाम से आए कथाव्यास आचार्य अवध किशोर शास्त्री 'सरस' जी ने भक्तों को समझाया-"भक्तवत्सल भगवान श्रीराम अपना अपमान-निंदा-तिरस्कार तो सह सकते हैं लेकिन जो मूढ़ अहंकारवश उनके भक्तों पर अत्याचार करता है, ताड़का-सुबाहु, इंद्रपुत्र जयंत आदि की तरह उसे तीनों लोकों में कोई भी बचा नहीं सकता। असुरारि विष्णु के श्रीराम रूप में धरती पर अवतरित होने का मुख्य कारण भी यही है।"
 
कथाव्यास 'सरस' जी महाराज खिरका जगतपुर में नत्थूलाल पुजारी के मुख्य यजमानत्व में चल रही संगीतमय साप्ताहिक श्रीरामकथा के चौथे दिन बुधवार सायं खराब मौसम के बावजूद भारी तादाद में कथा पांडाल में उमड़े महिला-पुरुष-बाल श्रद्धालुओं पर भक्ति-प्रेम-ज्ञान-वैराग्य की रसवर्षा कर रहे थे। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में विद्यार्जन, विश्वामित्र यज्ञ रक्षा, ताड़का-सुबाहु वध, अहिल्या उद्धार, पुष्प वाटिका में राम-सीता का प्रथम मिलन, धनुष भंग, सीता विवाह आदि श्रीरामचरित मानस के प्रेरक प्रसंगों का संगीतमय मधुर वाणी में गायन करते हुए कथाव्यास ने समझाया कि कमाई ऐसी करो जो हर जगह काम आए। राम रतन धन ऐसा ही धन है। इस अमूल्य धन को पाने के बाद कुछ भी पाने को शेष नहीं रह जाता। बताया- राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न जोड़े से रहते हैं।
 
 चारों भाइयों में विलक्षण प्रेम है। जनेऊ संस्कार की महिमा बखानते हुए बताया-यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रम्, अति शुभ्रम्- जनेऊ की सूत की तीन लड़ी, तीनों में तीन-तीन धागे माता-पिता और गुरु-तीन के ऋणों के प्रतीक हैं।  इन तीनों की सेवा में सर्वस्व निछावर कर देने से बड़ा धर्म कोई भी नहीं है। श्रीराम ने अपने जीवन में यह सिद्ध करके दिखाया भीमहै।
कथाव्यास कहते हैं-गुरु गृह पढ़न गए रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब आई।
सरस जी बताते हैं-राम जी को मानते हो तो रामजी की भी तो मानो-
प्रातकाल 
उठि के रघुनाथा।
मात-पिता-गुरु नावइ माथा।
माताओं को षाष्टांग दंडवत का निषेध है लेकिन शास्त्र उन्हें पंच प्रणाम का निर्देश करता है।
गाधितनय मन चिंता व्यापी।
हरि बिनु मरहिं न निशिचर पापी।
तव मुनिवर मन कीन्ह विचारा।
प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।
 
बताया-ताड़का-सुबाहु के वध, मारीच को सौ योजन दूर फेंकने के श्रीराम के यज्ञ रक्षा के उद्यम से प्रसन्न होकर महामुनि विश्वामित्र ने उन्हें बला-अतिबला दो पराविद्याएं प्रदान कीं। इन विद्याओं के प्रभाव से जीव को भूख-प्यास नहीं लगती। साथ ही अतुलित बल और तेज का वर्धन भी होता रहता है।अहिल्या उद्धार प्रसंग सुनाते हुए कहा-शापग्रस्त अहिल्या कहती हैं, यहीं आश्रम में शिला रूप में प्रभु राम की प्रतीक्षा करूंगी‌।अंतत: पतितपावन श्रीराम उन्हें दर्शन देकर उनका उद्धार करते हैं। परम भक्त जटायु भी रावण से युद्ध करके मरणासन्न होकर भी प्रभु राम की गोद में प्राण छोड़ने की आस में अत्यधिक सुख और आनंद का अनुभव करते हैं।
 
धनुष यज्ञ में श्रीराम के स्वरूप का वर्णन करते हुए कथाव्यास समझाते हैं-जाकी रही भावना जैसी, प्रभु देखी तिन मूरत वैसी। कथासत्र में सूबेदार मेजर वीरेंद्र पाल सिंह (सेवानिवृत्त), पूर्व प्रधान कृष्णपाल गंगवार, अरविन्द गंगवार, हरिशंकर, बड़के, रवींद्र, गुड्डू, अशोक रस्तोगी, गणेश 'पथिक' आदि विशेष रूप से उपस्थित रहेे।
 

About The Author

Post Comments

Comments